Chakarvati Samrat Vikramadity Ke Shasan Men Bharat Sone Ki Chidiyan Kahlaya

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Samrat Vikramaditya by Hamaarijeet.com
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Chakarvati Samrat Vikramadity Ke Shasan Men Bharat Sone Ki Chidiyan Kahlaya

प्रिय पाठको नमस्कार, आज मैं आपका  दोस्त  प्रकाश  चंद जोशी आपके लिए एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व का परिचय कराने जा रहा हूँ जिन्हे इतिहास में भारतवर्ष का महान सम्राट विक्रमादित्य के नाम से जाना गया और जिनके  शासनकाल में  भारत  सोने  की  चिड़िया  कहलाया, इसी  काल  को स्वर्णिम काल  कहा  गया। Chakarvati Samrat Vikramadity Ke Shasan Men Bharat Sone Ki Chidiyan Kahlaya

परन्तु  हमारे  देश  की विडंबना देखिये कि हमारे इतिहास के पाठयक्रम में राजा विक्रमादित्य के विषय में नहीं बताया गया। इसी कारण अबतक भारत के लोगों को राजा विक्रमादित्य के  विषय में पता  ही  नहीं  है।


अब आपके  मन  में  एक  प्रश्न आया  होगा  कि कौन  थें  राजा  विक्रमादित्य?

उज्जैन  के राजा गन्धर्वसेन थें और उनकी तीन संतान थी  जिनमे  बड़ी  बेटी मेनावती, दूसरा बेटा भरतहरी और  तीसरा विक्रमादित्य था, जिनका दूसरा नाम विक्रमसिंह भी था।

भारतवर्ष में चक्रवती सम्राट उसे  कहा  जाता है  जिसका  पुरे  भारत में शासन रहा  हो। उज्जेन के राजा विक्रमादित्य चक्रवती सम्राट थें और उनका शासन काल अरब और मिस्र देश तक फैला हुआ था। विक्रम बेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां राजा विक्रमादित्य से ही जुडी हुई है।

विक्रमी सम्वत की शुरुआत विक्रमादित्य शासन से ही हुई

विक्रमी सम्वत की शुरुआत इन्ही के काल से शुरू हुई थी यानि आज से लगभग 2288 वर्ष पूर्व। जब सनातन धर्म का पतन होने लगा तो विक्रमादित्य ने पुनः इस धर्म का ऊत्थान किया। विक्रमादित्य के पिता, गन्धर्वसेन जो चक्रवती सम्राट थें, उनका मंदिर आज भी मध्यप्रदेश के सोनकच्छ के आगे गन्धर्व पूरी में बना हुआ है। यह गाँव बहुत ही रहस्यमयी गाँव कहलाता है।

Gandharvasen Temple
Gandharvasen Temple

विक्रमादित्य की पांच पत्निया थी मलयवती, मदलेखा, पद्मिनी, चेल और चिल्महादेवी, उनके दो पुत्र विक्रमचरित्र और विनयपाल थें, दो पुत्रियाँ थी।


विक्रमादित्य शासन में नवरत्नों को समिल्लित करने की शुरुआत करना

कलिकाल के 3000 वर्ष पुरे होने के बाद 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ, उन्होंने 100 वर्षों तक शासन किया। विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी ऊज्जेनी के सिहांसन में बैठें। वह अपने ज्ञान, वीरता, उदारशीलता और न्याय के लिए प्रसिद्ध थें। इनके दरबार में नवरत्न रहतें थें, नवरत्न की शुरुआत इन्ही के काल से हुई हैं, जिसका अनुसरण तुर्क बादशाह अकबर ने भी अपने दरबार में किया था।

