SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं

एक युवक रोज पढ़ाई के लिए कॉलेज जाता था। रास्ते में उसे रोज एक भिखारन बैठी नजर आती, जिसे देखकर वह पूरी तरह भावुक हो जाता और मन ही मन सोचता कि “एक यह व्यक्ति है जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती है और एक मैं हूँ जिसके पास सबकुछ है।“ SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं

यह बात उसे अन्दर तक झकझोर देती कि हमारे समाज में इतनी असमानता क्यों हैं? एक व्यक्ति तो बहुत अमीरी का जीवन जी रहा है और एक बहुत गरीब।

ऐसी थी सोच हमारे महान आदर्श, देश के प्रति सच्ची निष्ठा रखने वाले, निडर, वीर और साहसी, शहीद सुभाषचन्द्र बोस जी।

उन्हें घर से कॉलेज आने-जाने के लिए बस का किराया मिलता था, जिसे वह भिखारी को दे देतें और खुद पैदल ही यात्रा करतें ।

इसी तरह उनके कॉलेज के नजदीक एक वृद्धा रहती थी, जो दिखने में बहुत असहाय और कमजोर नजर आती थी।

यह देखकर उनके मन में दया आ गई और वह उन्हें रोज घर से लाये हुए भोजन में से आधा भोजन दे देते।

इस प्रकार यह दिनचर्या चलती रही और इसका परिणाम यह हुआ कि वृद्धा का स्वास्थ्य ठीक हो गया।


संक्षिप्त परिचय

नाम सुभाषचन्द्र बोस

पिता का नाम स्वर्गीय श्री जानकीबोस

माता का नाम स्वर्गीय श्रीमती प्रभावती

जन्म 23 जनवरी, 1897, उड़ीसा के शहर कटक में

14 भाई- बहन में नवीं संतान 

सर्वप्रथम शिक्षा उन्हें उनके माता-पिता से मिलना   

प्राइमरी शिक्षा कटक के प्रोस्टेंट योरोपियन स्कूल

1909 में रैविनशा कालिजियट स्कूल, कटक में भर्ती 

1913 हाई स्कूल की शिक्षा में दुसरे स्थान पर आना

1915 में इंटरमीडियट की परीक्षा में प्रथम स्थान में आना

जाजपुर गाँव को हैजें के प्रकोप से बचाना

टटोरियल आर्मी की परिक्षा पास

विरोधी छात्रों का नेतृत्व करने पर प्रेसिडेंसी कॉलेज से निष्काषित कर दिया गया।

बीए आनर्स की परीक्षा में पुरे कलकत्ता में दुसरे नंबर में आयें 

इंग्लेंड में 1920 में उन्होंने आई सी एस परिक्षा में चोथें स्थान हासिल किया।

देश सेवा के लिए 22 अप्रेल 1921 में आई सी एस परिक्षा से त्यागपत्र दे दिया

1924  में कलकत्ता मुन्सिपल कारपोरेशन के चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर नियुक्त

1924 में लार्ड लिंटन के द्वारा बंगाल आर्डिनेंस के विरोध में ढाई वर्ष की सजा

1926  में जेल में रहते हुए बंगाल विधान परिषद् के लिए कलकत्ता निर्वाचन क्षेत्र से विजयी

सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना

1939  में दोबारा कांग्रेस का अध्यक्ष चुना जाना और बाद में महात्मा गांधी और नेहरू के विरोध के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना 

1939 फ्रॉवर्ड ब्लॉक की स्थापना

फ्रॉवर्ड ब्लॉक द्वारा पुरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन करना

1940  सुभाषचंद्र बोस गिरफ्तार जेल में  आमरण अनशन की घोषणा

1942  आजाद हिन्द फ़ौज का संगठन




सुभाषचन्द्र बोस जी का एतिहासिक सन्देश अपने देशवासियों के लिये  

अपने प्यारे देशवासियों के नाम मेरा एक सन्देश है – “मत भूलों की गुलाम रहना दुनियां का सबसे बड़ा अभिशाप है। याद रखो कि अन्याय और अनीति के समक्ष घुटने टेकना सबसे बड़ा पाप है।

जब इस नश्वर जीवन का अंत निश्चित है तो क्यों ना आजादी के लिए संघर्ष करते हुए, मृत्यु को गले लगाया जाये।

याद रखो – मेरे प्यारे देशवासियों कि आजादी यदि प्राणों की कीमत पर भी मिलती है तो वह सस्ती है।“

अपने बचपन के बारे में

“जिस समय मुझे खेल के मैदान में थककर चूर हो जाना चाहिए था, उस आयु में, मैं अपनी समस्याओं में लींन रहता।….” 

