भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet

महामना मदन मोहन मालवीय काशी विश्वविद्यालय की स्थापना करने के साथ ही इस युग के आदर्श पुरुष भी थें। वे भारत के पहले और अंतिम व्यक्ति थे, जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। यानि आजतक किसी ओर को महामना की उपाधि नहीं दी गई। भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet

महात्मा गांधी जी और लोकमान्य तिलक जी के बाद पंडित मदन मोहन मालवीय जी ही भारत के सबसे लोकप्रिय नेता थें।

सभी भारतीयों में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वह संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी भाषा के बहुत अच्छे विद्वान थें।       

पत्रकारिता, वकालत, समाज-सुधारक, मातृ-भाषा और भारत माता की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वाले इस महामानव ने जिस विश्वविद्यालय की स्थापना की,

उसमें उनकी परिकल्पना ऐसे विधार्थियों को शिक्षित करके देश सेवा के लिए तैयार करने की थी जो देश का मस्तक गौरव से ऊँचा कर सके।      

मालवीय जी सत्य, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति, आत्मत्याग में अग्रणी थें।  वें केवल उपदेश ही नहीं देते थें, बल्कि अपने दैनिक जीवन में उनका पालन भी किया करते थें।        

पंडित मालवीय जी अपने व्यवहार में मृदभाषी थें और कर्म ही उनका जीवन था। उन्होंने कभी भी रोष या कड़वी भाषा का प्रयोग नहीं किया।     

भारत सरकार ने 24 दिसम्बर 2014 को उन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया।




मालवीय जी के बारे में संशिप्त जानकारी

जन्म 25 दिसम्बर 1861 उतरप्रदेश के प्रयाग शहर में हुआ   

पिताजी पंडित ब्रजनाथ जी  

माताजी का नाम श्रीमती मूनादेवी  

प्राईमरी शिक्षा संस्कृत भाषा में ली

आगे की शिक्षा उन्होंने प्रयाग के जिला स्कूल से की

1879 में म्योर सेंट्रल कॉलेज प्रयाग से 10वीं की शिक्षा उत्तीर्ण की, वर्तमान में इलाहबाद विश्वविद्यालय

1884 में छात्रवृति लेकर उन्होंने आगे कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी ए की उपाधि प्राप्त की

उनकी हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा में भाषण देने की कला अदित्तीय थी

हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का सम्पादन करना

1924 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया।   

लीडर और हिन्दुस्थान टाइम्स की स्थापना का श्रेय मालवीय जी को ही जाता है

गांधी जी उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थें और आधुनिक भारत का निर्माता कहा करते थें।

भारत देश में प्रथम और अंतिम व्यक्ति थे, जिन्हें महामना की उपाधि दी गई

वकालत पास की और प्रयाग उच्च न्यायालय में ख्याति प्राप्त वकील थें और उनका नाम पंडित सुंदरलाल, पंडित मोतीलाल नेहरु और श्री चौधरी के बाद लेने लिया जाने लगा 

देश सेवा के लिए उन्होंने वकालत छोड़ दी और फिर से निम्न जीवन जीने लगे

हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का श्रेय महामना मालवीय जी को ही जाता है

देश में इंजीनियरिंग और फार्मेसी शिक्षा का आरम्भ मालवीय जी ने ही किया   

मालवीय जी ने सत्यमेव जयते के नारों को जन-जन तक पहुचायाँ

भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet


पूर्ण परिचय

अपने ह्रदय की महानता के कारण पुरे भारत में महामना के नाम से पूज्य मालवीय जी को विश्व में सत्य, दया और न्याय पर आधारित सनातन धर्म सर्वाधिक प्रिय था। 

वें अपने माता पिता से उत्पन्न सात भाई-बहनों में पांचवें नंबर में थें।

मध्य भारत के मालवा प्रान्त से प्रयाग आ बसे उनके पूर्वज मालवीय कहलाते थें। आगे चलकर वही नाम उन्होंने भी अपना लिया।

उनके पिताजी पंडित ब्रजनाथ जी संस्कृत भाषा के उच्च कोटि के विद्वान थें। 

“सिर जाय तो जाय प्रभु ! मेरो धर्म ना जाय” मालवीय जी का जीवन व्रत था जिससे उनका व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन समान रूप से प्रभावित था।

