श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet

जब रामानुजन क्षय रोग के ईलाज के लिए अस्पताल में भर्ती थे तो प्रोफेसर हार्डी उनसे मिलने गये। रामानुजन से मिलने के बाद प्रोफेसर हार्डी ने उनसे बड़ी विनर्मता से कहा ”जिस टैक्सी से मैं आया हूँ, उस टैक्सी का नंबर 1729 था। बड़ी विचित्र संख्या हैं। इस संख्या को जिस छोटी से छोटी संख्या से भाग दिया जा सकता है, वह 13 है।

युरोप में 13 को अशुभ संख्या माना जाता है।

यह सुनकर रामानुजन झट से बिस्तर से उठकर बैठ गये, और उन्होने कहा “नहीं महाशय, यह तो बड़ी चमत्कारिक संख्या है। इसे दो संख्याओं के योग के रूप में दो प्रकार से लिखा जा सकता है, इस प्रकार –

1729 = 10³+9³ = 12³ +1³


गणित क्षेत्र में अदभुत योगदान किसी ओर का नहीं बल्कि श्री रामानुजन जी का था

गणित के कठिन से कठिन सवाल हल करने वाले वो महान गणितज्ञ थे, श्रीनिवास रामानुजन।

उन्होंने कोई उच्च शिक्षा प्राप्त नहि की थी। उन्होंने अपनी मैट्रिक की शिक्षा तो पास कर ली थी, परन्तु इंटर में फेल हो गये थे।

एक बड़े व्यक्ति की सिफारिश पर, 25 वर्ष की आयु में उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के ऑफिस में एस साधारण क्लर्क की नौकरी मिली थी।

22 दिसंबर, 1887 को रामानुजन का जन्म तमिलनाडु के कुम्म्कोडम नगर में हुआ था। उनके पिता श्रीनिवास अयंगार कपड़े की दुकान में मुनीम थें।

बड़ी कठिनाईयों से घर का गुजारा चलता था।

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet

बचपन के दिन 

बचपन में रामानुजन का बौद्धिक विकास अन्य बालकों जैसा नहीं था।

वह तीन वर्ष की आयु तक बोलना भी नहीं सीख पाए थे।

जब इतनी बड़ी आयु तक जब रामानुजन ने बोलना आरंभ नहीं किया तो सबको चिंता हुई कि कहीं यह गूंगे तो नहीं हैं।

आगे के वर्षों में जब उन्होंने विद्यालय में प्रवेश लिया तो भी विद्य्यालय की शिक्षा में इनका कभी भी मन नहीं लगा।

रामानुजन ने दस वर्षों की आयु में प्राइमरी परीक्षा में पूरे जिले में सबसे अधिक अंक प्राप्त किये और आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल पहुंचे।

रामानुजन को प्रश्न पूछना बहुत पसंद था। वह टीचर ऐसे प्रश्न पूछते थे, जिनका जवाब अध्यापको के पास भी नहीं होता था, जैसे संसार में पहला पुरुष कौन था?

पृथ्वी और बादलों के बीच की दूरी कितनी है आदि।

रामानुजन का व्यवहार बहुत ही विनर्म था। उनके मित्रों के अनुसार उनका स्वभाव ऐसा था कि कोई भी उनसे नाराज ही नहीं हो सकता था।

उन्होंने स्कूल के समय में ही कॉलेज के गणित तक का अध्ययन कर लिया था। उनका गणित में इतना लगाव था कि अन्य विषय पर ध्यान ही नहीं देते थें।

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet




संघर्ष करते हुए अपना अध्ययन जारी रखना

रामानुजन के विद्यालय छोड़ने के पाँच वर्षों का समय इनके लिए बहुत संघर्ष पूर्ण रहा।

कमाई का कोई जरिया ना था और ना ही किसी का सहारा। फिर भी इन्होने अपने गणित के अध्ययन को जारी रखा। मात्र 5 रुपेय मासिक पर इन्होने गुजारा किया।

जहाँ भी जाते इन्हें खाली ही लोटना पड़ता।

फिर भी इन्होने हिम्मत नहीं हारी और यह सब हुआ इनकी अपार मेहनत और इनके परिवार की ईष्ट देवी नामगिरी के कारण,

जिनके प्रति अटूट विश्वास के कारण यह कठिन पारिस्थि में भी आगे बड़ते रहे।                

पढ़ाई बीच में छूटने के बाद गणित विषय पर पूरा ध्यान लगाकर अध्ययन करना

रामानुजन की दिलचस्पी बचपन से ही गणित में थी।

मैट्रिक परिक्षा उत्तीण करने पर उन्हें छात्रवृति मिली, लेकिन कॉलेज की पढ़ाई में वह आगे नहीं बड़ सके। आखिरी में उन्हें नौकरी करनी पड़ी।  