इस प्रकार के विचार थें, अपने देश के प्रति हमारे महान, आदर्श नेताजी के।      

शुरूआती जीवन

ओड़िसा में एक शहर कटक था जिसमें जानकीबोस और उनकी पत्नी प्रभावती रहती थी।

उनके घर नोवीं संतान के रूप में सुभाष चन्द्र बोस ने जन्म लिया।

वह शुभ दिन था 23 जनवरी 1897, जब जानकीबोस और प्रभावती देवी के घर एक वीर बालक ने जन्म लिया। सुभाष के 14 भाई-बहन थें, छः बहनें और आठ भाई।


उनके जीवन में सबसे पहले उनके पिता की शिक्षा का प्रभाव

उनके पिता श्री जानकीबोस कटक के सफलतम वकीलों में एक थें और सुभाषचन्द्र जी के जीवन में उनका गहरा प्रभाव पड़ा।

श्री जानकिबोस इतने अटूट इरादे वाले थे कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से मतभेद हो जाने पर उन्होंने शासकीय अभिभावक के पद से त्यागपत्र दे दिया और बहुत मनाने के बावजूद अपना त्यागपत्र वापस नहीं लिया।

इसी तरह 1930 में अंग्रेज़ों का दमन-चक्र तेज होते ही, अपनी देश-भक्ति के परिणामस्वरूप अपनी रायबहादुर की उपाधि लोटा दी।

उनके जीवन में माता जी की शिक्षा का प्रभाव  

सुभाष जी ने अपनी माता जी से धर्मपरायणता, दानशीलता, कर्त्तव्यपरायणता आदि गुणों को सीखा। इसके साथ-साथ मृदु भाषण का सम्मोहक गुण भी ग्रहण किया।

प्राइमरी शिक्षा

इनकी प्राइमरी शिक्षा कटक के प्रोस्टेंट योरोपियन स्कूल में हुई और आगे 1909 में रैविनशा कालिजियट स्कूल में भर्ती  हुए।

इस स्कूल में उन्होंने पढाई के साथ-साथ स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन किया और इसके साथ ही रामकृष्ण परमहंस के विचारों का भी अध्ययन किया, जो उनके चरित्र-गठन और मानव सेवा के प्रति उनके विकास में सहायक हुआ।

 नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जीवनी अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं


बचपन की एक घटना

एक बार जब सुभाष 10वीं कक्षा में पढ़ रहे थें तो उस समय जाजपुर गाँव में हैजें की बिमारी का प्रकोप पूरी तरह फैल चुका था।

यह सुनकर वह घर पर बिना बताएं कुछ लड़कों को साथ लेकर जाजपुर पहुचें और वहां पर सभी गाँव वालों की  सेवा में लग गये।

और जब घर पर आये तो उनसे घर वालों ने कहाँ कि “ऐसी समाज सेवा से क्या भला होगा जिसमें खुदी की जान को ज्यादा ख़तरा हो।“

उन्होंने इसका जवाब दिया “इस समय गाँव वालों को हमारी ज्यादा जरुरत थी और वहां जाकर सेवा करना बहुत जरुरी था।“ यह सुनकर उनके घर वाले शांत हो गये।


जीवन की एक घटना से उनका जीवन देश के प्रति पूरी तरह बदल गया

प्रेसीडेंसी कॉलेज के कुछ स्टूडेंट्स बातें करते हुए कक्षा के बाहर से गुजर रहे थे कि तभी प्रोफ़ेसर ई एफ ओटन साथ वाले कमरे में पढ़ा रहे थें

और जब उन्होंने उनकी बाते सुनी तो वह बाहर आये और छात्रों को धक्के देते हुए बोले “ तुम जंगली, काले और बदतमीज इंडियन को बरामदे में चलने भी नहीं आता।“

ओटन हमेशा ही भारतीय छात्रों को भद्दी-भद्दी गालियाँ देता था और हमेशा ही उन्हें नीचा दिखाने का काम करता ।

भारतीय छात्र जो बी ए थर्ड वर्ष के छात्र थे, उन्होंने प्रिंसिपल के सामने लिखित शिकायत की।

जिसका नेतृत्व सुभाषचंद्र बोस कर रहे थे। प्रिंसिपल ने ओटन के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नही की, बल्कि सभी छात्रों पर पाँच-पाँच रुपए का जुर्माना भी लगा दिया।

इसका असर यह हुआ कि छात्रों का आन्दोलन उग्र रूप में बदल गया और फिर मजबूरन ओटन को झुकना पड़ा।

इसके बाद ओटन ने फिर से कुछ दिन बाद एक ओर घटना को अंजाम दिया।

उसने एक भारतीय लड़के को कक्षा से उसकी गर्दन पकड़कर बाहर लाया और धक्का देते हुए बोला “यु ब्लैक मंकी” और उस पर पाँच रुपये का जुर्माना भी लगा दिया।  

इस घटना से पुरे कालेज में रोष फ़ैल गया और उसे मजा चखाने का निर्णय लिया, जिसका नेतृत्व सुभाष जी ने किया।

जैसे ही ओटन क्लास से बाहर आयें तो पीछे से उसपर एक विधार्थी ने लात मारी और वो जमीन पर गिर पड़ा।

उसके बाद छात्रों ने उसे पीटना शुरू कर दिया।

पुरे भारतीय छात्रों में आग की जो ज्वाला फूटी थी, उसकी खबर पुरे शहर में फ़ैल गई ।

अगले दिन सुभाष को प्रिंसिपल ने अपने रूम में बुलाया और सुभाष से कहा कि “क्या तुम प्रोफ़ेसर की पिटाई करने वाले दल में शामिल थें?”

सुभाष ने निर्भीक होकर कहा ” हाँ, मैं आक्रमणकारी दल में शामिल था और सारी  योजना मेरे द्वारा ही बनाई गई थी।”

“क्या तुम अपने इस व्यवहार के लिए शर्मिन्दा हो?”