कहा जाता है कि मालवा में उनके भाई भरत हरी का शासन था और भरतहरी के राज में शकों का आक्रमण बड़ गया था। भरतहरी ने वैराग्य धारण कर जब राज्य त्याग दिया तो उसके बाद विक्रमादित्य ने सिहांसन संभाला और उन्होंने सबसे पहले 57 से 58 ईसा पुर्व (लगभग 2075 से 2076 वर्ष पूर्व) शकों को अपने शासन से बाहर खदेड़ दिया, इसी की याद में उन्होंने विक्रमी संवत की शुरुआत कर अपने राज्य की सीमा का विस्तार किया।

नवरत्नों को रखने की परम्परा विक्रमादित्य ने अपने राज में ही शुरू की थी इन नवरत्नों के नाम धन्वन्तरी, क्षपरक, शंकु. अमरसिंह, बेताल भट्ट,घतपर्क, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि कहे जातें हैं। इनमें महान गणितज्ञ, उच्च कोटि के विद्वान, कवी, विज्ञान के विद्वान आदि सम्मिलित थें। नवरत्नों में से कलिदास जी ने अभिज्ञान शाकुंतलम की रचना की जिसमें भारत के इतिहास के बारें में वर्णन किया गया है।

विक्रमादित्य काल में भारत सोने की चिड़िया  कहलाया

इनके शासन काल को ही स्वर्णिम काल  कहा  गया, क्योंकिं उस समय व्यापार के द्वारा भारत में इतना सोना आ गया था कि मुद्रा का चलन सोने के सिक्के में होने लगा। 

इसके साथ –साथ प्रजा सभी संसाधनों के साथ, बिना किसी भय के अपना जीवन व्यतीत कर रही थी, ना तो किसी के साथ अन्याय हो रहा था, और ना ही प्रजा पर लगान का भार था। सबके पास अपार धन था, यहाँ तक व्यापार भी अपनी चरम पर था।

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चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य का विजय अभियान

Samrat Vikramadity
Samrat Vikramadity

विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को पराजित किया। सम्राट विक्रमादित्य अपने राज्य की प्रजा की दशा देखने के लिए रात में वेष बदलकर अपनी प्रजा के पास जातें थें। राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में न्याय व्यवस्था के लिए हर संभव प्रयास करते थे और यह सुनिश्चित करते थें कि उनके शासन में न्याय के लिए किसी के साथ भेदभाव ना हो। इतिहास में वों सबसे लोकप्रिय और न्यायप्रिय राजा माने गये हैं।

विक्रमादित्य ने भारत की भूमि को विदेशी आक्रमणकारियों से मुक्त करने के लिए एक अभियान चलाया, उन्होंने अपनी सेना को फिर से गठित किया। उनकी सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बताई गई है और इस अभियान के द्वारा भारत की सभी दिशाओं में अपनी विजय का परचम लहराया और भारत को एक सूत्र में पिरोया। इन्होने अपना राज्य का विस्तार अरब और मिस्र तक किया

चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य के विषय में ग्रंधों आदि में उल्लेख मिलना

कल्हण की राज्तारिग्नी किताब के अनुसार 14 इसवी के आस–पास कश्मीर में अदं युधिस्तर वंश के राजा हिरन्य के निसंतान मारे जाने पर अराजकता फैल गई,यह देखकर वहां के मंत्रियों की सलाह से मात्रगुप्त को कश्मीर का शासन सँभालने के लिए भेजा था।

नेपाली राज वंश के अनुसार नेपाली राजा अन्सुवार्ण के समय उज्जेन के राजा विक्रमादित्य के आने का पता चलता है।

संस्कृत, हिंदी, मराठी, बंगला, गुजराती आदि भाषा में राजा विक्रमादित्य का वर्णन मिलता है और इसके साथ-साथ इनके पराक्रम, वीरता, दया, उदारता, क्षमा. न्यायप्रिय शासन आदि गुणों का भी वर्णन भारतीय साहित्य में मिलता है।

महाराज विक्रमादित्य का विस्तार से वर्णन स्कंद और भविष्य पुराण में मिलता है। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में भी वर्णन मिलता है, उस समय उनका शासन अरब और मिस्र तक फैला था और समूर्ण धरती के लोग इससे परिचित थें।

