Best and short panchatantra stories in hindi शराफत का दुसरा नाम है मौत

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Best and short panchatantra stories in hindi शराफत का दुसरा नाम है मौत
By Hamaarijeet.com

Best and short panchatantra stories in hindi शराफत का दुसरा नाम है मौत

बुढ़ापा बहुत बुरी चीज है, जवानी जब बीत जाती है तो बुढ़ापे का दुःख कुछ अधिक ही महसूस होने लगता है, जवानी में जो आपके साथ रहते हैं, आपके हाथ जोड़ते हैं, वृद्ध अवस्था में आपसे दूर भागने लगते है।Best and short panchatantra stories in hindi शराफत का दुसरा नाम है मौत

आगे की कहानी

ऐसा ही हाल एक बगुले का था, जिसने अपनी जवानी के दिनों में तो बहुत कीड़े-मकोड़े और भरपूर मछलियां खाई।

लेकिन जब बुढ़ापा आया तो शिकार करने के काबिल नहीं रहा और एक कोने में पड़ा, अपने भाग्य को कोसता रहता था।

एक दिन केकड़े ने बूढ़े बगुले को रोते हुए देखा तो उसको बहुत दुःख हुआ और उसने बगुले से कहा “मामा जी क्या बात है? क्यों रो रहे हो?

अरे भाई मेरे दुःख को किसी ने समझा ही नहीं, बस एक तुम ही हो जो समझ सकते हो।

अब मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि इस तालाब में रहने वाले साथियो का दुःख नहीं देख सकता हूँ।

कैसा दुःख बड़ी हैरानी से केकड़े ने बगुले की ओर देखते हुए पूछा

अरे मेरे प्यारे भांजे, तुम तो जानते ही हो कि मैं एक टांग में खड़ा होकर रोज पूजा करता रहता हूँ ।

हाँ, मामा सही कह रहे हो, मैं तुम्हें रोज देखता रहता हूँ रोज

हाँ, भांजें कल भगवान् से मेरे दर्शन हुए।

उन्होंने मुझसे कहा कि इस तालाब का पानी जल्द-से-जल्द सूखने वाला है। यह सुनकर मुझे बहुत बड़ा आघात लगा।

तुम जानते हो कि हम सब पानी के जीव है और बिना जल के तो हम बिल्कुल भी नहीं रह सकते हैं।

अब तुम ही सोचों कि इस बुढ़ापे में जब मैं अपने साथियों को मरते हुए देखूंगा तो मेरे दिल में क्या बीतेगी। इतना कहते ही बगुला जोर-जोर से रोने लगा।

केकड़े ने जैसे ही यह बात सुनी तो वो घबरा गया और जल्दी से पानी के अंदर साथियों के पास पहुँचा और बोला

“भाईयों और बहनों कान खोलकर सुन लो इस तालाब के किनारे बैठे हुए एक बगुले को भगवान् के दर्शन हुए हैं , जिन्होंने कहा है कि इस तालाब का पानी सूखने वाला है।

यदि हम अभी नहीं सम्भले तो हमसब मारे जायेंगें।

मौत का नाम सुनते ही सब बुरी तरह घबरा गए और काँपने लगे।

उन सबने तुरंत बगुले के पास जाने का निर्णय लिया ताकि मौत से बचने का रास्ता निकाला जा सके। उन बेचारे सीधे-साधे प्राणियों को क्या पता था कि बगुला तो बड़ा चालाक है।

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सब मिलकर बगुले के पास गए

कछुआ, केकड़े और मछलियां सब के सब बगुले के पास आये और बूढ़े बगुले को हाथ जोड़कर कहा “मामा जी, हमें बचने का कोई रास्ता बताओं।”

देखों, मित्रों तुम सब मेरे परिवार हो और अपने  परिवार को बचाने के लिए मैं अपनी जान की बाजी भी लगा दूंगा।

बूढ़ा हुआ तो क्या हुआ, अभी भी मेरी हड्डियों में बहुत जान है, जो तुम सबकी रक्षा कर सकती है।

“मामाजी, हम सब बचेंगें कैसे?”

