Abhimanyu Ka Chakravyuh Todna

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Abhimanyu Ka Chakravyuh Todna
Abhimanyu mahabharat

Abhimanyu Ka Chakravyuh Todna 

Abhimanyu Ka Chakravyuh Todna  महाभारत युद्ध में यदि समय रहते वीर बालक अभिमन्यु ने चक्रव्यूह ना तोड़ा होता तो कौरव कुरुक्षेत्र का युद्ध जीत जातें। चक्रव्यूह की विशाल रचना युद्ध कला के महान रणीकार आचार्य द्रौण ने की थी और चक्रव्यूह के सात चरण थें जीन्हें भेद पाना असंभव थाकेवल अर्जुन और श्री कृष्ण ही उसे भेद सकते थें। 

महाभारत युद्ध के बारहवें दिन के की घटना  

आज की लड़ाई में अर्जुन ने शुकुनी को घायल कर दिया था उसके दोनों भाई विर्षक और अचल मारें गऐ थे अर्जुन के रणकौशल के सामने कौरव और पांडवों के आचार्य द्रोण जैसे योध्याओं की भी नहीं चल पाई, जिसके परिणामस्वरुप कौरवों के शिविर में उदासी छा गई और पांडवों के शिविर में उत्साह और आनन्द था

इस पराजय ने दुर्योंधन को क्रोध से पागल बना दिया और वो पूज्य गुरु द्रोणाचार्य को भला-बुरा कहने लगा सब सेनिकों के सामने ही गुरु द्रोणाचार्य पर आरोप लगाने लगा कि “आपके अर्जुन के प्रति अपार स्नेह के कारण ही आप अपनी पूरी शक्ति से युद्ध नहीं कर पायें, आपने हमारे साथ न्याय नहीं किया है“

दुर्योंधन द्वारा आरोप लगाने पर द्रोणाचार्य क्रोधित हो गए और उन्होंने बड़े दुःख भरें स्वर में कहा “दुर्योंधन में अपनी पूरी शक्ति के साथ युद्ध कर रहा हूँ, फिर भी तुम मुझ पर संदेह कर रहे हो। मैंने तुम्हें पहले भी कहा था और फिर से कह रहा हूँ कि तुम किसी भी तरह अर्जुन को युद्ध से अलग कर दो, मैं एक ही दिन में ही पांडवों पर विजय प्राप्त कर लुँगा, जबतक अर्जुन उनके साथ है उनपर विजय प्राप्त करना कठिन है” । 

यह बात सुनकर दुर्योधन अगले दिन की योजना बनाने लग गया

तेरहवें दिन के युद्ध की घटना

दोनों पक्ष के सैनिक अस्त्र-शस्त्र के साथ युद्ध की तैयारी में लग गए। अर्जुन लड़ते हुए दक्षिण की और चले गए और उनके वहां से हटते ही आचार्य द्रौण ने अवसर पाकर अपनी सेना को चक्रव्यूह में खड़ा कर दिया। उन्होंने चक्रव्यूह के सात चरण बनायें और प्रत्येक चरण में कई-कई सेना थी

CHAKRAVYUH
abhimanyu ka chakrahvyh

चक्र (एक गोल आकार का चारों ओर से सेनाओं से घिरा हुआ) व्यूह (धीरे-धीरे घुमतें हुए शत्रु की सेना की और बड़ना)। इस प्रकार के सात चरण थें और अंतिम चरण में कौरव सेना के महान योध्या आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, अश्वथामा, कर्ण, दुर्योधन, दुशाशन आदि सम्मिलित थें

युद्ध में पांडवों द्वारा आचार्य द्रोणाचार्य का सामना करना आसान ना था ओर तो ओर चक्रव्यूह का भेद कर उसमे घुसना  किसी को ना आता था. अपने पक्ष की हार देखकर युधिस्टर विचलित हो गए और अब तो अर्जुन भी उनसे बहुत दूर थें जो चक्रव्यूह का भेद करना और कैसे निकलना वो दोनों जानतें थें

अचानक उन्हें अभिमन्यु का ध्यान आया. अभिमन्यु अर्जुन व शुभद्रा का पुत्र था तथा श्रीकृष्ण का भांजा थामहाभारत का सबसे छोटा वीर योद्ध्या अभिमन्यु था  जिसका विवाह सोलह वर्ष की आयु में राजा विराट की पुत्री उत्तरा से हुआ था।   

