भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़े

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भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी
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भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़े

अनेक क्रांतिकारियों में एक क्रांतिकारी खुदीराम बोस भी था जो 18 वर्ष की युवा अवस्था में देश के लिए शहीद हो गया। उसकी केवल एक ही आरजू थी कि मेरा देश जल्द-से-जल्द अंग्रेज़ों की गुलामी से स्वतन्त्र हो जाये। भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़ें 

3 दिसम्बर, 1889 को बंगाल के मिदनापुर में खुदीराम बोस का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया और पिता का नाम त्रेलोक्यनाथ बसु था।

त्रेलोक्यनाथ की तीन लड़की थी, बड़ी का नाम अपुरुपा देवी, मझली सरोजनी और छोटी ननिबाला थी।

तीन मुट्ठी टूटे हुए चावल में बहन द्वारा भाई को खरीदना

लक्ष्मीप्रिया के पहले भी दो बेटें हुए थें, जो जन्म लेने के बाद ही चल बसे थें और इस बार खुदीराम बोस का जन्म हुआ तो माता-पिता को भय होने लगा कि कहीं भगवान, हमसे हमारा यह पुत्र भी ना छीन लें।

इस भय से मुक्ति के लिए किन्ही बड़ी बुजुर्ग ने सलाह दी कि खुदीराम को बेच दो।

घर के अन्दर जब खुदीराम को बेचने की बात चल रही थी तो सबसे बड़ी बेटी, अपुरुपा बोली, “पिताजी भैय्या को मैं खरीदूंगी।“

“तू खरीदेगी, यह सब तो बड़ों के काम हैं” त्रेलोक्यनाथ बाबू बोले।

बड़ो के क्यों? “हम तीनों बहने अपने भाई को खरीदेगी और पालेगी भी।”

“चलो ठीक है, लेकिन अपने भाई को किस चीज के बदले खरीदोगी?”

“तीन मुट्ठी टूटे चावल से” और इस प्रकार खुदीराम को उसकी बड़ी बहन ने खरीदा ताकि खुदीराम को कुछ ना हो और वह उसे पाल सके।

खुदीराम हमेशा अपनी दीदी के पास ही रहता था   

खुदीराम जब चार महीने का था तो उसका लगाव सबसे ज्यादा अपनी बड़ी दीदी से था और वह हमेशा अपनी दीदी के गोद में चिपका रहता था।

इसी बीच अपरूपा के विवाह की बात भी चल रही थी, जो इस समय 15 वर्ष की हो चुकी थी और उस समय इस वर्ष में लड़की का विवाह हो जाता था।             

अनुरुपा का विवाह होना और खुदी से बिछड़ना  

1890 वर्ष की आयु में अपरूपा का विवाह तय हुआ और वह कुछ समय अपने घर पर ही रहने के बाद अपने ससुराल जाने लगी तो उस समय का दृश्य ह्रदय विदारक था।

नासमझ, एक वर्ष का बालक, अपनी दीदी की छाती से इस प्रकार चिपक गया की उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था।

माँ, लक्ष्मीप्रिया ने भी उसे अपनी ओर खिचां तो भी वो अपनी दीदी की साड़ी छोड़ ही नहीं रहा था और नन्हा बालक अपनी बहन के वियोग में  जोर-जोर से रो रहा था।

रोते-रोते नन्हें बालक का गला भर आया और आवाज भी बैठ गई।

दूसरी ओर उसकी दीदी भी उसके वियोग में रोने लगी और अंत में माँ, लक्ष्मीप्रिया ने उसे बहन की छाती से अलग किया।

दूसरी बहन सरोजनी का विवाह होना     

अभी खुदीराम तीन वर्ष का ही था तो दूसरी बहन सरोजनी का विवाह भी हो गया और अब घर पर ननिबाला ही बची थी जिसके साथ वह पुरे दिन खेलता रहता था।

माँ, लक्ष्मीप्रिया का देहांत होना

खुदीराम जब छह वर्ष का था तो माता जी का लम्बी बिमारी के कारण देहांत हो गया।

उसकी माता जी खुदीराम को बहुत प्यार करती थी, ऐसा नहीं है कि वों बेटियों को प्यार नहीं करती थी, बल्कि दो बेटों के मरने के बाद वह खुदीराम पर अपार स्नेह करती थी और अपने हिस्से का भोजन भी उसे खिला देती थी।

माँ की मृत्यु की खबर सुनकर दोनों बहन अपरूपा और सरोजनी भी आ गई और जब उन्होंने खुदी को भोजन के लिए कहा तो उसने साफ मना कर दिया, केवल दूध का सेवन किया।

वह बचपन से बहुत हठी था, जो उसकी इच्छा होती थी, उसे कर के ही दम लेता था।

बच्चों के पालन-पोषण के लिए पिता का दुसरा विवाह करना

लक्ष्मीप्रिया के देहांत के एक वर्ष के पश्चात त्रेलोक्यनाथ जी ने दुसरा विवाह किया ताकि दोनों बच्चों का पालन-पोषण हो सकें।

विवाह के बाद बेटी तो माँ के साथ काम में हाथ बटाने लगी, परन्तु खुदी बिल्कुल भी माँ से बात नहीं करता। जब पिताजी उससे पूछा “माँ से बात क्यों नहीं करते?”