इतिहासकारों के अनुसार विक्रमादित्य का राज्य ईरान, ईराक और अरब तक था। विक्रमादित्य के अरब विजय का वर्णन अरबी कवी जर्हाम किन्तोई ने अपनी पुस्तक सायर उल ओकल में किया है।

तुर्की के इन्स्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लाइब्रेरी मक्तव्य सुल्तानिया में एक एतिहासिक ग्रन्ध हैं शायर उल ओकल उसमें विक्रमादित्य से सम्बंधित एक शिलालेख का उल्लेख है जिसमें कहा गया है कि “वें लोग भाग्यशाली हैं जो विक्रमादित्य के राज्य में जन्में और अपना जीवन व्यतीत किया, वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्त्तव्य निष्ठ शासक थें जो प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के बारें में सोचतें थें, उन्होंने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फैलाया और अपने देश के उच्च कोटि के विद्वान लोगों को यहाँ भेजा ताकि भारतवर्ष की शिक्षा का उजाला पुरे विश्व में फैल सकें। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान् की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारें में बताकर एक परोपकार किया है”।


चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य की प्रसिद्धी के कारण राजाओं ने अपने नाम के आगे विक्रमादित्य लगाना आरम्भ किया  

विक्रमादित्य शासन के विद्वान अन्य देशों में जाकर शिक्षा का प्रचार और प्रसार कर रहे थें।

इसके अलावा भारत में और भी सम्राट हुए है जीनके नाम के आगे विक्रमादित्य लगाने का प्रचलन शुरू हुआ

जिनमें हैं सुद्रक, फल, चन्द्रगुप्त दित्तीय, यशोवर्धन आदि आदित्य शब्द देवताओं से सम्बंधित हैं और बाद में विक्रमादित्य की प्रसिद्धी के बाद राजाओं को विक्रमादित्य की उपाधि दी गई।     

Chakarvati Samrat Vikramadity Ke Shasan Men Bharat Sone Ki Chidiyan Kahlaya   

हिन्दू धर्म में आज जो ज्योतिष गणना होती है हिंदी सम्वत, वार, तिथिया, राशि, नक्षत्र, गोचर, ये सब उन्ही कि रचना है, वो बहुत ही बुद्धिमान राजा थें। विक्रमादित्य के काल में प्रत्येक नियम धर्म शास्त्र के अनुसार बने हुए थें। विक्रमादित्य का राज्य राम राज्य के बाद सर्वश्रेठ माना गया हैं। विक्रमादित्य के शासन काल में प्रजा धर्म और न्याय में चलने वाली थीं।

यह हमारी विडंबना देखिये विक्रमादित्य काल को काल्पनिक और मिथ्य कह कर हमारे इतिहास से हटा दिया गया ताकि हम अपने महान राजा के बारे जानकारी ना लें और हमेशा यह सोचते रहे कि हमारा देश का इतिहास पिछड़ा और अशिक्षित रहा हैं। हमारे इतिहास को काल्पनिक और मिथ्य कहने वाले कोई और नहीं बल्कि बहार से आने वाले विदेशी हमलावर और लुटेरे ही थें।

इतना सबकुछ होने के बाद भी आज हम भारत वर्ष के महानतम राजा के बारें में कुछ भी नहीं जानतें, आप सबसे मेरा विनर्म निवेदन है कि आप मेरी इस पोस्ट को अवश्य शेयर करें ताकि भारत का मान और गौरव बढ़ाने वालें राजा विक्रमादित्य के बारें में सबको पता चलें और जान सकें भारत को सोने की चिड़िया बनाने वाला महान राजा कौन था।Chakarvati Samrat Vikramadity Ke Shasan Men Bharat Sone Ki Chidiyan Kahlaya

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प्रकाश चाँद जोशी

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