उन्होंने तुरंत अभिमन्यु को बुलाया वो अपने पिता की तरह वीर और साहसी था, यहाँ तक अन्य किशोर भी उससे डरते थें युधिस्टर की आज्ञा पाकर अभिमन्यु तुरंत उपस्थित हुआ, उसने आते ही युधिस्टर को प्रणाम किया. उन्होंने तुरंत अभिमन्यु को कहा “चक्रव्यूह के अन्दर प्रवेश ना कर पाने के कारण कितने ही योद्ध्या अपनी जान गवां बैठें हैं और इसी तरह का माहोल रहा तो पता नहीं कितने ओर योध्याओं को प्राण गवाने पड़ेंगें”

अभिमन्यु ने कहा “आप चिंता ना करें तात ! मैं अकेला ही कौरवों के चक्रव्यूह में प्रवेश कर उन्हें छिन्न–भिन्न कर दुंगा”. कुछ देर सोचने के बाद फिर कहा “तात मैं चक्रव्यूह भेद सकता हूँ, पर उसमे से कैसे बाहर आना है, इस विधा का मुझे ज्ञान नहीं, एक दिन जब मैं अपनी माता श्री शुभद्रा के गर्भ में था तो पिताश्री, अर्जुन मेरी माताश्री को चक्रव्यूह में प्रवेश करने का भेद बता रहे थे, वह इतना ही बता पायें की तभी माताश्री को नींद आ गई और पिताश्री ने आगे कुछ ना बताया”

तो इस प्रकार अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश करने का रहस्य तो जान गया पर बाहर निकलने की व्यूह रचना जान ना पाया. युधिस्टर उसकी बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले “पुत्र तुम एक बार चक्रव्यूह तोड़कर उसमे प्रवेश कर जाओं बाद में हम सब तुम्हारे पीछे–पीछे आ जायेंगें”. भीम आदि ने भी एस बात का समर्थन किया, इसके अलावा उनके पास और कोई उपाय ना था

अभिमन्यु का चक्रवयूह तोड़ना (ABHIMANYU KA CHAKRAVYUH TODNA)  

युधिस्टर को प्रणाम कर और उनका आशीर्वाद लेकर अभिमन्यु अपने रथ पर चड़ा और कौरव सेना की और बड़ने लगा. अभिमन्यु को देखकर कौरव सेना भयभीत हो गई. और जोर-जोर से कहने लगी “अभिमन्यु आ गया, अभिमन्यु आ गया,” उसका रथ पुरे वेग से आगे बड़ रहा था और एसा प्रतीत हो रहा था मानो शेर का बच्चा हाथियों के झुंड की ओर बड़ रहा हो, वो भी बिना किसी भय के

अभिमन्यु का दुर्योधन से युद्ध 

वह चक्रव्यूह के पास आते ही बिजली की गति से आगे बड़ा और विशाल चक्रव्यूह को भेदकर उसमे प्रवेश कर गया. जो पांडव सेना उसके साथ थी वों चक्रव्यूह में प्रवेश ना कर पाई. वो अकेला ही कोरवों की सेनाओं पर आक्रमण कर उन्हें हराता गया, यह सब देखकर दुर्योधन से रहा ना गया और वों अभिमन्यु से युद्ध करने के लिए आगे बड़ा पर अभिमन्युं ने दुर्योधन का बुरा हाल कर दिया तभी अन्य योध्याओं ने दुर्योधन के प्राण बचाये 

उन दिनों जो युद्ध होतें थें वो धर्मयुद्ध की तरह होते थे जिसमें एक योध्या दुसरे योध्या से आमने-सामने युद्ध करता था, लेकिन कोरवों ने चालाकी की और आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, अश्वथामा, कर्ण, दुर्योधन, दुशाशन आदि योध्याओ ने मिलकर अभिमन्यु पर आक्रमण किया परन्तु वो वीर योध्या फिर भी ना घबराया और सबके साथ युद्ध करता रहा 

उसकी युद्ध कला देखकर आचार्य द्रोण गदगद हो उठें और बोले “सचमुच, युद्ध में अभिमन्यु का सामना करें वाला कोई दूसरा नहीं है” दुर्योधन ने सुना तो वो क्रोध में बोला “आचार्य ये आप नहीं बल्कि अर्जुन के प्रति आपका स्नेह बोल रहा है उस सोलह वर्ष के बालक को हम चिटी की तरह मसल देंगें”

अभिमन्यु का दु:शाशन से युद्ध 

इस बात का समर्थन दु:शाशन ने भी किया और बोला “मैं अभी जाकर उस दुष्ट को पराजित करके आता हूँ” अभिमन्यु की वीरता के सामने दु:शाशन टिक ना सका और मूर्छित हो गया. यह देखकर कोरव सेना में हाहाकार मच गया और पांडव सेना में खुशी का उत्साह बड़ने लगा