लेकिन रामानुजन ने आगे अपनी गणित का अध्ययन जारी रखा।

इसी समय उन्हें शुब्रिश कार की गणित की किताब मिली जिसमें गणित के सूत्रों का संग्रह था। इस पुस्तक ने रामानुजन के लिए गणित के क्षेत्र में आगे बड़ने का मार्ग खोल दिया।

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet

अब तो वह गणित के नए-नए सूत्रों की खोज में लग गये।

मात्र 11 वर्ष की आयु में अपने घर पर रह रहे दो विद्यार्थियों से गणित का अभ्यास आरम्भ किया और फिर एडवांस टिग्नोमैट्रि का अभ्यास भी किया।

आगे 13 वर्ष की उम्र में ही वह एडवांस टिग्नोमैट्रि किताब के मास्टर बन चुके थे और उन्होंने खुद के कई सारे थ्योरम की खोज भी की।  

जब गणित की परिक्षा हुई तो उन्होंने आधे समय में ही परिक्षा पूरी कर ली।

1902 में रामानुजन ने घनाकार समीकरणों को आसानी से हल करने के तरीके भी बताये

और बाद में quartic को हल करने की अपनी विधि बनाने में लग गये और उन्होंने शोध के माध्यम से जाना कि qunitic को radicals की सहायता से हल नहीं किया जा सकता।   

लाइब्रेरी में synopsis of elementary results in pure and applied mathmatics नामक की किताब थी, जिसमें   5000 फार्मूले थे, जिसे 16 वर्ष की आयु में पूरी तरह याद कर लिए थे।  


विवाह होना और गणित में अध्ययन करना

1908 में रामानुजन का विवाह इनके माता-पिता ने जानकी नामक कन्या से कर दिया।

विवाह के बाद घर का खर्चा चलाने के लिये वें नौकरी की तलाश में मद्रास आ गये, लेकिन बारहवी की परिक्षा पास ना होने के कारण उन्हें नौकरी नहीं मिली।

और तो और उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा तो वह ईलाज कराने के लिए अपने गाँव वापस आ गये।

बीमारी से ठीक होने के बाद फिर से नौकरी के तलाश में जुट गये और जब वह कहीं भी नौकरी के लिए जाते थें

तो अपने साथ एक रजिस्टर रखते, जिसमें उनके द्वारा गणित विषय में जो सूत्र आदि हल किये गये थे, वह रखे हुए थे।


गणित के विद्वान श्री रामास्वामी अय्यर से मिलना

किसी के कहने पर वह गणित के विद्वान श्री रामास्वामी अय्यर से मिले तो वह उनके द्वारा हल किये गये गणित के सूत्रों को देख कर दंग रह गये।

इस प्रकार उन्होंने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 25 रुपेय मासिक छात्रवृति दिलवाई।

इस सह्योग के मिलने पर उन्होंने मद्रास में एक वर्ष रहते हुए अपना पहला शोधपत्र निकाला, जिसका शीर्षक था “बर्नौली संख्याओं के कुछ गुण”।             

एक वर्ष पूरा होने के बाद इन्होने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी की और जो समय मिलता, उस समय में रात-रात भर जागकर अध्ययन में लग जाते और फिर सवेरे अपनी क्लर्क की नौकरी के लिए निकल जाते। 




महान गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी से मुलाक़ात

उन दिनों रामानुजन द्वारा की गई खोज को कोई भी ध्यान नहीं देता था, क्योंकि भारत देश के गुलाम होने के कारण कोई इसमें दिलचस्पी नहीं लेता था।

एक बार रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर अय्यर को दिखाए तो उनका ध्यान, तुरंत लन्दन के ही प्रोफेसर हार्डी की ओर गया, जो उस समय के सबसे विद्वान गणितज्ञ थे।

इसके साथ-साथ प्रोफेसर हार्डी अनुशासन प्रिय और स्वभाव के सख्त भी थे और उस समय केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर हार्डी का बड़ा नाम था।


प्रोफेसर हार्डी के साथ रामानुजन का पत्र-व्यवहार होना   

अब रामानुजन का सीधे तौर पर प्रोफेसर हार्डी से पत्र व्यवहार होने लगा, जिसमें वह गणित से सम्बंधित सूत्रों, संख्याओं आदि पर बात करते।

एक बार जब रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के शोधकार्य को पढ़ा तो उन्होंने कहा कि “मैंने प्रोफेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है।“       

प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को गणित के विषय में खोजकार्य के लिये भारत से इंग्लेंड बुलाया