जी नहीं, मुझे अपने व्यवहार के लिए बिल्कुल भी खेद नहीं है और ना ही मैं इसके लिए शर्मिन्दा हूँ ।  प्रोफ़ेसर औटान को सबक सिखाने के अलावा हमारे पास कोई दुसरा विकल्प नहीं था।”

तुम हमसे प्रोफ़ेसर की लिखित शिकायत कर सकते थे।”

हमने पहले भी आपसे लिखित शिकायत की थी, लेकिन तब आपने प्रोफ़ेसर को कोई भी सजा नहीं दी थी। इसके विपरीत भारतीय छात्रों पर पाँच-पाँच रुपए का जुर्माना भी कर दिया था।”

इसका अर्थ यह हुआ कि सारी जिम्मेदारी तुम्हारी ही क्यों ना समझी जाए?”

यदि आपका यही निर्णय है तो मुझे स्वीकार्य है।”

तो ठीक है कालेज में गड़बड़ फैलाने के जुर्म में तुम्हें कालेज से निकाला जाता है।”

और सचमुच सुभाष को कालेज से निकाल दिया गया और निष्कासन अनिश्चित काल के लिए हुआ।  



इन महापुरुषों के बारे मे पढ़ने के लिए click करें                                                                        भारतीय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद
    काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

भारत सच्चे सपूत लाल बहादुर शास्त्री जी
कम उम्र में शहीद हुए क्रांतिकारी खुदीराम बोस

SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं


स्कॉटिश चर्च कालेज से आगे की पढ़ाई करना

उनकी आँखों में कमी के कारण, रेजिमंट में भर्ती में उन्हें अयोग्य करार दिया गया। बाद में उन्होंने मन मारकर स्काटिश चर्च कॉलेज में भर्ती ले लिया।

टटोरियल आर्मी की परिक्षा पास करने के बाद, वह फोर्ट विलियम सेनालय में बतौर रंगरूट पहुंच गये।

इसके साथ-साथ अपनी बीए आनर्स की पढ़ाई में भी लगे रहे। सन 1919 में उन्होंने बीए आनर्स में पुरे कलकत्ता में सेकंड नबर पर आयें।                

आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लेंड जाना

पिताजी ने आई सी एस की परिक्षा में बैठने की सलाह दी और वह इंग्लेंड के लिए रवाना हो गये। सन 1920 में उन्होंने पुरे आई सी एस परिक्षा में चोथें स्थान हासिल किया। 

पिताजी की सलाह पर तो उन्होंने आई सी एस परिक्षा पास कर तो ली, लेकिन उनका मन तो अपने भारत देश की सेवा करना था ना कि अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार बनकर सेवा करना।

इसके लिए उन्होंने अपने भाई शरत चन्द्र को पत्र भी लिखा, जिसमें उन्होंने अपने देश की सेवा करने के अपना अंतिम निर्णय और उद्देश्य से अवगत कराया।


माँ के नाम सुभाष जी का पत्र

अपने पत्र के माध्यम से सुभाष जी ने माता जी को पत्र लिखा जो इस तरह है

आदरणीय माँ,

मुझे काफी समय से कलकत्ता के समाचार नहीं मिले हैं। आशा करता हूँ कि आप सब स्वस्थ होंगें। मैं सब समझ रहा हूँ, आपने मुझे समय के अभाव के कारण पत्र नहीं लिखा है।

मेरे दादा की परिक्षा कैसे रही? क्या आपने मेरा पूरा पत्र पढ़ लिया था! अगर आपने नहीं पढ़ा, तो मुझे दुःख होगा।

माँ मैं सोचता हूँ कि क्या इस समय भारत माता का एक सपूत भी ऐसा नहीं है, जो स्वार्थ रहित हो। क्या हमारी मार्तभूमि इतनी अभागी है! कैसा था हमारा स्वर्णिम अतीत और कैसा है यह वर्तमान!

वे आर्यवीर कहाँ है, जो भारत माता की सेवा के लिए अपना बहुमूल्य जीवन प्रसन्नता से न्योछावर कर देते थें! आप माँ हैं, किन्तु क्या आप केवल हमारी माँ हैं?

नहीं, आप सभी भारतीयों की माँ हैं। और यदि सभी भारतीय आपके पुत्र हैं, तो क्या आपके पुत्रों का दुःख आपको व्यथा से विचलित नहीं कर देता।……………………….

इस प्रकार उन्होंने अपनी माता जी को पत्र के माध्यम से अपने लक्ष्य से अवगत कराया।  


आई सी एस परिक्षा से त्यागपत्र देना

मन ही मन वह खुश थें कि उनकी माता, प्रभावती उनके निर्णय से खुश थी और अंत में उन्होंने 22 अप्रेल 1921 में आई सी एस परिक्षा से त्यागपत्र दे दिया और भारत वापस लोट आये।  

उन्होंने देशबंधु चितरंजन दास के साथ काम करने की ईच्छा जताई।

सुभाष जी के भारत आने पर महात्मा गांधी जी ने उन्हें देशबंधु चितरंजन दास से मिलने के लिए कहा। 

कलकत्ता मने देशबंधु से मिलने के बाद उन्हें महापालिका का मुख्य कार्यकारी सदस्य बना दिया गया। उनके कार्य करने पर महापालिका का काम करने का तरिका ही पूरी तरह बदल गया।

सुभाष जी के राजनीति गुरु देशबंधु चितरंजन दास जी थे।


युवाओं के बीच सुभाष चन्द्र बोस की छवी का बढ़ना

1924 में लार्ड लिंटन के द्वारा बंगाल आर्डिनेंस एक्ट निकाला गया तो बोस जी ने उसका विरोध किया तो उन्हें ढाई साल तक जेल में बिताने पड़े।