एक उपाय है, मैं तुम सबको एक-एक करके पास वाले तालाब में छोड़ दूंगा, जहाँ पर पानी ही पानी है।

और आखिरी बुढ़ापे के दिनों में कुछ अच्छा काम करके पुण्य भी कमा लूंगा।

वाह मामा जी वाह, क्या उपाय बताया है।

आप तो सच्चे जनसेवक निकले, जो इस बुढ़ापे में भी सहायता करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

उन सबको क्या पता था कि बगुले ने अपने भोजन का साधन ढूंढ लिया है।

वह ऐसे ही किसी को अपनी पीठ में थोड़े ही ढोता फिरेगा, वह भी बुड़ापे में।




बगुले ने जाल बिछाया

अगले दिन बगुले ने जो जाल बिछाया था, उसपर काम करना शुरू कर दिया।

सबसे पहले उसने मछलियों को एक-एक करके अपनी पीठ में ले गया और दूर पहाड़ी में ले जाककर, उनको बड़े मजे से खाने लगता।

इस तरह कुछ दिन तक वह मजे में मछलियां खाकर अपना पेट भरता। जब मछलियां खा-खाकर, उसका जी पूरी तरह भर गया तो उसने केकड़े का भोजन करने का प्लान बनाया।

अब उसने एक मोटे से केकड़े को चुना और उड़ते हुए पहाड़ी पर जा पहुंचा।

पहाड़ी पर पहले से ही मछलियों की हड्डिया पड़ी हुई थी।

जैसे ही केकड़े ने हड्डियों का ढेर देखा तो बगुले से पूछा “मामा जी, अब तालाब कितनी दूर है?”

बगुले ने सोचा, अब मैं इस केकड़े को तालाब से बाहर ले आया हूँ। यह मेरा क्या बिगाड़ लेगा? बड़े रौब में वो केकड़े को बोला

“अरे ओ केकड़े, तू क्या समझता है मैं तुम सबके बाप का नौकर हूँ, जो तुमको अपनी पीठ में लादकर एक तालाब से दूसरे तालाब तक पहुचांता रहूँगा।

मैंने तो यह सब नाटक अपना पेट भरने के लिए किया है, क्योंकि बुढ़ापे की अवस्था में तो मैं किसी का शिकार कर नहीं सकता हूँ।

तो मैंने समझा तुम मूर्खों को उल्लू बनाकर शिकार करू और मैं यह इसी तरह करता रहूँगा।

आजकल चालाकी और हेरा-फेरी से ही तो काम चलता है।

केकड़ा अब समझ गया कि यह बगुला तो हत्यारा है, इससे तो अब बचा नहीं जा सकता है।

लेकिन इसके बावजूद उसने बड़े साहस और हिम्मत से इस जालसाज बगुले से अपने आपको बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने का फैसला किया।

उसने सोचा यदि मैं मरूंगा तो इस बगुले को लेकर भी मरूंगा। इससे मेरे और भाई तो बच जायेंगें।


केकड़े ने बरी हिम्मत करके बगुले की गर्दन पर जोर से काट लिया और उसके सांस की नली पर भी जोरदार वार किया, जिससे बगुला बुरी तरह लहुलूहान हो गया।

दर्द के मारे बगुले की जोर से चीख लगी और वो बोला “अरे-अरे ये क्या कर रहे हो, छोड़ों मुझको, छोड़ों।”

मैं वह कर रहा हूँ, जो एक धोखेबाज और हत्यारे के साथ करना चाहिए।

यदि अपनी जान बचाना चाहते हो तो तुरंत मुझे उसी तालाब में ले चलो, जहाँ से मुझे लाये हो।

अब केकड़े से पीछा छुड़ाने के अलावा उसके पास कोई और उपाय नहीं था।

वह केकड़े को लेकर तालाब के पास पहुंचा और उसने सभी साथियों को बगुले की  करतूत बता दी।

उसकी बात सुनते ही सब के सब बगुले पर टूट पड़े और उस धोखेबाज और पापी की ह्त्या करके ही सबने शांति की सांस ली।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी की बात पर बिना सोचे-समझे विशवास ना करके, अपने भय को हृदय से निकालकर सोच-समझकर काम लेना चाहिए।

जो प्राणी विपत्तियों से घबराकर जिस किसी पर अँधा विशवास कर लेते है, वह अपने जीवन को उससे भी बड़ी विपत्ति में फंसा देते है,

जिस प्रकार धूर्त बगुले की बातों में आकर तालाब के जीव एक विपत्ति से बचने के लिए दूसरी विपत्ति में फँस जाते हैं

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आप सबका शुभचिंतक

P C JOSHI

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