Bachpan ki yadden gulli danda ka khel story

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Bachpan ki yadden gulli danda ka khel story

Bachpan ki yadden gulli danda ka khel story

अपनी आँखें बंद करों और फिर से पहुँच जाओ, उन्ही बचपन की यादों  में जिन्हें बार -बार याद कर, हम उस सुहाने पल को महसूस करतें हैं और बार-बार अपने मन में दोहरातें हें कि काश ! बचपन के दिन वापस आ जाये.

एक वो बचपन के दिन थें, जिसमें पता नहीं कितने अनगिनत खेल हमारें जीवन का एक हिस्सा थें, जिनके साथ ही हमारें दिन की शुरुआत होती थी, ना मम्मी-पापा का डर था और और ना ही school के homework की चिंता थी. चिंता थी तो बस खेल खेलने की, आज मैं आपको महान लेखक, मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी गुल्ली-डंडा की कहानी के बारें में अवगत कराऊगां I      

उस समय के दौर में खेल तो कई थें, पर गुल्ली डंडा का खेल सब खेलों का राजा था, ना लान की ज़रुरत थी, ना कोर्ट की, ना ही मेट की. मजे-मजे में किसी पेड़ की टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, दो खिलाड़ी भी आ गएँ तो खेल शुरू .

हमारी गुल्ली-डंडा की टोली में एक लड़का, दया नाम का था मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा, उसका कद लम्बा, लम्बी-लम्बी उँगलियाँ, गुल्ली कैसी भी हो उसपर ऐसे लपकता की मानो जैसे छिपकली कीड़े पर लपक रही हो. हमें यह भी नहीं मालूम था कि उसके माँ-बाप थें भी या नहीं, वो कहाँ रहता था, पर था हमारे गुल्ली club का champion, जिसकी तरफ आ जाएँ, उसकी जीत पक्की.  उसे दूर से आतें देख हम सब उसका स्वागत करतें थें और उसे अपने पालें में रख लेतें थें .

एक दिन मैं और दया दो ही खेल रहें थें. वह खेल में छका रहा था और मैं छक रहा था, अगर दिन-भर खेलने का मन करें तो पुरे दिने खेलतें रहतें हैं, पर जब मन ना करें तो एक मीनट का भी खेलना अखरता है. मैंने उससे पिण्ड छुड़ाने के लिए कई चाल चली, पर मेरी सारी चाल उसके सामने बेकार हो गईI

काफी विनती करने पर भी दया नहीं माना. मैं घर की ओर भागा दया  ने मुझे दौड़ कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला “मेरी बारी देकर जाओ, अपनी बारी तो ले ली, और जब मेरी बारी आई तो भागने का बहाना बनाने लगें”

“क्या तुम दिन-भर मुझे छकातें रहो तो क्या मैं दिन भर छकता रहूँ ?”

“हाँ तुम्हें दिन-भर छकना पड़ेगाI”  

“ना खाने जाऊं ना पिने जाऊ”

“हाँ मेरी बारी दियें बिना कहीं नहीं जा सकतें”

“मैं तुम्हारा गुलाम हूँ?”

“हाँ, मेरे गुलाम हों”

“मैं घर जाता हूँ, देखूं मेरा क्या कर लेते हो”

“घर कैसे जाओगे, कोई दिल्लगी है, दावं दिया है दावं लेंगें”

“अच्छा, कल मेने तुम्हें अमरुद खिलाया था, वो लोटा दो”

“वो तो पेट में चला गया”

“निकालो पेट से क्यों खाया”

“तुमसे मांगने नहीं गया था, तुमने खिलाया तो खा लिया”

“अमरुद नहीं दोगे, तो बारी भी नहीं दुँगा”

मैं समझता था की न्याय मेरी ओर हैं, क्योंकिं मैंने उसे अमरुद ऐसे ही थोड़े ही खिलाया था, जबकि आज के समय कोई काम भी बिना खिलाएं-पिलायें कहाँ होता हैI

दया ने मुझे अपनी और खींचतें हुवे कहा की “मेरी बारी देकर जाओ, अमरुद गया भाड़ में.”

मैंने जब उसको रोने का बहाना किया और जोर-जोर से रोने लगा तो तब जाकर उसने मुझको छोड़ा I

मैं एक थानेदार का लड़का था और वो एक गरीब घर का लड़का था.उन्ही दिनों मेरे पिताजी का transfer दुसरे शहर में हो गया, नयें शहर देखने की खुशी में, मुझें अपने दोस्त से अलग होने का डर बिल्कुल ना था, नयें शहर की चकाचौंध में दिन इस तरह बीतते गए की कब बीस साल बीत गयें, पता ही नहीं चला.