तो वो बोलता “मुझे ज्यादा बातें करना अच्छा नहीं लगता।”

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पिताजी का भी देहांत होना

धीरे-धीरे त्रेलोक्यनाथ को दोनों बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता होने लगी, वो अपने आप में दोहरी जिन्दगी जी रहे थे, एक और तो पत्नी के प्रति उनका दायित्व पूरा ना होना और दूसरी ओर बच्चों की विमुखता, विशेषकर बेटे की।

और इसी चिंता में पड़कर उनका स्वास्थ्य दिन ब दिन बिगड़ता गया और वो भी इस दुनियां को छोड़कर चले गये।

अब खुदीराम अकेला पड़ गया था और जब उसकी बड़ी बहन आई तो वो बहन के कंधें पर सिर रखकर जोर-जोर से रोने लगा।

अपनी बहन से काफी विचार-विमर्श के बाद, जब उन्होंने अपनी नई माँ से पूछा कि “क्या तुम इन्हें पाल सकोगी? तो उसने असमर्थता दर्शा दी और बड़ी बहन ननिबाला और खुदीराम को अपने साथ अपने घर ले आई।

खुदीराम जब जाने लगा तो उसने अपने पिताजी को राजा नारजोल द्वारा दिये गये कीमती भेंट दुशाला को भी साथ ले लिया।      

माँ द्वारा उसके घुटने में लोहे का कड़ा पहनाना  

जब खुदी एक वर्ष का था तो उसकी लम्बी आयु के लिए उसके घुटने में लोहे का कड़ा डाला गया और बड़े होने पर तीन बार उस कड़े को माँ ने बदला था।

पहले माँ की मृत्यु और उसके बाद पिताजी की, इस आघात ने उस बच्चे को जिद्दी और विद्रोही बना दिया था।

इसलिए जब उसके जीजा जी ने अपनी पत्नी से कहा कि “वह कड़ा क्यों नहीं उतार देता” तो उसकी बहन बोली “उसे कुछ ना बोलों, उसे माँ के दिये गये कड़े से गहरा लगाव है, वह बड़ा होने पर खुद-ब-खुद उतार देगा”।

खुदी का मोहल्लें के लड़कों के साथ लड़ाई होना

खुदीराम का एक भांजा भी था जो उससे किवल डेढ़ या दो वर्ष ही छोटा था, जिसका नाम ललित था।

वो भागकर माँ के पास आया और बोला “माँ जल्दी चलो मामा की लड़ाई गली में लड़कों से हो रही है।

जब वो वहां पहुचें तो खुदी उनसे कह रहा था ”यें झूठ बोल रहे हैं और मैं इनकों झूठ बोलने की सजा दुंगा,

खुदी के क्रोध के दर से तीनों लड़कों ने जो उसपर गेंद चोरी का झूठा इल्जाम लगाया था उसे वापस ले लिया।

यह लड़ाई की घटना खुदी के साथ होती ही रहती थी और उसके बहन को भी चिंता थी कि कहीं उसके पति इन बातों से तंग आकर खुदी की पिटाई ना कर दें।

खुदीराम की बहन उसे अपने लड़के ललित से भी ज्यादा प्यार करती थी और करती भी क्यों ना, क्योंकि उसने अपने माँ से उसे तीन मुट्ठी टूटे चावल के बदले ख़रीदा था।

घुंघराले बालों वाला और घुटनों में लोहे के कड़े पह्नने वाला दुबला-पतला खुदीराम, जिसका चेहरा चमकता हुआ और आवाज शेर की तरह गरजती और रोबीली थी।

उसने कभी भी किसी से डरना नहीं सिखा और आठ वर्ष की अल्प आयु से ही समाज में व्याप्त कुरीतियों का विरोध करने लगा और कुछ भी गलत देखता तो भड़क उठता।


पढ़ाई की घटना

खुदी तो दिन-रात यही सोचता रहता, कैसे इन अंग्रेज़ों की गुलामी से हमारा देश आजाद होगा?

इस कारण उसका मन पढाई में भी नहीं लगता। एक दिन जब स्कूल में गणित की परिक्षा हो रही थी, तो खुदी दुसरे छात्र से अपना पेपर दिखाने के लिए कह रहा था।

उस समय कक्षा में कठोर परवर्ती के अध्यापक मोजूद थें, जिनसे सब बच्चें डरते थे, उन्होंने सब देख लिया।

जब वह खुदी के पास आयें तो उससे पूछा “तुम इससे क्या बात कर रहे थें?”

मैं इससे अपने हल किये हुए सवाल की कापी नक़ल के लिए मांग रहा था।

निडर होकर कहे गये, खुदी की बात को जब अध्यापक ने सूना तो वो बोलें “मैं तुम्हें सच बोलने के कारण छोड़ रहा हूँ और यदि दोबारा ऐसी गलती कि तो तुम्हारा स्कूल से नाम काट दिया जाएगा।

इस बातों का खुदी के दिमाग में इस प्रकार असर हुआ कि वह घर आकर सीधे अपनी बुक पढ़ने लगा।

यह देखकर उसकी दीदी भी बहुत खुश हुई, होती भी क्यों ना, किस बहन को अच्छा नहीं लगेगा कि उसका भाई मन लगाके पढ़ें।

धीरे-धीरे खुदी कक्षा में होशियार छात्रों में गिना जाने लगा, अध्यापक भी उससे खुश रहने लगे।

खुदीराम का पढ़ाई के अलावा अन्य साहित्य भी पढ़ना   

खुदी अपनी कक्षा की बुक के अलावा अन्य साहित्य की किताबों को भी घंटों तक पढ़ता रहता, जिसमें विवेकानन्द, बुद्ध, बकिमचंद आदि की किताबें होती थी,