1928 में साइमन कमीशन के विरोध का नेतृत्व भी बोस जी ने ही किया।     

1930 में पहले सविनय अविज्ञा आन्दोलन में भाग लेने के लिए उन्हें जेल में डाल दिया गया।

सितम्बर में जेल से बाहर आयें। 1932 में उन्हें फिर से गिरप्तार कर लिया गया।

1924 में जो उनका क्षय रोग आरम्भ हुआ था, वह फिर से उभरने लगा।

क्षय रोग का ईलाज जब भारत में संभव नहीं हो पाया, तो यूरोप में ईलाज के लिए गये। लेकिन इसके साथ-साथ देश को आजादी की उनकी योजना भी चलती रही।

अंग्रेज़ों द्वारा सुभाष के प्रति सजग रहना

जब सुभाष यूरोप गये तो अंग्रेजों को पता था कि सुभाष चैन से बैठने वाले नहीं हैं, इसलिए उन्हें ब्रिटेन और जर्मनी ना जाने देने के लिए केवल आस्ट्रिया और इटली का ही वीजा दिया गया।

उन्होंने आस्ट्रिया में वही किया, जिसका अंग्रेज़ों को डर था। उन्होंने ‘आस्ट्रिया भारत संघ’ की स्थापना की।

वहां पर उनका भाषण बहुत पसंद किया गया। उनमें एक विशेषता यह थी कि उन्होंने राजनीति शास्त्र के अतिरिक्त समाजशास्त्र, आर्थिक, दार्शनिक, इतिहास, विज्ञान आदि क्षेत्रों के विद्वानों से भी संपर्क बनाए रखा।


कांग्रेस समिति का अध्यक्ष

यूरोप से उपचार के बाद कांग्रेस के 51 वें अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुन लिया गया।

गांधी जी के विरोध के बावजूद उन्हें दूसरी बार फिर से कांगेस का अध्यक्ष चुना जाना और फिर त्यागपत्र देना   

उन्हें जो भी कार्य दिया जाता उसे वो पूरी लगन से करते और अध्यक्ष बनने के बाद वह पुरे भारत में घुमें और भारतीयों को अंग्रेज सरकार के विरुद्ध तैयार करने के कार्य में लगे रहे।

कांग्रेस के सदस्य उनके कार्य करने के तरीकें से बहुत खुश थे।

दूसरी ओर गाँधी जी के विरोध के बावजूद वह दोबारा अध्यक्ष बनें।

अध्यक्ष बनने के बाद गाँधी जी को यह गवारा नहीं हुआ और वह दोबारा चुनाव के लिए अनशन करना चाहते थे।

जिसका पता जब सुभाष जी को लगा तो उन्होंने स्वयं ही अपने अध्यक्ष पड़ से त्यागपत्र दे दिया। 




SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं


फारवर्ड ब्लाक पार्टी की स्थापना

इसके बाद 3 मई 1939 को उन्होंने फारवर्ड पार्टी की स्थापना की।

प्रथम विश्व युद्ध में जब हिटलर ने मित्र देशों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, तो सुभाषचन्द्र बोस ने उसका फायदा उठाकर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध अपने संगठन का काम तेज कर दिया।

वह चाहते थे कि भारत अंग्रेज सरकार के विरुद्ध युद्ध करके अपने को आजाद कराये लेकिन गांधी जी ने इसका विरोध किया।

इस प्रकार वह ब्रिटिश हुकूमत की आँख की किरकीरी बन गये और उन्हें फिर से गिरप्तार कर लिया गया और उनपर राजद्रोह के कुछ मुकदमें भी ठोक दिये गये, जिसके वरोध में उन्होंने जेल में आमरण अनशन किया।

बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया लेकिन रिहा करने के बाद उन्हें नजरबंद कर दिया गया।


उनका कद भारत में लगातार बढ़ना

फरवरी 1928 में साईमन कमीशन के विरोध में, सुभाष ने पुरे बंगाल में नेतृत्व किया और इसमें कई युवाओं ने साथ दिया और यह आंदोलन की लहर पुरे बंगाल में जोरों से फ़ैल गई और वदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई।

इस दौरान सुभाष की कार्यशैली और जोश को देखकर सभी आश्चर्यचकित थे।

एक दैनिक पत्र के अनुसार “गरम दाल वालों के एक नौजवान नेता, सुभाषचद्र बोस जो पिछले वर्ष बिमारी के कारण मुक्त कर दिए गए थे, अपनी अदम्य साहस से  पुनः स्वस्थ होकर कार्यक्षेत्र में उतर आएं हैं, उनके प्रभाव और कार्यक्षमता से ऐसा लगता है कि कहीं वे महात्मा गांधी की जगह ना ले लें।“   


सुभाष बावड़ी डलहोजी

1937 में जेल में बंद होने पर जब अंग्रेज़ों ने उनको बहुत यातनाएं दी  और उसके बाद जब उनकी जांच की गई तो जांच पर टीबी पाई गई तो डर के मारे उन्हें रिहा करना पड़ा।

अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए वह डलहोजी पहुचें और रोज सुबह जब वह टहलते तो बावड़ी का पानी पीतें और इस प्रकार कुछ समय बाद ही उनका स्वास्थ्य ठीक होने लगा।

तभी से जो वह बावड़ी थी उसका नाम सुभाष बावड़ी के नाम से जाना जाने लगा। अब यह जगह ऐतिहासिक पर्यटन स्थल में बदल गई है, लोग यहाँ पर घुमने आते हैं।