कहते है कि असली हीरे की परख जौहरी ही जानता है और प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना तो वह उसके मुरीद हो गये और हमेशा रामानुजन के कार्य की प्रशंसा करते।

शुरू में जब रामुजन ने अपने शोधकार्य को प्रोफेसर हार्डी के पास भेजा तो पहले उन्हें भी उनके द्वारा गणित के सूत्रों पर की गई खोज के बारे में समझ नहीं आया

और उन्होंने अपने अन्य गणितज्ञ मित्रों से सलाह ली और इस निर्णय पर पहुचें कि यह कोई असाधारण प्रतिभा का धनि है जिसमें प्रतिभा कूट-कूट के भरी है।  

इसके बाद प्रोफेसर हार्डी ने 1913 में सारी व्यवस्था कर भारत से इंग्लेंड बुलाया और रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी की देखरेख में खोजकार्य शुरू कर दिया।

रामानुजन जब इंग्लेंड गये तो अपने साथ लगभग 3000 से अधिक सूत्रों को नोटबुक साथ ले गये थे।  

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet




प्रोफेसर हार्डी ऐसे गणित विषय में ऐसे विद्वान थें कि जब भी किसी को गणित विषय में आकना होता था तो उसे 100 के पैमाने से आकतें थे।

वह कुछ को 100 में से 35 और अच्छे विद्वान को गणित में 60 अंक देते थे, लेकिन रामानुजन को 100 में से पुरे 100 अंक देते थे।

दोनों में गणित विषय की लेकर गजब की समझ थी, दोनों एक सिक्के के दो पहलू थे।

जब गणित विषय पर चर्चा होती थी तो कई-कई घंटे बीत जाते थे।

रामानुजन उच्च गणित के विषय में अल्प ज्ञान जरूर रखते हो, लेकिन उन्हें विशुद्ध गणित के कुछ विषयों पर उनका पूरा अधिकार था।

तीन वर्ष की गहन शोध के बाद उनके करीब सौ शोध-निबंध प्रकाशित हुए। गणित के क्षेत्र में उनकी ख्याति बड़ने लगी।

रामानुजन ने खुद अपने आप गणित का अद्ययन किया और लगभग 3884 प्रमेयों का संकलन किया।

इनमें से अधिकतर प्रमेय सही सिद्ध भी हुए।

इन्होने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित की अद्दितीय प्रतिभा के बल पर कई मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकले जिनपर खोज आज तक चल रही है।   

इंग्लैंड की प्रख्यात रॉयल सोसाइटी ने उन्हें अपना सदस्य चुन लिया।

उस समय भारत देश के लिए यह बहुत ही गर्व की बात थी कि भारत जैसे गुलाम देश में एक गणितज्ञ ने जन्म लिया और सबको अपने द्वारा गणित के सूत्रों पर किये गये शोध के माध्यम से आश्चर्यचकित कर दिया।


सादा भोजन और गहन अध्ययन

रामानुजन ने लन्दन की धरती पर कदम रखा और उनकी वहां पर रहने की सारी व्यवस्था कर दी गई थी।

उन्हें केवल थोड़ी बहुत परेशानी हुई, वह भी शुद्ध शाकाहारी भोजन, उनका शांत और शर्मिला स्वभाव और सादा जीवन जीने के कारण। उन्होंने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिलकर उच्चकोटि के शोध पत्र तैयार किये।

उन्हें एक विशेष खोज के कारण केम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी ए की उपाधि दी गई। अधिकतर समय रामानुजन अपना शाकाहारी भोजन खुद बनाते थें।

वह अध्ययन में इतने खोये रहते थे कि खाने-पिने की सुध-बुध भी उन्हें नहीं रहती थी।

इस दशा में वह बीमार पड़ गये और उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया। जहाँ पर उन्हें क्षय रोग हुआ।

उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं थी और रोगी को सेनोटेरियम में ही रहना पड़ता था।

अस्पताल में रहते हुए भी वह गणित के सूत्रों में नए-नए शोध किया करते थे और जब प्रोफेसर हार्डी उनसे मिलने आते थे तो उनके लाख आराम करने पर भी, वह हार्डी के साथ गणित के शोध पर बात करते थे।   


अस्पताल में ईलाज के दौरान एक किस्सा

जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो प्रोफेसर हार्डी उनसे मिलने गये। रामानुजन से मिलने के बाद प्रोफेसर हार्डी ने उनसे बड़ी विनर्मता से कहा ”जिस टैक्सी से मैं आया हूँ, उस टैक्सी का नंबर 1729 था।

बड़ी विचित्र संख्या हैं। इस संख्या को जिस छोटी से छोटी संख्या से भाग दिया जा सकता है, वह 13 है। युरोप में 13 को अशुभ संख्या माना जाता है।