यह आदर्श उन्हें बचपन से ही उनके दादा जी प्रेमधर चतुर्वेदी, जिन्होंने 108 दिन निरंतर 108 बार श्रीमदभागवत का पाठ किया था से राधा-कृष्ण की भक्ति,

पिता ब्रजनाथ जी द्वारा भागवत-कथा से धर्म-प्रचार और माता मूनादेवी जी से दुखियों की सेवा करने की शिक्षा मिली।

परिवार में धन की कमी होने के बावजूद उन्हने किसी भी चीज का लालच ना था।

कालेज के दिनों में ही मालवीय जी अखाड़े में व्यायाम और सितार पर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा वे बराबर देते रहे।

उन्हें व्यायाम करने में इतनी रूचि थी कि वह 60 वर्ष की आयु तक व्यायाम करते रहे।

भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet




भाषण देने की कला में अदित्तीय

मात्र सात वर्ष की अवस्था में विद्यालय के देवकीनंदन उन्हें मेले में खड़ा करके बोलने को कहते थे और आगे चलकर वह भाषण शैली मने इतने प्रखर हो गये कि देश के बहुत ही गिने-चुने व्यक्ति में से एक गिने जाने लगे।

कांग्रेस के दित्तीय अधिवेशन में अंग्रेजी के प्रथम भाषण से ही प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध करने वाली अपनी भाषण देने की कला में पहचाने जाने लगे।

यही नहीं वह उस समय के भारत देश के सर्वश्रेष्ठ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के प्रखर वक्ता थे।

कलकता अधिवेशन में मालवीय जी द्वारा दिया गये भाषण से राजा रामपाल सिंह बहुत प्रभावित हुए।

उन्होंने प्रतापगड़ से स्वयं के द्वारा प्रकाशित हिंदी समाचार पत्र हिन्दोस्थान के सम्पादन के लिए अनुरोध किया।

उन्होंने एक शर्त में सम्पादन करने का अनुरोध स्वीकार किया कि “आप जब भी मदिरा का सेवन करें, मेरे पास ना आये और ना ही मैं आपके पास आउंगा, क्योंकि मेरे भी कुछ नियम है।“

जिसे  रामपाल सिंह ने स्वीकार कर लिया। लेकिन कुछ समय बाद एक बार रामपाल सिंह अपनी शर्त भूल गये और मदिरा पी कर उनके पास जा पहुचें।

उसके बाद मालवीय जी ने हिन्दोस्थान के सम्पादन का पद त्याग दिया और लाख मनाने पर भी वापस पद स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने रोलेट बिल के विरोध में लगातार साड़े चार घंटे और अपराध निर्मोचन बिल पर पाँच घंटे का भाषण पूरी निर्भयता और गंभीरतापूर्ण से दिया।

उनके दिये गये भाषण में ह्रदय को छू कर रुला देने की क्षमता थी, लेकिन गलत कार्य करने के लिए कभी भी सुनने वालों को उकसाते नहीं थे।




धर्म संस्कृति की रक्षा करना

सनातन धर्म और हिन्दू संस्कृति की रक्षा करने में मालवीय जी का स्थान प्रमुख है।

हिन्दू जाति को विनाश से बचाने के लिए उन्होंने हिन्दू संगठन का शक्तिशाली आन्दोलन चलाया और धर्म के मानने वालों के लगातार विरोध झेलने के बाद भी उन्होंने कलकता, काशी, प्रयाग और नासिक में निम्न जाति के लोगों को धर्मोपदेश और मंत्रदीक्षा दी।

पंडित नेहरु जी ने स्वयं लिखा है “अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनितिक प्रतिक्रियावादी से मुक्त रखा और अनेक बार धर्मो के सह-अस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया।       

वे हिन्दू धर्म को मानने वाले थें और परन्तु हिन्दू धर्म को छोड़कर दुसरा धर्म अपना लेने वालो को पुनः हिन्दू बना लेते थें। वें तीन बार हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने गये।     

शिक्षा और सुधार कार्यों के नाम पर अंग्रेज अधिकारी हिन्दू धर्म के मूल सिद्धातों पर प्रहार करते थें।

अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने के लिए वह ज्यादा से ज्यादा प्रलोभन का लालच देककर धर्म परिवर्तन करते थें।