दया का वापस अपने गाँव आना 

Engineer की डिग्री के बाद मेरा उसी जिलें का दौरा हुआ, उसी कस्बें में पंहुचा, और वही सरकारी निवास में ठहरा भी. उस जगह को देखतें ही बचपन की यादें ताजा हो गई, और तुरंत कस्बे की सैर को निकल पड़ा. मेरा मन बचपन की वो जगह देखने को बैचैन थी, जहाँ हम गुल्ली-डंडा का खेल खेला करते थें.

काफी कुछ बदल सा गया था, बगीचें की जगह अब कच्चें मकानों ने ले ली थी, खेलने का मैदान जो काफी विशाल था, वो काफी कम जगह तक सिमट गया था, मैदान के विशाल पेड़ अब छोटें-छोटें पेड़ो में परिवर्तित हो गएँ थें. बचपन की अमर समृतियाँ बाहें खोलें अपने पुराने मित्रों से मिलने को अधीर हो रही थी, मगर ये दुनियां बदल सी गई थी.

सहसा एक खुली जगह, मैंने दो-तिन लडको को गुल्ली-डंडा का खेल खेलते हुए देखा, तो कुछ पल के लिए मैं अपने आपको भूल गया. भूल गया की मैं एक enginner हूँ. उन लड़कों के पास गया और उनसे पूछा “बच्चों यहाँ कोई दया नाम का आदमी रहता है” उनमे से एक लड़के ने गुल्ली-डंडा समेटकर कहा “दया ” 

“हाँ दया ”

“वही जो गुल्ली डंडे के खेल में माहिर है”

“हाँ वही”

तभी वो लड़का भागता हुआ गया और जब वो वापस आया तो उसके साथ, एक आदमी भी चला आ रहा था, मैंने उसे तुरन्त पहचान लिया, मन में उससे गले मिलने की काफी तमना हुई, पर कुछ सोच कर रुक गया, और उससे बोला “मुझे पहचाना दया ”

दया ने झुककर सलाम किया और बोला “पहचानुगां कैसे नहीं मालिक आप मजे में हो”

“मालिक क्यों कह रहे हो”

छोड़ो ये सब साहब, कैसे आना हुआ आपका यहाँ

“बचपन की यादें खींच लाई, मुझें यहाँ. मनोहर, श्यामू और भोंदू कहाँ है”

“मनोहर और श्यामू दोनों डाकियें हो गएँ हैं, भोंदू अब इस दुनिया में नहीं है और आप?”

“मैं तो जिलें का एक Engineer हूँ” 

“आप तो पहले से ही काफी मेहनती थें” 

“अब कभी गुल्ली डंडा खेलतो हो”

“अब गुल्ली–डंडा क्या खेलुगा सरकार अब तो रोटी-पानी से ही छुटकारा नहीं मिलता”

आओ आज हम तुम खेलेंगें. तुम छकाना, हम छकेंगें. तुम्हारी एक बारी हमारें ऊपर है, वह आज ले लो. 

खेल की यादें दोबारा ताज़ा करना 

बड़ी मुश्किल से दया राजी हुआ, खेलने को. वह थोड़ा झेप रहा था, पर मैं नहीं. मैं उसको अपनी गाड़ी में लेकर मैदान की ओर निकला और बड़ी उत्सुकता से खेल का इंतज़ार कर रहा था की अब खेल शुरू होगा, सब ओर खेल देखने की भीड़ लग जाएगी, सब दोस्त आयेंगें, वही पुरानी यादें ताज़ा हो जायेगी, पर उसके चहरे पर आनंद का भाव बिल्कुल ना था.

मैंने उससे पुछा “तुम्हे कभी हमारी याद आई थी, सच कहना”

दया झेपता हुआ बोला “मैं आपको क्या याद करता हुज़ूर, किस लायक हूँ, भाग्य में आपके साथ कुछ दिन तक खेलना बना था”

मैंने कुछ उदास होकर कहा “मुझे तो बराबर तुम्हारी याद आती थी, तुम्हारी वही बारी जो मुझे पुरे दिन तक छकाती रहती थी, याद है ना”

“वह बचपन के दिन थें सरकार उसकी याद मत दिलाओ”

“वाह! वो मेरे बाल-जीवन की सबसे रसीली याद हैं, उसे कैसे भूल सकता हूँ, वो तो मेरे जहन में पूरी तरह रच-बस गई है”

इतने देर में हम मैदान मैं पहुँच गए, गया के पास कुल्हाड़ी थी, मैं झट से पेड़ पर चड़ा, और एक टहनी तोड़ी, और गया ने तुरंत गुल्ली-डंडा बना डाला

मैंने गुच्ची मैं गुल्ली रखकर उछाली. गुल्ली दया के सामने से निकल गई. उसने हाथ लपकाया जैसे मछली पकड़ रहा हो,गुल्ली उसले पेरो में जाकर गिरी.