यह सुनकर रामानुजन झट से बिस्तर से उठकर बैठ गये, और उन्होने कहा “नहीं महाशय, यह तो बड़ी चमत्कारिक संख्या है। इसे दो संख्याओं के योग के रूप में दो प्रकार से लिखा जा सकता है, इस प्रकार –

1729 = 10³+9³ = 12³ +1³

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet

भारतीय विद्वान को इंग्लैंड का सबसे सम्मनित रॉयल सोसाइटी की सदस्यता देना

जब देश गुलाम था उस समय किसी भारतीय को रॉयल सोसाइटी की सदस्यता देना अपने आप में बहुत बड़ा सम्मान था

और तो और आज तक किसी भी कम आयु के व्यक्ति को यह सदस्यता नहीं दी गई थी।

यह खबर सुनते ही पुरे भारत में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।

जगह-जगह सभाएं होने लगी, घर-घर में रामानुजन की चर्चा होने लगी। वह बाद में ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिपि पाने वाले पहले भारतीय भी बने। 

रामानुजन जी ने लगभग 3900 प्रमेयों का संकलन की रचना की। कई प्रमेय सिद्ध भी हो गये है, जैसे रानुजम प्राइम और रामानुजन थीटा आदि

माक थीटा fuction प्रतिपादित व फलन का उपयोग गणित ही नहीं, बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया गया।

इग्लैंड भारत देश लोटने के बाद बीमारी की दशा में इन्होने माक थीटा fuction पर एक उच्च स्तरीय शोध पत्र लिखा।

रामानुजन के द्वारा खोज किये गये प्रतिपादित इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं, बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया गया। 


रामानुजन के शोधों की तरह उनके गणित में काम करने के शैली भी अलग थी।

वह बीच में अचानक रात को जाग कर स्लेट पर गणित के सूत्र लिखें लग जाते थे और फिर सो जाते थे और ऐसा लगता था कि जैसे स्वप्न में गणित के सवाल हल कर रहे हो।    

वह जब भी गणित में शोध करते तो वह अपनी कुलदेवी का ध्यान करते। वह गणित का कोई सूत्र या प्रमेय पहले लिख देते थे और जब उनसे पूछा जाता की यह कहाँ से लिखा?

तो उनका जवाब होता “यह सूत्र उन्हें उनकी कुलदेवी, नामगिरी की कृपा से प्राप्त हुए।      

रामानुजन को आधात्मिकता के प्रति इतना गहरा लगाव था कि वह अपने द्वारा किये गये कार्य को अध्यात्म का ही अंग मानते थे।

वे कहते थे कि “ मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हो।“


भारत आने पर भी इनका स्वास्थ्य दिन बी दिन गिरता ही गया         

इग्लैंड में रामानुजन का स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरता गया तो उन्हें भारत भेज दिया गया।

लेकिन 1919 में भारत लोटने पर भी वह ठीक नहीं हुए और मात्र 33 वर्ष की अल्प आयु में इस महान गणितज्ञ का देहांत 26 अप्रैल 1920 को हो गया।

इतनी कम आयु में उनकी मृत्यु भारत देश के लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिये अपार क्षति थी


रामानुजन को आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है।

इन्हें गणित में कोई विशेष शिक्षा और  प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए

इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

रामानुजन द्वारा किये गये अधिकांश कार्य अभी भी कई वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं

एक बार रामानुजन का पुराना रजिस्टर जिस पर वह शोध करते थे, वह 1976 को अचानक ट्रिनिटी कॉलेज की लाइब्रेरी में मिला।

इस रजिस्टर लगभग 100 पन्नो का है की वैज्ञानिकों और विद्वानों के लिए पहेली बना हुआ है।

आप इस पोस्ट को पढ़े और दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करें ताकि भारत की प्रतिभा को पहचाना जा सके  

इसे share, comment और subscribe जरूर करें।

अन्य महापुरुषों के बारे में जानने के लिए पढ़ें

SUBHASHCHANDRA BOSE JI KI JIVANI अन्याय सहना जिनको गवारां नहीं

भारत के शहीद क्रांतिकारी बालक खुदीराम बोस की जीवनी पढ़े

LAL BAHADUR SHASTRI JI भारत के सच्चे सपूत, लाल बहादुर शास्त्री जी

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

Dr Radhakrishnan second president of india

Dr. Bhimrao Ambedkar ji ke jivan ka sangharsh in Hindi

Chandra Shekhar Azad Mahaan Krantikari true story in Hindi

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी

श्रीनिवास रामानुजन महान गणितज्ञ के जीवन का परिचय Ramanujan Hamaarijeet

hamaarijeet.com  

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here