यह सब देखकर मालवीय जी को बड़ा दुःख होता था। वे किसी भी धर्म को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे।

उनके द्रष्टि में सभी धर्मों में मानवता का सन्देश निहित है, परन्तु किसी एक धर्म की श्रेष्ठता बताने के लिए दुसरे धर्म का अपमान करना उन्हें सहन नहीं था।  


कई अनेक उल्लेखनीय कार्य करना

हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 से सम्पादन करके दो-ढाई साल तक जनता को जगाया।

कई अन्य पत्रिकाओं का सम्पादन करने के बाद 1924 में दिल्ली आकर हिन्दुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया और सनातन धर्म को गति प्रदान करने के लिए विश्वबंध जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया।

हिंदी भाषा की भारत की रास्ट्रीय भाषा दिलाने के लिए सकारात्मक प्रयास करके उसकी नीव रखी

अंग्रेज़ों ने शिक्षा का माध्यम कैसा हो?  इसके लिए 1882 में एक शिक्षा का कमीशन बिठाया और इसके लिए पंडित मदन मोहन मालवीय और ‘भारतेन्दु’ हरिश्चन्द्र जी चुने गये

परन्तु भारतेंदु जी का स्वास्थ्य ठीक ना होने के कारण जा ना सके। मालवीय जी गये।    

हिंदी साहित्य का जो प्रथम अधिवेशन काशी 1910 में हुआ था,

उसमें उन्होंने कहा था कि “हिंदी को फ़ारसी-अरबी के बड़े-बड़े शब्दों से लादना जैसे बुरा है, वैसे ही अकारण संस्कृत शब्दों से गूंधना भी अच्छा नहीं और भविष्यवाणी की कि एक दिन यही भाषा राष्ट्रभाषा होगी।“


1919 के बंबई अधिवेशन में सभापति के पद से उन्होंने हिंदी-उर्दू के प्रश्न को, धर्म का नहीं अपितु रास्ट्रीयता का प्रश्न बताते हुए कहा था कि हिंदी-उर्दू का प्रश्न को, धर्म का नहीं अपितु देश का प्रश्न बताते हुए कहा था

“साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा के द्वारा ही हो सकती है।” उन्होंने भविष्यवाणी भी की कि कोई दिन ऐसा भी आयेगा कि जिस तरह अंग्रेजी विश्व भाषा हो रही है उसी तरह हिंदी का भी सर्वत्र प्रचार होगा।


कांग्रेस के निर्माताओं में प्रसिद्ध मालवीय जी एक थे, जिन्होंने कांग्रेस के दित्तीय अधिवेशन 1886 से लेकर अपनी अंतिम सांस तक स्वराज्य के लिए कठोर तप किया।

नरम और गरम दल के बीच की कड़ी मालवीय जी ही थे जो गाँधी-युग की कांग्रेस में हिन्दू-मुसलमानो और उसके अलग-अलग मतों में सामजस्य बिठाने में हमेशा प्रयत्नशील रहे।

एनी बेसेंट ने ठीक ही कहा था “मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीय जी भारतीय एकता की मूर्ति बने हुए खड़े हैं।“

असहयोग आन्दोलन के आरम्भ में नरम दल के द्वारा कांग्रेस छोड़ने पर मालविय जी  उसमें डटे रहे और कांग्रेस ने उन्हें चार बार सभापति का पद देकर उन्हें सम्मानित किया, लाहौर 1909 में, दिल्ली में 1918 व 1931 और कलकत्ता में 1933 में।


स्वतंत्रतता के लिए उनकी तड़प और प्रयासों की उनकी एक झलक कांग्रेस अधिवेशन 1936 में दिये गये उनके भाषण से मिलती है को स्मरणीय हैं

“मैं पचास वर्ष तक कांग्रेस के साथ हूँ। संभव है, मैं बहुत दिनों तक ना जीयूं और अपने जी में यह कसक लेकर मरू कि भारत अब भी पराधीन है। किन्तु फिर भी मैं यह आशा करता हूँ कि मैं इस भारत को स्वतन्त्र देख सकूँगा।”      




दुखियों के आसूँ पोछने वाले मालवीय जी को ऋषिकुल हरिद्वार, गो रक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, boy स्काउट व अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ।