आगे की अपनी नई रणनीति बनाना

सुभाष जी जानते थे कि अपने देश की आजादी के लिए काम करना है, तो कोई नई रणनीति बनानी होगी और उन्होंने यह किया भी।

वह चुपके से भतीजे शिशिर के साथ धनबाद जा पहुचें और दुसरे भतीजे के साथ रेल टिकट लेकर दिल्ली पहुचें।

दिल्ली से पेशावर तक की यात्रा उन्होंने अकेले ही की। पेशावर पहुंचकर उन्होंने अपना नाम मोहम्मद जियाउद्दीन रख लिया।

यहाँ से भगतराम के साथ काबुल की यात्रा पर निकल पड़ें।

और इस यात्रा में वह भगतराम के गुन्गें-बहरे चाचा बन गये। 31 जनवरी 1941 को वह काबुल जा पहुचें। काबुल में कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने इटली की यात्रा की और बाद में आस्ट्रीया पहुंचें।


एमिली से विवाह

Wife & Daugter of Subhash
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आस्ट्रिया में जाने के बाद भी सुभाष जी चैन से नहीं बैठें और कुछ ना कुछ लिखते रहते और लिखने के लिए उन्हें एक टाईपराइटर की जरूरत थी।

एमिली उनके पास काम के लिए आई, जो बहुत सुंदर थी।

सुभाष जी जो बोलते उन्हें वह इंग्लिश में टाईप करती और धीरे-धीरे एमिली उनसे बहुत प्रभावित हुई और दोनों ने हिन्दू रीती रिवाज से विवाह कर लिया।    

29 नवम्बर को एमिली एक बेटी की माँ बन गई, जिसे नाम मिला अनिता बोस। इसके बाद सुभाष जी वापस भारत आ गये।

इसके बाद नाजी जर्मनी में तीन साल की अवधि के समय अपनी अपनी पत्नी और बेटी से मिल पाए और यह उनका उनसे अंतिम मिलन था।  

जर्मनी में अपनी सक्रियता को बढ़ाना

सुभाष जी यूरोप गये तो जर्मनी में उन्होंने वहां पर रहने वाले भारतीयों के बीच अपनी सक्रियता बड़ा दी।

इसके साथ-साथ इटली, फ्रांस आदि देशों की भी यात्रा कर, वहां पर अपने संगठन के विस्तार में लग गये ताकि भारत की आजादी के लिए अंगेजों के विरुद्ध हर तरह की सहायता ली जाये।

उन्होंने जर्मनी में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की जो जर्मनी में बहुत प्रसिद्ध हुई। सबसे पहले ‘जन-गण-मन’ राष्ट्रगान इसी सेंटर ने घोषित किया था।

इसके बाद ‘जय-हिन्द’ नारा भी यहीं से उभरा था। सुभाष जी की प्रसिद्धी यूरोप में इतनी बढ़ चुकी थी कि बाद में उन्हें जर्मन तानाशाह, हिटलर से मिलने का मौक़ा मिला।   

नेताजी के साथी मोहन लहरी द्वारा नेताजी के बारे में

नेताजी के साथी मोहन लहरी के अनुसार “एक बार जब नेताजी कहीं भाषण दे रहे थे तो एक युवती उनसे इतनी ज्यादा प्रभावित हुई कि उसने नेताजी से शादी करने की जिद पकड़ ली।

यही युवती ही नहीं, बल्कि अनेक ओर भी थी जो नेताजी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहती थी। नेताजी के दीवाने ऐसे थे कि विदेशी भी उनके आह्वान पर उनके साथ आ जाते थे।  

रानी झाँसी रेजिमेंट को बनाना

26 जनवरी, 1943 को भारतीय स्वाधीनता दिवस बर्लिन में आयोजित किया गया।

साथियों से मिलने के बाद सुभाष चन्द्र बोस यूरोप से चल दिये। इसी समय उन्होंने आबिद हसन के साथ पनडुब्बी में यात्रा करते हुए, कई योजनाये बनाई और उन योजनाओं में एक थी रानी झाँसी रेजिमेंट को बनाना।

बाद में उन्होंने सिंगापुर के टाउन हाल में कहा कि “मुझे तीन लाख सैनिक और तीन करोड़ डालर चाहिए। मुझे मौत से ना डरने वाली भारतीय महिलाओं का एक दल चाहिए। उस दल में ऐसी कुशलता होनी चाहिये जो 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम की वीरांगना झाँसी की तरह तलवार चला सके।

इस पनडुब्बी की जिम्मेदारी लक्ष्मी सहगल को दी गई।

सुभाष जी ने 13 मई, 1943 को वायु मार्ग से टोक्यो की यात्रा की।

जापान पहुचते ही उनकी सक्रियता बढ़ गई और वह जापानी सैनिक अफसरों और बौद्धिकों से मिलकर बातचीत करते रहते।

जापान के प्रधानमन्त्री से मिलना

इसके बाद वह जून 1943 में जापान के प्रधानमंत्री तोजो से मिले।

उन्हें जापानी संसद में निमंत्रण दिया गया और यह फैसला हुआ कि उन्हें बिना किसी शर्त के भारतीय स्वतंत्रता में जापान द्वारा सहयोग दिया जाएगा।    