अलग-अलग विषय की बुक पढ़ने पर वह घंटों तक सोचता रहता कि मैं अपनी आत्मा और शरीर के सुख के किये इस जीवन में नहीं आया हूँ, बल्कि वह किसी लक्ष्य के साथ पैदा हुआ हूँ।  


खुदी के निडरता होने की घटना   

जब खुदीराम 15 वर्ष का था तो उसने सोचा क्यों ना घने जंगल में जाया जाये और उसने यह बात अपने भान्जें, ललित जो उससे लगभग दो वर्ष छोटा था कही और उसने भी जंगल देखने के लालच में हाँ कर दी।

खुदी “ललित आज हम इस घने जंगल को पूरा छान कर ही, बाहर आयेंगें।

ललित “मामा मैंने सुना है कि जंगल में घुसने के बाद वापस आना बहुत मुश्किल होता है।

क्यों डरता है ऐसा कुछ भी नहीं है चल तैय्यार हो जा।

दोनों जंगल के अन्दर जाने लगे और जब वह अन्दर ही अन्दर गये तो वहां पर सूरज की रोशनी भी नहीं पढ़ रही थी चारों ओर ऐसा लग रहा था, मानो दिन में ही शाम हो गई हो और यह देखकर ललित डरने लगा।

मामा आगे-आगे डंडें से बड़ी-बड़ी झाड़ियाँ हटाता हुआ रास्ता बना रहा था और भांजा उसके पीछ-पीछे, जब उन्होंने घनी झाड़ियाँ पार की तो सामने बहुत बड़ा विशाल बरगद का वृक्ष था, जिसके चारों ओर घनघोर लताएँ लटकी हुई थी।

वृक्ष में अनगिनत चमगादरों को बसेरा था, जिसे देखकर बड़े से बड़ा व्यक्ति भी डरने लगे।

भांजा मामा से “मामा मैंने तो आज तक इतना विशाल पेड़ नहीं देखा है, यह तो ऐसे दिख रहा है जैसे हमें खायेगा, मुझे डर लग रहा है।

खुदीराम “डर मत, यह तो एक मामूली पेड़ है”

कुछ दूर आगे चलने पर उन्हें वृक्ष के पिछे से किसी जानवर के पीछा करने की आवाज आने लगी।

ललित ”मामा मुझे किसी जानवर की आवाज आ रही है “

मामा “कोई नहीं है, चलते रहो”

ललित ने जब पीछे देखा तो उन्हें, दो गिदड़ दिखाई दिये, जिनकी लार टपक रही थी, मानों यह सोच रहे हों कि आज का भोजन उन्हें मिल गया हैं।

मामा, भागों दो गीदड़ हमें घूर रहें हैं और हमारा पीछा भी कर रहे हैं।

खुदी ने जब देखा तो वो डरा नहीं बल्कि बोला “अरे! ये गिदड़ हैं, इनकी भभकियों से हम डरने वालें नहीं हैं” तभी खुदी ने एक पत्थर उठाया और उनकी और फेंका, पत्थर उनके बीच में जा गिरा।

दोनों गिदड़ जो लार टपकायें थें, सीधें हो गएँ और उन्होंने अपनी आँखें बड़ी-बड़ी कर ली कि जैसे बोल रहे हो, हम तुम्हें नहीं छोड़ेंगें।

ललित “मामा पत्थर फेंकने पर तो यह ओर गुस्से में आ गये, चलो भागते हैं”

खुदी “ऐसे मैदान छोड़कर कायर भागा करते हैं, तू देखता जा” फिर दोबारा खुदी ने पत्थर फेंका तो एक पत्थर गिदड़ के पैर में लगा, पत्थर लगने पर एक गिदड़ भाग गया और दुसरे वाला वहीँ खड़ा रहा।

दुसरे को लाठी की आवाज से भगाया तो वो भी वहां से गायब हो गया।

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खुदीराम का पुरे दिन जमीन पर लेटे रहना

एक बार खुदी और ललित जंगल से आ रहे थे तो उन्होंने देखा कि पास में ही एक शिव के मंदिर में सभी छाती के बल लेटे हुए शिव से वरदान मांग रहे थे।

जब पास जाकर उन्होंने एक से पूछा कि “प इस प्रकार लेट कर क्या कर रहे हैं।“

तो उस व्यक्ति ने जवाब दिया “बेटा, हम यहाँ पर शिव भगवान् से वर मांग रहे हैं।“

क्या ऐसा करने से इच्छा पूरी हो जायेगी?

हाँ, क्यों नहीं 

और तभी खुदी भी जो बालक अवस्था में था छाती के बल हाथ जोड़कर लेट गया।

उस समय शाम का समय था और ललित ने जब काफी देर तक मामा के खड़े होने का इन्तजार किया तो वह नही उठा

ललित ने कहा “मामा किसके लिए वरदान मांग रहे हो और कब उठोगे, घर नहीं चलना है क्या?

