गोविन्द बल्लभ पन्त भारत रत्न व उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री का जीवन hamaarijeet

पंत जी ने नेहरू जी का बचाव किया था और स्वयं अपने उप्पर लाठियां खाई। एक बार लखनऊ में धरा 144 लगी होने के बावजूद पंत जी और नेहरू आगे की ओर बड़े।

लेकिन लम्बें ढील-ढोल शरीर के कारण जब लाठियां पढ़ रही थी तो पंत जी ने अपने लम्बे कद के कारण नेहरू जी का बचाव किया था और स्वयं अपने उप्पर लाठियां खाई।

लाठियां खाने के बाद पंत जी के पीठ पुरे जीवन भर दर्द रहने लगा, लेकिन उन्हें अपने इस दर्द की बिल्कुल परवाह न थी और वो देश हित के लिए कार्य करते रहें।

काकोरी काण्ड के शहीद क्रांतिकारीयों को फाँसी से बचाने के लिए उनकी पैरवी करना

काकोरी काण्ड में पकड़े जाने पर अंग्रेज सरकार ने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और रोशन सिंह को फाँसी की सजा दे दी थी,

जिसे रोकने के लिए पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने पंडित मदनमोहन मालवीय जी के साथ मिलकर वायसराय को पत्र लिखा,

लेकिन गांधी जी का समर्थन न मिलने के कारण तीनों की फाँसी नहीं रुक सकी।    

पंडित गोविन्द बल्लभ पंत जी का जन्म 10 सितम्बर, 1887 को अल्मोड़ा जिले के खूंट गाँव में हुआ था जोकि उत्तराखंड राज्य में स्थित है।

पंत जी उत्तरप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत के दूसरे गृहमंत्री थें।

उन्होंने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने में योगदान दिया और जमींदारी प्रथा को भी समाप्त किया। उन्होंने भारत देश को आजाद करने में काफी योगदान दिया।

गोविन्द बल्लभ पन्त भारत रत्न व उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री का जीवन hamaarijeet




पन्त जी का परिवार  

इनकी माँ का नाम गोविन्दी और पिता का नाम मनोरथ पन्त था। पंत जी के पूर्वज महाराष्ट्र के निवासी थें और उच्च कूल के ब्राह्मण थें।

गोविन्द बल्लभ पंत के पूर्वज पंडित जयदेव पंत जी, जब बद्रीनाथ की यात्रा पर थें तो उस समय अपनी यात्रा समाप्त करने के बाद, वो राजदरबार में गए और अपनी बुद्धिमता व ज्ञान से दरबार में सबको आश्चर्यचकित कर दिया।

उनकी अपार प्रतिभा देखकर वहां के महाराजा ने उन्हें वही पर बसने का निमंत्रण दिया जिसे उन्होंने स्वीकार कर किया।

25 पिड़िया गुजर जाने के बाद उनके परिवार में एक होनहार बालक, गोविन्द बल्लभ पंत का जन्म हुआ, जिसने अपने देश का नाम रोशन किया।


संक्षिप्त में पन्त जी के विषय के बारे में जाने  

जन्म : 10 सितम्बर 1887

माता जी : श्रीमती गोविंदी

पिताजी: श्री मनोरथ पंत

शिक्षा: 1903 में अल्मोड़ा से स्कूल की शिक्षा प्राप्त की

1908 में बी०ए० और 1909 में कानून की डिग्री सर्वोच्च अंकों के साथ हासिल की।

इसके उपलक्ष्य में उन्हें कॉलेज की ओर से “लैम्सडेन अवार्ड” दिया गया।

1910 में उन्होंने अल्मोड़ा आकर वकालत शूरू कर दी।

1905 में पंत जी ने बनारस में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में भाग लिया

1923 प्रांतीय विधान परिषद् में निर्वाचित

1928 साइमन कमीशन का विरोध प्रदर्शन और घायल होना

1930 नमक आंदोलन में 6 महीने की जेल

1932 असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार

1937 उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री

1942 भारत छोड़ों आंदोलन में गिरफ़्तारी

1946 उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री निर्वाचित

1955 केंद्रीय गृहमंत्री के पद पर नियुक्ति

1957 ‘भारत-रत्न’ से सम्मानित   


पन्त जी की शिक्षा और उनका जीवन               

बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका पालन पोषन उनके दादा बद्री दत्त ने किया।

अल्मोड़ा से इन्होने प्रथम क्षेणी में मीट्रिक की पढ़ाई की और उसके बाद इंटरमीडिएट में पास होने के बाद इन्हें छात्रवृति मिलने लगी और आगे की पढ़ाई के लिए 1905 में उन्होंने अल्मोड़ा छोड़ दिया और इलाहाबाद चले गये।

इलाहबाद विश्वविद्यालय में पंत जी ने आगे की पढ़ाई की और इसके साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी रूचि लेने लगे।

उसी वर्ष 1905 में जब बंगाल का विभाजन हुआ तो लोगों में काफी रोष था।

पंत जी ने स्वयंसेवक की हैसियत से कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया और उसी समय पंत जी को गोखले सहित अन्य बड़े नेताओं के विचारों को सुनने को मिला,

जिनमे गोखले जी के भाषण का उनपर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा और तभी से इन्होने नर्णय लिया कि देश के लिए पढ़ाई के साथ -साथ कुछ ना कुछ करना है।  