एतिहासिक घड़ी

4 जुलाई 1943 के दिन सुभाष चन्द्र बोस ने भारतीय आन्दोलन का नेतृत्व संभाल लिया। इस अवसर पर सुभाष ने अस्थाई सरकार बनाने की बात की।

उन्होंने कहा “अपनी सेनाओं का कुशलतापूर्वक संचालन करने के लिए, मैं आजाद भारत की अस्थाई सरकार बनाने की सोच रहा हूँ। इसका कर्तव्य यह होगा कि यह भारात की आजादी की लड़ाई में कामयाबी मिलने तक निरंतर लड़ती रहे।“

सुभाष जी का भारतीयों के लिए सन्देश

“मैं सुभाष चन्द्र बोस आजाद हिन्द रेडियो के माध्यम से आप लोगों से सवांद कर रहा हूँ।

मैं पुरे एक साल में शांति और इत्मीनान के साथ प्रतीक्षा करता रहा हूँ, बदलने वाली घटनाओं की।

विश्व के इतिहास के इस चौराहे पर, मैं भारत व भारत के बाहर के स्वाधीनता प्रेमी भारतीयों की ओर से यह घोषणा करता हूँ कि हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लगातार जुझते रहेंगें।

यह संघर्ष तब तक चलेगा जब तक भारत खुद अपना भाग्यविधाता नहीं बन जाता। हम देश के बाहर से ब्रिटिश शासन को उखाड़ने के लिए लड़ते रहेंगें।

मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि इस काम में भारत के लोग हमारा साथ देंगें।“ उनका ‘दिल्ली चलो’ नारे ने पुरे भारत के लोगों में एक उत्साह भर दिया।


ब्रिटिश हुकूमत के लिए सुभाष जी सबसे बड़े शत्रु के रूप में उभरना

पुरे भारत में यदि कोई अपनी जनता से सीधा संवाद कर रहा था तो वें थें सुभाष जी, जो आये दिन रेडिओं के माध्यम से अपनी जनता से सीधें तौर पर बात कर रहे थे और उनकी बातों में सच्चाई झलक रही थी और अपने देश की आजादी के प्रति प्रेम भी।

दूसरी ओर कांग्रेस थी, जो केवल प्रशासनिक सुधार तक ही सिमित थी। इस प्रकार ब्रिटिश हुकूमत पूरी तरह सुभाष के कट्टर शत्रु बन गई।

AAJAAD HIND FAUJ
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भारतीय आजाद हिन्द फ़ौज में कुल 40000 सैनिक थें और रानी झाँसी रेजिमेंट में भी 1000 महिला सैनिक थी।

अंतरिम सरकार की घोषणा

21 जून 1943 को स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार घोषित कर दी गई और इसके प्रमुख सुभाष जी थें।

जापान सरकार ने इसे मान्यता दे दी थी और बाद में जर्मनी, इटली, नान्किग, क्रोएसिया, फीलिपंस, थाईलेंड और म्यामार ने भी इस सरकार को मान्यता दे दी।

अगले दिन सरकार ने ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।

अपनी माँ की मृत्यु के समय भी अपने उधेश्य के प्रति विचलित ना होना

अब सुभाष जी पूरी तरह युद्ध के कार्य में शामिल हो गये और वह लड़ाई के प्रति पूरी तरह आशावादी थे कि इस युद्ध का परिणाम पूरी तरह हमारे पक्ष में होगा।

माँ की मृत्यु के समय वह ज़रा भी विचलित नहीं हुए और बस प्रणाम कर माँ की आत्मा की शांति की प्रार्थना की और भारत माँ को मुक्त कराने के लिए युद्ध में जुट गये।

अपना कार्यालय जापान से बदलकर अंडमान निकोबार में स्थानारिंत कर दिया और अराकान में नदी पार करते हुए ब्रिटिश सेना की चौकी में अपना अधिकार जमा लिया।

इस युद्ध में लगभग 300 ब्रिटिश सैनिक मारे गये।

इसके साथ-साथ आजाद हिन्द की दो ब्रिगेड इम्फाल और कोहिमा के मार्ग में बड़ने लगी, यह ब्रिगेड थी गांधी और आजाद।

दुर्भाग्य से इम्फाल विजय से पहले बहुत तेज बारिश आ गई।

ना ही सेना के लिए रसद पहुँच पाई और ना ही खाने का सामान व पिने का पानी। सैनिकों को तरह-तरह की बीमारी ने जकड़ लिया।

कई सैनिक मारे गये और अन्त में उन्होंने युद्ध क्षेत्र से वापस पीछे आने का निर्णय लिया। इसी समय ब्रिटिश सेना ने वायु-मार्ग से उनपर आक्रमण कर दिया।

1945 में इस प्रकार आजाद हिन्द फ़ौज को पराजय का सामना करना पड़ा।

पराजय में भी वीजय

24 अप्रैल 1945 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस रंगून छोड़ सिंगापुर के लिए चल दिये और बाकी जवान भी उनके साथ चल दिये।

हुआ यह कि आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों ने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान दे दिया और इसके फलस्वरूप ब्रिटिश आर्मी में भारतीय सैनिक बहुत शर्मसार हुए, उनमें देश प्रेम के प्रति ललक जग उठी।

जब आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों को दिल्ली लाया गया तो उनपर मुकदमें चलें।

लालकिले में बैठें अंग्रेज अफसरों ने इसमें मुख्य अभियुक्त बनाया उसमें मेजर शाहनवाज खान, कर्नल प्रेम सहगल और कर्नल गुरबक्श सिंह ढिल्लों प्रमुख थें।