खुदी “मैं अंग्रेज़ों से मुक्ति के लिए अपनी भारत माँ की आजादी का वरदान मांग रहा हूँ और जब तक मेरी माँ आजाद नहीं हो जाती मैं यहाँ से नहीं उठूंगा।“

ललित के लाख समझाने पर भी जब वह नहीं उठा तो ललित भागता हुआ घर की ओर गया और सीधे सत्येंद्रनाथ जी के पास गया, क्योंकि वह जानता था कि मामा उन्ही की बात मानते हैं,

क्योंकि सत्येन्द्रनाथ क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे और देश के लिए एक संगठन भी बनाना चाहते थें।



घर पहुचने पर रात हो गई, ललित सत्येन्द्रनाथ जी से “सत्येन्द्र जी जल्दी चलो, जल्दी चलो, खुदी लेटकर मंदिर में प्रार्थना कर रहा है कि तब तक नहीं उठूंगा, जब तक मेरी धरती माँ अंग्रेज़ों से आजाद ना हो जाएँ।“

यह सुनकर सत्येन्द्रनाथ मन ही मन बहुत खुश हुए कि कोई तो है जो अपने देश की लिए कुछ भी करने के लिए राजी है और फिर बोले “अभी तो बहुत रात हो गई है सुबह चलेंगें और खुदी भी थककर खुद उठ जाएगा।“

जब दोनों सुबह जंगल के मंदिर में गये तो उन्होंने देखा कि खुदी उसी अवस्था में लेटा हुआ है और उसके उप्पर से सांप, कीड़े आदि घूम रहे थें।

जब सत्येन्द्रनाथ ने उसे कहा “खुदीराम खड़े हो जाओं।“

नहीं, मैं खड़ा तब तक नहीं होऊँगा जब तक मेरी भारत माता अंग्रेज़ों से आजाद नहीं हो जाती।“

काफी समझाने के बाद भी जब खुदी नहीं माना तो सत्येन्द्र जी ने फिर उससे कहा “खुदीराम मैं तुझे बताऊंगा कि किस प्रकार हमारा देश इन अंग्रेज़ों से आजाद होगा, चल खड़ा हो जा।“

इसके बाद खुदी उनकी दी गई शर्त पर खड़ा हो गया।


देश की आजादी के लिए सत्येन्द्रनाथ जी के साथ शामिल होना

सत्येन्द्रनाथ जी ने खुदीराम को अनेक साहित्य पढ़ने के लिए दिये और अन्य युवकों को भी देश के लिए तैयार करने का जिम्मा सौपां।

उसे अपना सबसे विश्वस्नीय शिष्य का दर्जा दिया और उसे अपने संगठन को मजबूत करने के लिए जिम्मेदारी दी गई। इस कार्य के लिए खुदी के साथ और भी नवयुवक थें।

अलग-अलग टीम अपने कार्य के लिए रवाना हो गई।

खुदीराम गाँव-गाँव घुमा और उसने वहां के युवकों को प्रक्षिशण देना शुरू कर दिया कि “तुम सब अंग्रेज़ों का बहिष्कार करों और केवल स्वदेशी वस्तुओं का ही प्रयोग करों, कहीं भी स्वेदशी वस्तुएं दिखें तो उसे जला दों।“   

क्रांतिकारी गतिविधि के दौरान एक दिल को छू लेने वाली घटना का होना

खुदीराम गाँव-गाँव घुमकर कार्य कर रहा था और उसके पास जो भी थोड़ी बहुत पूंजी थी वह ख़त्म हो चुकी थी और भूखे रहने की नोबत तक आ गई।

कहीं किसी गाँव में खाना मिल जाता तो खा लेता, नहीं तो पानी से ही गुजारा कर लेता।

इसी तरह वह एक दिन किसी दुरे गाँव जा रहा था, तो उसे खेत के पास एक बुजुर्ग व्यक्ति उदास और हतास बैठा हुआ दिखाई दिया जो अपने खेत की जमीन को निहार रहा था।       

उसने पास जाकर जब उस बुजुर्ग से उसकी परेशानी का कारण पूछा तो वह बोला “बेटा क्या बताऊ, लेकिन जब पूछ ही रहे हो तो बताता हूँ “एक समय मेरे पास 80 एकड़ खेत थे और मेरे दो बेटे खेत में काम करते थें।

घर पर किसी चीज की कमी ना थी, नौकर-चाकर भी थे। लेकिन पहले मेरे बड़े की मृत्यु हो गई और अभी एक दुःख से पीछा छुटा ही ना था कि छोटा बेटा भी चल बसा।

यही नहीं दोनों की शादी हो गई थी और बड़े बेटे की बहु तो अपने बच्चों को लेकर अपने घर चली गई लेकिन छोटी बहु और उसके दोनों बच्चें मेरे पास ही है।

कहते है ना कि जब दुःख आता है तो एकदम कहर बनकर टूटता है, इसके बाद जमीदार ने सूत ना देने के चक्कर में हमारी आधी जमीन हड़प ली और जो आधी बची है, वह बंजर है।

मैं अकेला इस खेत को कैसे जोतुगां , यह सोच-सोच कर ही परेशान हो जाता हूँ। अगर यह खेत में फसल नही बोयें तो एक दिन हम भूखे मर जायेंगें।

काफी देर तक खुदी सोचता रहा और फिर बुजुर्ग को बोला “आप बुरा ना माना तो फसल बोने में मैं आपका साथ दुंगा, आप ना मत करना।

यह सुनकर बुजुर्ग व्यक्ति रोने लगा और खुदी का आभार प्रकट करने लगा।

खुदी “नहीं-नहीं यह क्या कर रहे हो?”