पिता की सरकारी ड्यूटी घर से दूर होने के कारण इनका पालन-पोषन उनके दादा बद्री दत्त जोशी ने की।

सन 1906 में पंत जी ने त्रिवेणी के संगम के पास जनता के बीच भाषण दिया जोकि अंग्रेज सरकार के खिलाफ था, जिसके फलस्वरूप उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया और बाद में मालवीय जी के प्रयासों से पुनः कॉलेज में ले लिया गया।

पंडित जी ने 1906 में LLB में प्रवेश किया और प्रथम क्षेणी में LLB की परीक्षा पास की, कॉलेज ने उन्हें स्वर्ण पदक भी दिया।

पंत जी वकालत में जो तर्क देतें थें तो सामने वाला भी उनके दिए गए तर्क को बड़ी गंभीरता से सुनता था। आगे पंत जी ने मजदूरों के प्रति बेगार प्रथा को बंद करवाने में अपना सहयोग दिया।

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भारत स्वतन्त्र कराने के लिए पन्त जी का योगदान

1916 में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में पंत जी को सरोजनी नायडू और गाँधी जी से मिलने का अवसर मिला।

1921 के अहमदाबाद अधिवेशन के बाद इन्होने वकालत का अपना पेशा छोड़ दिया।

1925 में लखनऊ और काकोरी के बेच ट्रैन से सरकारी खजाना लूट लिया गया था और देश के महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी, सचिन्द्रनाथ, अशफाक उल्लाह खान आदि को पकड़ लिया गया था, उनकी वकालत पंत जी ने ही की थी।

साइमन कमीशन के विरोध अकरने पर पन्त जी का घायल होना

उसी समय साइमन कमीशन का बहिस्कार चल रहा था।

लाहोर में लाला लाजपत राय घायल हो गए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी।

लखनऊ में धरा 144 लगी होने के बावजूद पंत जी और नेहरू आगे की ओर बड़े।

लेकिन लम्बें ढील-ढोल शरीर के कारण जब लाठियां पढ़ रही थी तो पंत जी ने अपने लम्बे कद के कारण नेहरू जी का बचाव किया था और स्वयं अपने उप्पर लाठियां खाई।

लाठियां खाने के बाद पंत जी को पुरे जीवन भर पीठ में दर्द रहने लगा, लेकिन उन्हें अपने इस दर्द की बिलकुल परवाह ना थी और वो देश हित के लिए कार्य करते रहें।


अंग्रेज़ों दवारा पन्त जी को जेल में डालना

1937 में प्रांतीय चुनाव में पंत जी को मुख्यमंत्री बनाया गया और मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने सबसे पहले कपड़ा उद्योग  के मज़दूरों की समस्या की ओर ध्यान दिया।

पंत जी ने 1940 में गाँधी जी के आह्वान पर सत्याग्रह किया और उनकों एक वर्ष के सजा सुनाई गई।

1942 के आंदोलन में भी  उन्होंने कहा था “अंग्रेजों भारत छोड़ो” और उन्हें फिर से जेल में डाल दिया गया और जेल में ही उन्होंने कई प्रकार की किताबों का अध्ययन किया।

उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में उनका चुनाव होना  

स्वतन्त्र भारत में पंत जी को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया, उस समय पंजाब और सिंध प्रान्त से कई लोग वहां आकर बसे थें।

इसके बावजूद वहां कोई भी दंगा नहीं हुआ था। उन्होंने वर्षों से चली आ रही जमींदारी प्रथा का अंत भी किया।

पंत जी ने हरिजन गॉवों का दौरा किया और उनके हाथ से जल ग्रहण किया और छुआछूत प्रथा की समाप्ति का प्रयास किया।

उत्तर-प्रदेश में ही हिंदी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा मिला। उत्तरप्रदेश में उनका कार्यकाल स्वर्णयुग कहलाया।

पन्त जी का भारत देश के गृहमंत्री के तौर पर कार्य करना

केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के निधन के बाद नेहरू जी को एक कुशल गृहमंत्री की ज़रुरत थी तो उन्होंने अपने भरोसेमंद सहयोगी पंत जी को इसका कार्यभार सौपा।

पंत जी गृहमंत्री के तौर पर नए थें, परन्तु संसद भवन उनके लिए नया नहीं था, इससे पहले अंग्रेज ससंद में उनकी गर्जना सुन चुके थें।

पंत जी जब गृहमंत्री थें तो ससंद में राज्य के पुनर्गठन के तौर पर बहस चल रही थी, तभी पंत जी बीमार होने के बावजूद ससंद आएं और सभी के प्रश्नों का उन्होंने बड़े धैर्य और शांति से जवाब दिया।

गोविन्द बल्लभ पन्त भारत रत्न व उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री का जीवन hamaarijeet




देश का सबसे सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’  

सन 1957 को उन्हें देश का सबसे सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’ प्रदान किया।

पंत जी चाहतें थें कि काम करते-करते उनके प्राण निकलें और 7 मार्च 1961 को पंत जी हमसे सदा के लिए बिछड़ गये।

पंडित नेहरू जी ने उनके निधन पर कहा था “आज सचमुच मेरा दिल उनके निधन पर टूट गया। मैं दुर्लभ हो गया हूँ”।

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