अंग्रेज इनसे परेशान हो चुके थें और इनपर कई हत्याओं के साथ-साथ ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध लड़ाई का अभियोग चलाया गया।

बन्दी बनायें गये आजाद हिन्द फ़ौज के वीर सैनिकों की रिहाई के लिए पुरे देश में अनेक जगह प्रदर्शन हुए।

जनवरी, 1946 में मुम्बई और कराची में नौसेनिक विद्रोह हो गया।

पुरे देश का माहोल देश-प्रेम में ऐसा उत्साहजनक हो गया कि ब्रिटिश हुकूमत घबरा गई।

पराजय के बावजूद आजाद हिन्द फ़ौज के भारत देश की स्वतंत्रता के लिए बहुत दूरगामी परिणाम हुए।

आजाद हिन्द फ़ौज थी ही ऐसी कि उसमें सभी जाति और धर्म के लोगों की भागीदारी थी, यहाँ  तक महिला रेजिमेंट भी इसमें शामिल थी।

सन 1946 की फरवरी में इनकी सुनवाई पूरी हुई और आजाद हिन्द फ़ौज के बन्दियों को छोड़ना शुरू हुआ। आज यह सब आम जनता की निगाह में एक अमर स्वाधीनता सेनानी हैं।

आजाद हिन्द फ़ौज की पराजय का कारण

इंग्लेंड के साथ अमेरिका और रूस के सहयोग देने पर और जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहर में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराने पर, जापान बुरी तरह हार गया और इस प्रकार आजाद हिन्द फ़ौज को भी हार का सामना करना पड़ा, क्योंकिं उन्हें ना तो रसद मिल रही थी और ना ही खाना और पानी।

आजाद हिन् फ़ौज के विघटन के बाद नेताजी सुभाष द्वारा भारत की जनता के नाम सन्देश

“भारतीय स्वाधीनता संग्राम का यह पहला अध्याय संपन्न हुआ। इस अध्याय के दौरान पूर्व एशियाई योद्धाओं का योगदान स्मरणीय रहेगा।

हमें अस्थाई सफलता से निराश होने की जरूरत नहीं है। विश्व की कोई शक्ति अब भारत को गुलाम बनाये नहीं रख सकेगी।“

उन्होंने अपनी अस्थाई सरकार के साथ अंतिम बैठक 15 अगस्त, 1945 को की। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि सुभाष जी, अपने कुछ साथियों के साथ टोक्यों के लिए रवाना हो जाये।

इन साथियों में आबिद हसन, देवनाथ दास, एस ए अय्यर, हबीबुर्ररहमान आदि शामिल थें।

बताया जाता है कि यह लोग एक विमान द्वारा बैकांक से सिगान रुककर सोवियत रूस की ओर चल दिये।

कहा जाता है कि सैगोन में सुभाष जी को एक बड़े विमान में बैठाया गया। इस विमान में उनके साथी शोदोई और हबीबुर्ररहमान भी थें।

इसके बाद 18 अगस्त को सुभाष एक लड़ाकू विमान के जरिये फारमोसा (अब ताईवान) से रवाना हुए।

 इसके बाद यह सुचना मिली कि यह विमान अत्यंत रहस्यमय तरीके से लापता हो गया।

यह रहस्य आज तक रहस्य ही बना हुआ है। एक घोषणा टोक्यों के एक रेडियो में हुई कि ताइहोकू हवाई अड्डे में उड़ान भरते समय ही विमान दुर्घटना ग्रस्त हो गया।

इस दुर्घटना में विमान चलाने वाले के साथ जापानी जनरल शोदोई भी नहीं रहें।

कहते हैं कि सुभाष जी बच गये थे, लेकिन बुरी तरह जल गये थें और एक सैनिक अस्पताल में ईलाज के दौरान उन्होंने अंतिम साँस ली।

कर्नल हबीबुर्ररहमान के अनुसार उनका अंतिम संस्कार 20 अगस्त को ताइहोकू में कर दिया गया। सितम्बर महीने में सुभाष जी की अस्थियाँ ले जाकर जापान में टोक्यों के रेंकोजी मंदिर में रखी गई।

नेताजी की मृत्यु इस प्रकार होगी, किसी भी भारतीय को विश्वास नहीं थी। उनकी मृत्यु को लेकर यह भी कहा गया कि उनकी मृत्यु को लेकर एक षड़यंत्र रचा गया।

और ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं है जो यह मानते हैं कि सुभाष जी जीवित हैं। जो भी हो स्वयं उनके भाई ने भी यह मानने से इनकार कर दिया की उनकी मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई हैं।

तीन जांच आयोग

नेताजी की मृत्यु को लेकर तीन जांच आयोग गठित की गई।

पहले दो आयोग ने विमान दुर्घटना के लिए कही गई बात को स्वीकारा, लेकिन यह बात सामने आई कि इस सन्दर्भ में आयोग ने ताइवान सरकार से कोई बातचीत नहीं की।

तीसरे मनोज कुमार मुखर्जी आयोग ने 1999 में जब ताइवान सरकार से इसके बारे में जानकारी ली तो सरकार ने कहा कि 1945 में हमारे देश में कोई भी विमान दुर्घटना नहीं हुई।

मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दी, लेकिन सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया। 