अभिमन्यु का दु:शाशन के पुत्र लक्ष्मण से युद्ध 

अभिमन्यु अकेले ही कोरव सेना पर भारी पड़ रहा था सभी उसकी वीरता देखकर अचंभित थें और यह कोरव सेना के योध्याओं के लिए बड़ी शर्म की बात थी कि एक सोलह वर्ष का बालक कोरव सेना के महान योध्याओं पर भारी पड़ रहा था की तभी दु:शाशन का पुत्र लक्ष्मण आगे आया और अपनी गदा लेकर अभिमन्यु की ओर बड़ा वो भी बालक ही था दोनों के बीच युद्ध हुआ और लक्ष्मण युद्ध में घायल हो गया और कुछ देर बाद मारा गया

गलत योजना द्वारा अभिमन्यु पर आक्रमण करना 

दु:शाशन और दुर्योधन क्रोध में पागल हो गए और दुर्योधन अभिमन्यु को ललकारता हुआ आगे बड़ा. तब आचार्य द्रोण ने कर्ण से कहा “अभिमन्यु को इस प्रकार नहीं हराया जा सकता है. तुम पीछे से जाकर धनुष की डोरी काटों और मैं दुसरे योध्याओं के साथ उसके घोड़ो और सारथि, सुमित्र को मारने का प्रयास करूँगा” हुआ भी यही पीछे से कर्ण ने धनुष की डोरी काट दी और आचार्य द्रोण ने उसके रथ को नष्ट कर दिया और सारथि को भी मार दिया।.

इतने में भी वो वीर योध्या कहा रुकने वाला था, वो तलवार और ढाल लेकर रण में कूद पड़ा और तेज गति से जहाँ भी अपनी तलवार घुमाता वहाँ पूरा मैदान साफ़ हो जाता था ।   

आचार्य द्रोण फिर से चिंता में पड़ गए कि अबतक अभिमन्यु पर काबू नहीं कर सकें. कोरवों के लिए यह एक शर्म की  बात थी. तभी आचार्य द्रोण ने कर्ण को एक चाल बताई और दोनों ने मिलकर उसकी तलवार और ढाल को काट फेकीं 

 Abhimanyuh

तलवार और ढाल टूटने पर वो थोड़ी देर रुका और फिर टूटे हुए रथ का पहिया उठाकर शत्रुओं पर सिंह की तरह टूट पड़ा कोरवो की यह दुर्दशा देखकर दु:शाशन के दुसरे पुत्र ने गदा सभाली और अभिमन्यु ने टुटा हुआ रथ का पहिया फेंककर गदा उठा ली. दोनों में काफी देर तक युद्ध होने लगा, दोनों धराशाय़ी हो गए. इसी बीच अभिमन्यु को थोड़ा उठने में विलम्ब हुआ तो अवसर पाकर जयद्रथ ने छल से अभिमन्युं पर गदा चला दी. वीर बालक इस वार को सहन कर ना सका और उसी क्षण वीर बालक अभिमन्युं वीर गति को प्राप्त हो गया

वीर बालक़ को मारकर कोरव सेना में तो खुशी की लहर दोड़ पड़ी लेकिन कर्ण और द्रोण रो पड़े. धृतरास्ट्र के एक पुत्र  युयुत्सू से यह अधर्म सहा नही गया और उसने कहा “तुमने यह कौन-सी बहादुरी की है जो तुम खुशी मना रहे हो, तुम्हे लज्जा आनी चाहिए, धिक्कार है तुम पर” यह कहकर युयुत्सू रण क्षेत्र से वापस चला गया

अभिमन्यु की मृत्यू का समाचार सुनकर पांडव सेना में चारों ओर शौक की लहर दोड़ पड़ी. उनके पिता अर्जुन पर तो मानो जैसे वज्रपात्र हो पड़ा हो

कहा भी गया है की सच्चे वीर इस संसार में कभी कभार ही जन्म लेतें हैं और उनमे से एक थें वीर साहसी, निडर, आज्ञाकारी, बालक अभिमन्यु जो मर कर भी अमर हो गये और हमारे लिए एक आदर्श उदाहरण छोड़ कर चले गए की  विपत्ति में हमेशा सत्य का साथ देना चाहिए चाहे उसका परिणाम कुछ भी हों. धन्य है हमारी मातृभूमि जिसने ऐसे वीर योध्या को जन्म दिया। 

Abhimanyu Ka Chakravyuh Todna                      

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