बुजुर्ग व्यक्ति खुदी को अपने घर ले गया, घर पर दो छोटे बच्चें थे, जो एक कमरे से दुसरे कमरे में भाग रहे थें, वहीँ पर उनकी माँ साड़ी पहने हुए खड़ी थी।

सबसे पहले खुदी को कुछ चावल खाने को दिया क्योंकि घर पर कुछ और ना था।

चावल खाकर और पानी पीकर खुदी ने आराम किया और अगले दिन से खेत की ओर बुजुर्ग के साथ निकल गया।

“बाबा, मैंने आज तक खेती नहीं की है, लेकिन मुझे खेती करना जरूर सीखा देना कि खेती कैसे करते हैं?”

बुजुर्ग व्यक्ति ने उसे सबकुछ बताया और वो जल्द ही खेती करना सीख गया।

खेती करके जब वो घर जाता तो दोनों बच्चें उसके पास आते और वो उनके साथ खेलता और उन्हें पढ़ाता भी।

इस प्रकार वह यह कार्य रोज करता और गाँव वालों के भड़काने में भी वो नहीं आया और अपना काम करता रहा।

जब फसल आने लगी तो उसने निर्णय लिया कि अब चलना है।

उसने बुजुर्ग व्यक्ति से बोला “बाबा, अब मुझे चलना है, मेरी और भी जिम्मेदारियाँ हैं, उन्हें पूरी कर लूं।”

बाबा “बेटा, मुझे तो ऐसा लगा कि जैसे तूने मेरे दोनों बेटों की कमी पूरी कर दी, अगर हमारे साथ ही रुक जाता तो कितना अच्छा होता।“  

खुदी ने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखा और चलने लगा तो दोनों बच्चें जो अभी तक खेल रहे थे उदास हो गये।

जाते हुए बच्चों की माँ जो चुपचाप एक कोने में ख़ड़ी थे उनको खुदी ने आदर से प्रणाम किया और वहां से प्रस्थान किया।


अपनी दीदी अपरूपा के घर जाना

काफी महीनों के बाद खुदीराम अपनी दीदी के पास गया तो उसकी दीदी बोली “कहाँ था? बिना बताएं अपनी दीदी को कहाँ चला गया था? कितना कमजोर हो गया है? कुछ खाया भी है या नहीं?”

उसने दीदी को सबकुछ बता दिया।

दीदी “अपना ख्याल तो तूने बिल्कुल भी नहीं रखा, कभी खेती की भी है।“

मैं ना करता तो उनका परिवार भूखे मर जाता, अब उनके पास एक वर्ष तक भोजन की व्यवस्था हो गई है।

ललित सब सुन रहा था और बोला “माँ, मामा से सबकुछ पूछती रहोगी या कुछ खाने को भी दोगी।“

अपरूपा अन्दर गई और खुदी के लिए भोजन लाई और उसने भोजन किया और आराम करने चला गया।


बदूंक चलाना सीखना

सत्येन्द्रनाथ जी से जिद करके खुदीराम ने रिवाल्वर चलाना भी सीख लिया।

वह जंगलों में इसकी प्रैक्टिस करता और प्रक्षिशण के बाद उसका निशाना अचूक हो गया।

संगठन में धन का अभाव होना

कई युवक धन के अभाव में वापस आ गये थें और सत्येंद्रनाथ ने खुदी से कहा कि यदि धन का इसी तरह अभाव रहा तो एक दिन हमारा यह क्रांतिकारी संगठन ख़त्म हो जाएगा।   

यह बात खुदी के दिल में चुभ गई और उसने धन लुटने का निर्णय लिया और अंग्रेज़ों का डाक जो जंगलों से होकर जाता था, उसे अपने साथीयों के साथ मिलकर लूटा।

लुटने के बाद पुरे गाँव में लूट की खबर आग की तरह फैल गई और चारों ओर अंग्रेज जासूसी करे हुए घूमते रहे।

सबने अलग-अलग होकर जाने का फैसला किया और कोई भी नहीं पकड़ा गया।

इस प्रकार कुछ समय के लिए धन की सहायता से संगठन का काम कई दिन तक चलता रहा।


सत्येंद्रनाथ द्वारा खुदीराम को एक महत्वपूर्ण कार्य देना

सत्येन्द्र ने खुदी को तार भेजकर उसे शीघ्र बुलवाया और उसे गले लगाकर कहा “लम्बे जद्दोजहद और विचार-विमर्श के बाद तुम्हारे और प्रफुल चाकी के नाम का प्रस्ताव पास किया है।

तुम दोनों कई परीक्षाओं में सफल रहे हो। किंग्स्फोर्ड जैसे क्रूर खतरनाक अंग्रेज अधिकारी को मारने के लिए तुम्हें जिम्मेदारी दी जाती है।“

खुदीराम “मैं आपकी विश्वास की रक्षा प्राण देकर भी करूंगा।“

“अपने उप्पर सोपें गये दायित्व का निर्वाह करने में, मुझे जो ख़ुशी होगी उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।“ प्रफुल्ल चाकी ने कहा, वह वहीँ पर थें।

इसी बीच एक और क्रांतिकारी, हेमचंद कानूनगों भी वहां मोजूद थें जो सत्येन्द्रनाथ के समतुल्य थें। कानूनगों बम बनाने में माहिर थें और उन्होंने यह काम फ्रांस जाकर सिखा था।

कानूनगों ने खुदीराम को दो पिस्तौल और प्रफुल्ल को एक पिस्तौल और बम दियें।

खुदीराम “हम किंग्स्फोर्ड को सुनियोजित ढंग से सजा देंगें।“

किंग्स्फोर्ड एक क्रूर अंग्रेज अधिकारी था जो ज़रा सी बातों पर भारतियों पर अत्याचार करता था और अंग्रेज़ों के खिलाफ छपे अखबारों के संपादकों के सजा देने के लिए अवसर तलाशता रहता था।