सार्वजनिक फाईलें

नेताजी की कुछ गोपनीय फाईलों को सार्वजनिक किया गया। ऐसी 25 फाईलों से पता चला है कि इस बात का कोई भी रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं कि सन 1945 में वह सोवियत संघ में ठहरे थें।

29 जुलाई 2016 को सार्वजनिक की गई 25 दस्तावेजी फाइलों में कई तथ्य सामने आयें हैं। एक फाईल में पता चला है कि सुभाष जी का सन 1945 में ठहरने का कोई भी रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं।


नेताजी द्वारा भारतीयों को दिया गया एक भाषण

अब मैं आपसे कुछ और चाहता हूँ। जवान, धन और सामग्री अपने आप आजादी नहीं दिला सकते। हमारे पास ऐसी प्रेरक शक्ति होनी चाहिये जो हमें बहादुरी और नायको जैसे काम करने को प्रेरित करें।

विजय अब हमारी पहुँच में नजर आ रही है, लेकिन यह समझना बड़ी गलती होगी कि हम अपने जीते जी भारत को आजाद देख ही लेंगें।

यहाँ मोजूद लोगों में किसी के मन में अभी आजादी के मीठे फलों का आनंद उठाने की कामना नहीं होनी चाहिए। अब भी एक लम्बी लड़ाई सामने है।

हमारी एक ही कामना होनी चाहिए और वह है मरने की कामना। ताकि भारत जी सके। एक शहीद की मौत मरने की इच्छा, ताकि आजादी की राह शहीदों के खून से तैयार हो सके।

स्वतंत्रता के इस युद्ध में, मैं आपसे बस एक ही चीज माँगता हूँ। सबसे पहले मैं आपसे खून माँगता हूँ, यह खून ही अब खून का बदला लेगा जो शत्रु ने बहाया है।

आजादी की कीमत खून से ही चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो, मैं तुमसे आजादी का वादा करता हूँ।“


महान लोगों के द्वारा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी के बारे में

महात्मा गांधी जी द्वारा “नेताजी ने सचमुच दिखा दिया है कि अखंड रास्ट्रीयता की भावना कैसे उत्पन्न की जा सकती है। हमें उनके आदर्शों का स्मरण रखना चाहिए और अपने जीवन में उनका अनुसरण करना चाहिये।“    

जापान के भूतपूर्व विदेश मंत्री द्वारा “नेताजी एशिया के महानतम क्रांतिकारी और हमारे युग के सबसे बड़े नायक थे।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वेंकटरमन के शब्दों में “नेताजी ने जो महान पहल की, वह वास्तव में एशियाई पहल थी, जिसके कारण समूचे एशिया में उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद को समाप्त करने में मदद मिली।

डॉक्टर जोसेफ लारेल फिलीपींस के राष्ट्रपति 

’नेताजी सुभाषचंद्र बोस’ नाम से ही उस सिंह-गर्जना का स्मरण हो आता है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को नीवं को हिलाकर रख दिया था।“

मैं अपने जीवन में अनेक महापुरुषों से मिला हूँ। बोस उनमें से सबसे अधिक महान थे। 

श्रीमती इंदिरा गांधी उनके द्वारा स्थापित एवं निर्देशित आजाद हिन्द फ़ौज ने निराश जनता के मष्तिष्क पर बिजली जैसा असर किया था जो हमारी आजादी से पहले ही बन गई थी और को पूर्व के गहनतम अन्धकार से उदित हुई थी

शिन्गमस्यु जापान के विदेश मंत्री 

नेताजी ऐशिया के महानतम क्रांतिकारी तथा हमारे युग के सबसे बड़े नायक थे

शेख मुजीबुर्रहमान, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री

नेताजी के आदर्श सृस्टि के अंत तक प्रेरणा देते रहेंगें




आजाद हिन्द फ़ौज का कौमी तराना

कदम-कदम बढ़ाये जा

ख़ुशी के गीत गाये जा

यह जिंदगी है कौम की

तू कौम पर लुटाये जा

बढ़ाये जा, कदम-कदम बढ़ाये जा।  

तू शेरे हिन्द आगे बढ़

मरने से तू कभी ना डर

उड़ा दे तू दुश्मनों के सर

जोशे -वतन बढ़ाये जा

बढ़ाये जा, कदम-कदम बढ़ाये जा।   

हिम्मत  तेरी बड़ी रहे

खुदा तेरी सुनता रहे

जो सामने आये तेरे

तू ख़ाक में मिलाये जा

बढ़ाये जा, कदम-कदम बढ़ाये जा।  

चलो दिल्ली पुकार के

कौमी निशां संभाल के

लालकिले पे गाड़ के

लहराए जा लहराए जा

बढ़ाये जा, कदम-कदम बढ़ाये जा।          

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी आप हमारे प्रेरणास्रोत हैं और हमेशा रहेंगें।

कोई भी आपकी जगह नहीं ले सकता है. यदि हम अपनी ओर से समाज के लिए थोड़ा भी सहयोग किसी ना किसी रूप में दें, तो यह हम सबकी ओर से आपके प्रति  सच्ची श्रद्धा होगी। 

SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं

clcik करें नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के दिल को छू लेने वाले अनमोल विचार

आपसे विनती है कि आप इस पोस्ट को जरूर share, comment और सब्सक्राइब करें, ताकि सभी को हमारे देश के महान नहीं महानतम पुरुष के विषय में पता चल सकें।  

आपका शुभचिंतक

प्रकाश चंद जोशी
HAMAARIJEET.COM

                       

 

      

    

         

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