यकीन नहीं होता, यह वही गया था जिसके हाथ में गुल्ली अपने आप बैठ जाती थी, चाहे वो दायें हो या बाएं हो क्या मजाल गुल्ली उसके हाथो से निकल जायें, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, सपाट गुल्ली, नौकदार गुल्ली कोई भी हो उसके हाथों से बचकर नहीं निकल सकती थी, जैसे मानो उसके हाथों में कोई चुम्बक हो.

लेकिन आज गुल्ली से उसको कोई प्रेम ना था. मैंने उसे छकाना शुरू किया, तरह-तरह की धांधली शुरू की, गुल्ली मेरे डंडे पर ना लगती, कभी दाई ओर तो कभी बाई और निकल जाती और जब डंडे पर लग भी जाती तो फिर से रोमंची खा कर दोबारा खेलने लगता, गया कुछ ना कहता, इस प्रकार एक घंटे तक मैंने उसे खूब छकाया.

उसके बाद दूसरी बार जब मैंने गुल्ली पर डंडे से जोर से मारा तो गुल्ली बन्दुंक की तरह निकल कर दूर जाकर रुकी और गया ने वहा से डंडे पर निशाना लगाया तो गुल्ली सीधे डंडे पर लगी और टन से आवाज आई, दया बोला “सरकार जोर से आवाज आई है”

मैं बोला “नहीं तो ऐसी कोई आवाज नहीं है, पत्थर की आवाज़ होगी” “. प्रत्यक्ष तौर पर झूठ बोलने पर भी दया विचलित नहीं हुआ. बाद में आउट होने पर मैंने उसे उसकी बारी दी तो गया बोला “सरकार अब तो रात होने वाली है, कल खेलेंगें”

“नहीं अभी अपनी बारी लो”

जब दया  ने अपनी बारी ली तो दो बार तोंड लगाने का इरादा किया तो दोनों बार ही हुच हो गया और एक मिनट के अन्दर ही बारी ख़त्म हो गई. मैंने अपनी हदय की विशालता का परिचय दिया और उससे कहा “एक बाजी और खेल लों, तुम एक बार में ही आउट हो गये हो.”

“नहीं भैय्या अब अँधेरा हो गया है, अब नहीं, कल खेलेंगें, कल मैं अपनी टोली के सभी पुराने ख़िलाड़ी को बुला लाऊंगा, आपको फुर्सत हो तो आ जाना”.

दया का खेल 

मैंने शाम का समय दिया, जब मैं अगले दिन वहां पहुचां तो उनमे पुरानी मण्डली के साथी भी थें, पर अधिकांश नयें थें, खेल शुरू हुआ, मैं गाड़ी पर बैठकर खेल देखने लगा. आज दया का खेल देखकर मैं चकित रह गया, जब वो टोंड लगाता तो गुल्ली हवा से बात करती. कल की तरह वह झिझक, वह हिचकिचाहट उसमे ना थी. कल यदि उसने मुझे इस तरह छकाया होता मैं रो देता, जब वो गुल्ली पर टोंड मारता तो गुल्ली दो सौ गज दूर जा पहुँचती थी.

उसमे से एक युवक ने धांधली की ! उसका कहना था की गुल्ली जमींन में नहीं लगी जबकि दया का कहना था की गुल्ली जमींन पर लगकर ही उछली थी.  इसपर दोनों पर तना-तनि की नौबत आ गई, पर युवक गया के सामने दब गया. मैं खेल में ना था पर फिर भी मुझे खेल में लड़कपन का आनंद आ रहा था, जब हम सबकुछ भूलकर खेल में मस्त हो जातें थें.

अब मुझे मालूम हुआ की कल दया मेरे साथ खेल नहीं, बल्की खले करने का बहाना कर रहा था. उसने मुझे दया का पात्र समझा. मैंने धांधली की, बईमानी की, पर फिर भी उसे क्रोध बिल्कुल ना आया. मुझे छकाकर मेरा कचुम्मर नहीं निकालना चाहता था. वो तो बस मुझे खिला रहा था, मेरा मान रख रहा था.

मैं अब अफसर हूँ . यही अफसरी मेरे और उसके बीच एक दीवार सी बन गई है. अब मैं उससे अदब पा सकता हूँ, सम्मान पा सकता हूँ, पर सहचर्य नहीं.

लड़कपन था, जब मैं उसका सहचर था, हममें कोई भेद ना था. यह पद पाकर मैं केवल अब दया का पात्र हूँ. वह मुझे अपनी जोड़ी का नहीं समझता. मैं बड़ा हो गया हूँ . वो छोटा हो गया.

Bachpan ki yadden gulli danda ka khel story

आपका शुभचिंतक

प्रकाश चाँद जोशी

Hamaarijeet.com   

                                     

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