परन्तु उनका प्रमुख श्रेय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना है, जो उनके अनंत प्रयासों से सफल हुआ।

भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet


वकालत में नाम कमाना

मालवीय जी वकालत पास करने के बाद प्रयाग के उच्च न्यायालय में पहुँच गये।

वे मुकदमें की पैरवी बड़े धैर्य और कुशलता से करने लगे।

वकालत में सफल होने के तीन बड़े गुण मालवीय जी में थे – मुक़दमे की पक्की तैयारी, प्रभावशील वाणी और अपने मुकदमें को ऐसे ढंग से रखने की कला कि सुनने वाला तत्काल बात मान लें।

वें कानूनी पक्ष को इस ढंग से प्रस्तुत करते थे कि उनके विरोधी वकील भी उनके तर्कों और तथ्यों का खंडन नहीं कर पाते थें।      

वकालत के क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि चौरी-चौरा के 170 अभियुक्तों में से 151 को फाँसी से बचा लिया था।

इसके लिए उन्होंने पूरी-पूरी रात पुस्तकें पढ़कर इन अभियुक्तों को फाँसी से बचाया।

वकालत में उन्हें अच्छा पैसा मिलने लगा जिससे सभी तरह जरुरत पूरी होने लगी और उनका परिवार भी अब अच्छी आर्थिक दशा में आने लगा।

परन्तु उनका सपना तो देश की सेवा करने का था, इसलिए उन्होंने कुछ समय बाद अपनी वकालत को छोड़कर, अपने आपको पूरी तरह देश की सेवा के लिए अर्पित कर दिया।


मालवीय जी सनातन धर्म को मानने वाले थें और वें धर्म को देश की लिए शांति, समृधि और विकास का साधन बनाना चाहते थें।

वे धर्म की उन्नति में देश और समाज की उन्नति और धर्म के उद्धार में देश का उद्धार मानते थे।

मालवीय जी देश की एकता में उन्नति और विकास का प्रतिबिम्ब देखते थे। उनका कहना था. “भारतवर्ष केवल हिन्दुओं का देश नहीं है बल्कि यह तो मुस्लिम, ईसाई और पारसियों का भी देश है।

यह देश तभी और शक्तिशाली हो सकता है, जब भारतवर्ष की विभिन्न जातियाँ और यहाँ के विभिन्न सम्रदाय पारस्परिक सदभावना और एकात्मा के साथ रहें।

जो भी लोग एक एकता को भंग करने का प्रयास करते हैं, वे केवल अपने देश के ही नहीं वरन अपनी जाति के भी शत्रु होते हैं।


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्रित करने पर अनेक कठिनाईयां आई     

मालवीय जी ने जब हैदराबाद के निजाम से सामने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कुछ दान स्वरूप देने को कहा, तो निजाम ने मना कर दिया

और एक शवयात्रा के पीछे फेंकें जाने वाले पैसे को इकट्ठा करने लगे।

लोगों ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने ने बड़े विनर्म स्वभाव से कहा कि “यह उनके और निजाम यानि दोनों के लिए शर्म की बात होगी कि वह निजाम के यहाँ से खली हाथ लोटे।

बाद में निजाम ने विवश होकर कुछ ना कुछ देने की लिए विवश होना पडा।

इस पर उन्होंने कहा भी कि

मर जाऊं मांगू ना अपने तन के काज।

परमारथ के कारने मोहि ना आवे लाज।।

विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए धन जुटाने के लिए वह भारत के कोने-कोने गये और अपने आपको भारत का भिखारी मानने वाले इस महामना की मेहनत रंग लाई

और 4 फरवरी 1916 को वसंपंचमी के दिन वाइसराय लार्ड हार्डिंग्ज के द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की नीव रखी गई।


महामना मालवीय जी स्त्री शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे।

उनके विचार से स्त्री शिक्षा पुरुषों से अधिक जरुरी है क्योंकि यह पीड़ियों का निर्माण करती है।

मालवीय जी यह चाहते थें कि विद्यालयों में संगीत, काव्य, नाटककला, चित्रकला, वास्तुकला, और मूर्तिकला आदि ललित कलाओं की शिक्षा का भी प्रबंध हो।