उसका दिन- रात एक ही काम था किसी ना किसी तरह निर्दोष सच्चे देश-भक्तों को भयंकर सजा दी जाएँ, चाहे इसके लिए झूठे मुकदमें कर उन्हें जेल में ही क्यों ना डाला जाएँ।

कानूनगों दोनों को लेकर कलकत्ता आ गये

एक दिन खुदीराम वकील सैय्यद अब्दुल वहीद की बहन से मिलने गये तो उन्हें केवल इतना बताया “दीदी मैं एक बड़े कार्य के लिए जा रहा हूँ। आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।

उस मुस्लिम बहन की आँखें गिली हो गई थी और उसने खुदीराम की सिर पर हाथ रखकर बोला “अपने कार्य में खुदा तुहें सफल रखें।“             

कलकाता में कानूनगों उन्हें अपने वर्कशॉप ले गये, जहाँ उन्हें बम बनाना भी सिखाया और वह सीख भी गये।


मुज्जफरपुर के लिए प्रस्थान करना

खुदीराम बोस और प्रफिल्ल चाकी ने अपने नेताओं से दिशा-निर्देश लेकर अप्रैल, 1908 के दिन मुज्जफरपुर के लिए प्रस्थान किया।

अपने गुरु सत्येन्द्रनाथ से खुदीराम की यह अंतिम विदा थी।

किंग्स्फोर्ड को मारने की निति

प्लान के अनुसार वह स्टेशन पर उतरने के बाद सीधें ‘किशोरी मोहन’ की धर्मशाला रुके।

एक दिन आराम करने के बाद वह धर्मशाला से निकले ओर किन्स्फोर्ड के आने-जाने की जासूसी करने लगे और एक दूकान के माध्यम से पता चला कि किंग्स्फोर्ड रोज शाम को अपनी विक्टोरियन बग्गी से ‘यूरोपियन क्लब’ जाता है।



दो दिन तक उन्होंने किन्स्फोर्ड की जासूसी की कि कब वो क्लब की लिये चलता है?

किस रास्ते से जाता है? कब वापस आता है? जब उन्हें रास्ते और समय का पूरा आभास हो गया तो उन्होंने उसे मारने का प्लान, क्लब से रात में लोटने पर किया।   

दो दिन बाद जासूसी करने की बाद अगले दिन खुदीराम और चाकी एक झोलें में बम छुपाकर धर्मशाला से शाम के समय निकलें।

जब वह क्लब की और निकले तो पेड़ की ओट में उन्हें जाते हुए दोनों ने देख लिया था।

जब वह क्लब से बाहर आ रहे थें तो रात में चंद्रग्रहण था, जब वह बग्गी में बैठकर आधा रास्ता तय किया तो तभी खुदीराम ने बग्गी पर बम फेंक दिया।

बग्गी आधी जल गई और दो व्यक्ति मारे गये मिस केनडी और उसकी बेटी। किंग्स्फोर्ड बच निकला।

दरअसल उस दिन जब क्लब में किंग्स्फोर्ड था, तो उस समय मिस केनडी भी वहीँ थी, जिसकी तबियत खराब थी।

केनडी की बेटी ने एक दिन के लिए बग्गी से जाने के लिए आग्रह किया तो किंग्स्फोर्ड मना नहीं कर पाया, क्योंकि वह उसको पसंद करता था।

तो इस तरह किन्स्फोड बच निकला।

खुदीराम और चाकी बहुत खुश थें कि उन्होंने अपने मकसद को पूरा करने में सफलता मिल गई।

रात में रेलवे लाइन में काफी मील तक भागते रहे, खुदीराम तो नगें पावँ ही भाग रहे थे, क्योंकि उनका जुता भागते हुए घटनास्थल पर ही गिर गया था।

रात में भागते हुए उन्होंने लगभग 25 किलोमीटर की दुरी तय की।

भागते हुए उन्होंने निर्णय लिया कि अब हमें अलग-अलग होकर निकल जाना चाहिए ताकि साथ में रहकर किसी को पता ना चलें।

प्रफुल्ल “जीवित रहे तो कलकत्ता में मिलेंगें।“

“अभी तो हमें देश के लिए बहुत कुछ करना है।“ 

खुदीराम “सूरज निकलने से पहले हमें काफी यात्रा कर लेनी चाहिए, मित्र। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेज सरकार हमारे पीछे बुरी तरह पड़ी हुई होगी।“

प्रफुल्ल ने खुदीराम का माथा चूमा और कहा “तो फिर विदा मित्र।“ खुदीराम ने भी दोस्त का माथा चूमकर सुरक्षित निकलने की कामना की।


प्रफुल्ल का अलग होकर गाँव की और से ट्रेन का सफ़र करना

प्रफुल्ल नहर के पास सुबह की दिनचर्या पूरी करने के बाद आगे की ओर बड़ा। रास्ते में वह गाँव की ओर गया, वहां पर एक किसान उसे मिला, बोला “परदेसी हो बाबू।“

वह बोला “हाँ, काफी दूर से आया हूँ, थक चूका हूँ, थोड़ा पानी मिलेगा, क्या?”

गाँव वाले ने पानी पिलाया और प्रफुल्ल के पास थैला था, उसमे से वस्त्र निकाले और बदलें। अपनी पिस्तौल उन्होंने वस्त्र के अन्दर छुपा ली।

स्टेशन की ओर गये और टिकट खरीद कर माकामाघट की और जाने के लिए ट्रेन में चड़े।

सीट में बैठें, उन के बगल में एक अंगेजों का एक जासूस, बेनर्जी भी बैठा हुआ था।

वह प्रफुल्ल से मिठी-मिठी बातें करने लगा।

धीरे-धीरे जब प्रफुल्ल पूरी तरह खुल गया तो बेनर्जी को शक हो गया कि यह उन दो लड़कों में ही है जिन्होंने किन्स्फोर्ड को जान से मारने की कोशिश की थी।

स्टेशन आने पर बेनर्जी ने तुरंत जेब से सिटी निकालकर बजाना शुरू कर दिया, जिसे सुनकर अंगेज सिपाही आ गयें।  

जिन्हें देखकर प्रफुल्ल सचेत हो गये और भागने लगे कि तभी सिपाहियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

जब उन्होंने अपने आपको घिरा हुआ दिखा तो वो बेनर्जी की ओर देखते हुए बोले “ तुम देश के गद्दार हो, जीते जी तुम्हें अपने आप में धिक्कार होगा। हमारा क्या हैं, हमने तो अपनी जान अपने देश के लिए अर्पण कर दी है।“

बेनर्जी, प्रफुल्ल की ओर निचे नजर करते हुए चुपचाप देखता रहा।

प्रफुल्ल का देश के लिए बलिदान होना

जैसे ही प्रफुल्ल ने देखा कि अब मैं इनकी गिरफ्त से नहीं छुट सकता,

तो उन्होंने अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और अपनी गर्दन के निचे रखते हुए, पहले बोला “वन्देमातरम्, भारत माता की जय और पिस्तौल का टिगर दबाकर अपनी प्राण देश के लिए दे दिये।

उनके शहीद होने पर सभी लोग वहां एकत्रित हो गये, उन्हें भीगी नेत्रों से दर्शन और प्रणाम किया। वह

बलिदान दिवस था 01 मई 1908 

भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़ें 


खुदीराम बोस का गिरफ्तार होना

दूसरी ओर खुदीराम को सुबह बैनी स्टेशन से गिरफ्तार कर मुज्जफरपुर लाया गया।

जब वो चल रहें थें समस्त जनता इस वीर बालक को देखने के लिए उत्सुक थी। उनके डर से अंग्रेज़ों ने किसी को भी खुदी के पास आने नहीं दिया।

जब उन्हें जेल में ले जाया गया तो उन्हें अलग सेल में रखा गया।

कोर्ट में ले जाना 

खुदी को जिलाधीश, वूडमेन के कोर्ट में ले जाया गया और उनकी पैरवी के लिए दो अधिवक्ता उनसे मिलने आयें, जो आपस में बात कर रहे थें।

पहला “देखो दादा कितना सलोना और मासूम चेहरा है इस बालक का, हमें देखकर शांत भाव से मुस्करा रहा है।

दुसरा “आप ठीक कह रहें हैं, मेरे मन में भी इस भोले बालक के प्रति स्नेह उमड़ पड़ा है।“

एक भारतीय सिपाही खुदीराम के लिए एक प्लेट में बर्फी और पानी लेकर आया और खुदी को देते हुए बोला “लो लाला खा लो” यह सिपाही मजबूरी में अंग्रेज़ों के लिए कार्य कर रहा था लेकिन दिल से भारतीय था।

खुदीराम ने जवाब दिया “धन्यवाद, इसकी आवश्यकता नहीं है। बड़े विनर्म स्वर में उसने कहा।

तभी वूडमेन आ गये उन्होंने खुदीराम से पुछा “क्या यह सत्य है कि तुमने किन्स्फोर्ड की ह्त्या के इरादे से बग्गी में बम फेंका।“

“हाँ”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्होंने कलकत्ता में देश-हित में कार्य करने वाले, भारतीयों पर अनेक अत्याचार किये थें और उन्हें गहन यातनाएं दी थी।“

“तो इसके लिए तुम्हें कठोर से कठोर सजा दी जायेगी।

“तो देश को स्वतन्त्र कराने वाले वीरों पर जो अत्याचार करेगा, उसका हर्ष किन्स्फोर्ड की तरह ही होगा।

लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मेरे फेंके गये बम से दो निर्दोष महिलायें मारी गई।“

बाद में वूडमेंन ने अंग्रेज सिपाही से कहा “यदि ऐसे ही वीर बालक हुए तो हमें जल्द से जल्द देश छोड़कर जाना पड़ेगा।“

जज के सामने अपना अपराध कबूल करना



खुदीराम ने जज के सामने अपना अपराध स्वीकार्य कर लिया और कहा “मैंने और प्रफुल्ल ने मिलकर किंग्स्फोर्ड की ह्त्या करने के लिए बग्गी में बम फेंका है और इसका मुझे जरा भी अफ़सोस नहीं है।“

यह बात सुनकर पुरे कोर्ट में सन्नाटा छा गया, चक्रवती जो बोस की पेरवी करने आयें थें वो भी अचंभित रह गये, सबको उम्मीद थी कि बोस मना कर देंगें, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

जज बोस की तरफ देख के कह रहे थें “तुम हंस रहे हो, तुम्हें पता है कि इसकी सजा क्या है।“

फाँसी से ज्यादा और क्या हो सकती है, जज महोदय।

और अंत में मुकदमों और अपील के बाद 11 अगस्त 1908 को फाँसी की सजा की तारीख़ तय हुई।