उनकी कामना थी कि उनका विश्वविद्यालय जीवन और ज्योति का केंद्र बने और यहाँ के विधार्थी ज्ञान में संसार के दुसरे प्रगतिशील देशों के विधार्थियों के समान हो और अच्छा जीवन बिताने के योग्य बनें और समाज की सेवा भी करें।    




मालवीय जी देशप्रेम, सच्चाई और त्याग की प्रतिमूर्ति थें।

एक मनीषी थें और थे माँ भारती के सच्चे सपूत।

इन्हें सदा दूसरों की चिंता सताती रहती थी। दूसरों के विकास के लिए, लोगों के कष्टों को दूर करने के लिए ये सदा तत्पर रहते थे।

इनका ह्रदय सदा कोमल और स्वच्छ था। दूसरों की पीड़ा इनसे सही नहीं जाती थी।  सन 1934 में दरभंगा में भुकुम्प पीड़ितों की सेवा और सहायता इन्होने जी-जान से की थी।

कई लोग मदन मोहन की व्याख्या करते हुए कहते थे कि जिसे न मद हो, ना मोह, वह है मदन मोहन।

इस मनीषी की महानता को नमन करते हुए महामना शब्द भी इनके नाम के आगे जुड़कर अपने आप को भाग्यशाली समझने लगे।

गाँधी जी इन्हें नररत्न कहते थें और अपने को इनका पुजारी।

मालवीय जी तुस्टीकरण की नीतियों के खिलाफ थे। उन्होंने 1916 में मुसलामानों के लिए अलग निर्वाचन मंडल के गठन का विरोध किया।  

माँ भारती का सच्चा सेवक और ज्ञान, सच्चाई का सूर्य 12 नवम्बर 1946 को सदा के लिए अस्त हो गया।

भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet


देश के कई महान विद्वानों ने उनके प्रति अपने विचार रखें हैं

गाँधी जी ने उनके निधन पर लिखा “मालवीय जी अमर हैं प्रारम्भिक यौवन से लेकर परिपक्व वृद्धावस्था तक परिश्रम ने उन्हें अमर बना दिया है।

वें अपने अनुयायिओं के सेवक थे। समझोते के भावना उनके स्वभाव का अंग था। उनका जीवन पवित्रता का मूर्तिमान रूप था।

वे करुणा और कोमलता के निधान थें। 

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी ने लिखा “एक महान व्यक्तित्व आज संसार में उठ गया।

पंडित मालवीय जी के काम और नाम से भावी पीढ़ी की यह प्रेरणा मेलेगी कि दृढ शक्ति से मनुष्य के लिए सब कुछ संभव है।

मालवीय जी की सेवायें बहुत ऊँची है और कुछ शब्दों में उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। मालवीय जी के रिक्त स्थान की पूर्ति नहीं हो सकती, वें सच्चे देश भक्त थें।        

श्री गोपालकृष्ण गोखले ने कहा था “त्याग तो मालवीय जी महाराज का है। वें निर्धन परिवार में उत्पन्न हुए और बड़ते-बड़ते प्रसिद्ध होकर सहस्त्रों रुपया मासिक कमाने लगे।

उन्होंने वैभव का स्वाद लिया और जब देश से मात्रभूमि की सेवा की पुकार उठी तो उन्होंने सब कुछ त्यागकर पुनः निर्धनता स्वीकार कर ली।“ 

पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा “हमें अत्यंत शोक है कि हम अब इस उज्जवल नक्षत्र का दर्शन नहीं कर सकेंगें जिसने हमारे जिवन में प्रकाश दिया, बाल्यकाल से ही प्रेरणा दी तथा भारत से प्रेम करना सिखाया।“ 

कोटि-कोटि नमन हैं, ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनि और देश के लिए समर्पित सच्चे सेवक। इनके लिए जितना भी कहा जाये कम है।

इसे share, comment और subscribe जरूर करें।

भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय की जीवनी in hindi Hamaarijeet

अन्य महापुरुषों के बारे में जानने के लिए पढ़ें

SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं



भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़े

LAL BAHADUR SHASTRI JI भारत के सच्चे सपूत, लाल बहादुर शास्त्री जी

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

Dr Radhakrishnan second president of india

Dr. Bhimrao Ambedkar ji ke jivan ka sangharsh in Hindi

Chandra Shekhar Azad Mahaan Krantikari true story in Hindi

hamaarijeet.com   

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here