जब खुदीराम से आखिरी इच्छा पूछी गई तो उनकी इच्छा तो अपनी बहन अपरूपा देवी और उनके बच्चों, अपने पथ प्रदर्शक सत्येंद्रनाथ और कानूनगों से मिलने की भी थी,

लेकिन अंग्रेज़ों के भय से की वह उन्हें यातनाएं ना दें, इसलिए उनसे नहीं मिलें।

लेकिन कलकत्ता में जब सैय्यद अब्दुल वहीद की बहन को पता चला तो वो उनसे मिलने के लिए जेल में आई और अपने साथ राखी भी लाई थी।

जब वह अपनी बहन से मिला तो मन ही मन ख़ुशी के मारे रोने लगा लेकिन उसने चेहरे से जरा भी प्रतीत नहीं होने दिया की उसका भाई रो रहा है।

जब बोस बहन से मिला तो उनके हाथ में कुछ था, उन्होंने मुस्कराते हुए पूछा “दिदी, सन्देश छुपा रही हो क्या?”

सैययद अबुदल वहीद की बहन रो पड़ी और बोली “नहीं रे..सन्देश नहीं है सोचा तो था तुझे वे पसंद है….लेती आऊँगी, लेकिन यहाँ पहुंचते-पहुँचते गर्मी से खराब हो जायेंगें, इसलिए नहीं लाई।“

दीदी तुम्हारी आँखों में आँसू क्यों है, मेरे लिए मत रो दीदी।

तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा मुंह बोला भाई अपने देश के लिए प्राण देने जा रहा है।

मैं फिर से जन्म लूंगा और तुमसे अवश्य मिलूँगा और तब तक फाँसी पर चड़ता और जन्म लेता रहुंगा जब तक भारत माँ आजाद नहीं ही जाती।“

“दीदी तुम मेरा सन्देश जरूर मेरी बहन अपरूपा देवी तक पहुंचा देना कि उसका भाई हँसतें-हँसतें फाँसी का फंदा गले में डालेगा।“

दीदी की मुठी बंद देखकर बोस बोले “दीदी क्या है, हाथ में, मैं तो पूछना ही भूल गया था।“

बहन ने मुठी खोली तो उसमें से राखी निकली जिसे देखकर खुदी बहुत खुश हुआ और बोला “दीदी पहले क्यों नहीं बताया।“

मुझे तो राखी कब है, याद भी नहीं भाई 

मेरे लिए राखी तभी है जब मेरी बहन मेरे बाधें, राखी बाँधने की बाद “बहन मेरे पास इसके बदले में कुछ भी नहीं है।“

“खुदी जो तुम मेरे लिए दे रहे हो वह मेरे लिए ही नहीं, इस देश की समस्त बहनों के लिए अमूल्य है।“

मिलने का समय समाप्त होने पर खुदीराम ने कहा “दीदी, मेरी बड़ी दीदी को मेरा प्रणाम पहुंचा देना।“

जरूर पहुंचा दूंगी और रोते हुए मन से वहां से चली गई।

10 अगस्त को वकील कालिदास बोस से मिलने के लिए आये तो खुदीराम ने ज़रा सा भी आभास नहीं होने दिया कि उसे कल फाँसी होनी है

और वह देश के आजादी के लिए कालिदास से बात कर रहे थे कि “वें सत्येन्द्रनाथ तक यह सन्देश जरूर पहुँचा दें कि वे क्रांतिकारी गतिविधियों को तेजी से चलाते रहे।

वह लगातार जारी रहना चाहिए जब तक देश आजाद न हो जाये, भले ही सैंकड़ो खुदिरामों को कुर्बानी देनी पड़े।

और यह भी कहलवाया था कि उन्होंने शिष्ट वीरों की तरह मरना स्वीकार्य किया है।


खुदीराम को फाँसी के लिए ले जाना

11 अगस्त 1908 को सुबह छः बजे खुदीराम को फाँसी में लटकाया जाना था और सुबह 2 बजे से ही जेल के बाहर अनेक लोग एकत्रित हो गये थें।

khudiram bose
source wikipedia

सेल से बाहर आते हुए खुदी का चेहरा उस समय किसी अप्रितम आभा से चमक रहा था।

फाँसी स्थल तक चलते हुए वो बार-बार अपने चमकीलें घुंघराले बालों पर उँगलियाँ फेर रहा था, जो सेल में रहने के कारण कुछ बड़ गये थे।

उसकी चाल में दृढ़ता और चहेरे में आत्मविश्वास झलक रहा था।

फाँसी स्थल खुदीराम बोस की सेल से कुछ दुरी पर जेल से बाहर था। वे सीना ताने उस ओर बड़ रहे थे और गुनगुनाते जा रहे थे –

‘वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम

शस्यश्यामलाम मातरम्।……

खुदीराम के आस-पास चार सैनिक चल रहे थे उन्हें अब भी खुदीराम से भय था। फाँसी के तख्ते में पहुंचकर उच्च स्वर में गाने लगे

हांसी हांसी चोड़बो फाँसी,

देखबे जगत बासी।

एक बार बिदाए दे माँ,

आमि घूरे आसि ।

और इस तरह खुदीराम को फाँसी दे दी गई।

18 वर्ष की उम्र में भारत देश के लिए फाँसी के फंदे में हंसी-हंसी झूलने वाला यह पहला शहीद था। हमें नाज है, ऐसे निडर, साहसी और देश पर समर्पित होने वाले शहीद क्रांतिकारी पर।

जय हिन्द

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