Dr Radhakrishnan second president of india

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Dr Radhakrishnan second president of india
Dr Radhakrishnan

Dr Radhakrishnan second president of india

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन उन महान राजनेताओं में से एक थें जिन्हें अपनी संस्कृति और देश से गहरा लगाव था । वें एक आस्थावान हिन्दू थें, साथ ही अन्य समस्त धर्मों के प्रति भी गहरा आदर भाव रखतें थें। जो लोग वैचारिक मतभेद रखते थें उनकी बात भी बड़े धैर्य से समझते थें। वह स्वतंत्र भारत के दुसरे राष्ट्रपति थें। Dr Radhakrishnan second president of india

जन्म और शिक्षा

उनका जन्म 5 सितम्बर, सन 1888 को तमिलनाडु राज्य के तिरुपति नामक गाँव में हुआ था, जो चेन्नई से 64 किलोमीटर दूर हैं। उनकी प्राथमिक शिक्षा मिशन स्कूल तिरुपति में हुई और माध्यमिक शिक्षा बेलौर college में हुई।

BA और MA की उपाधि उन्होंने क्रिस्चियन college से की और इसी college में उन्होंने 1909 में दर्शनशास्त्र के तौर पर अध्यापन का कार्य किया। भारत का उपराष्ट्रपति का पद सँभालने तक वह college में भारतीय दर्शन और हिन्दू धर्म के विषय में पढाते रहें। इसी कारण भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।

अनेक क्षेत्रों में उनका योगदान

एक शिक्षक, विद्वान, दार्शनिक, राजनितिज्ञ, शिक्षाविद, लेखक, वक्ता व कुशल प्रशासक के तौर पर उनका योगदान काफी सराहनीय और अमूल्य है।उनका कहना था कि“हिन्दू धर्म सब प्रकार के विश्वासों को स्वीकार करता हैं और उनकों ऊँचें स्तर तक उठाता हैं। स्वामी विवेकानन्द के बाद वही भारतीय दार्शनिक थें जिन्होंने हिन्दू धर्म को उचित ढंग से समझाया। इस रूप में उनकी भूमिका शंकराचार्या जैसे रही। दुसरें धर्मों के लिए भी उनके मन में आदर-भाव था।

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में भी डॉक्टर साहब ने काफी समय तक अध्यापन का कार्य किया था। इंग्लेंड के कई चर्चों में भी उन्होंने भाषण दियें थें। एक बार पोप ने भी डॉक्टर साहब को सम्मानित किया था। उनके भाषण सुनकर सभी श्रोता मंत्रमुग्ध हो जातें थें। उनके बोलने की शैली सबको प्रभावित करती थी।

आजादी के बाद बाहर के देशों में भारत को सम्मान दिलाना

इंग्लैंड की यात्रा

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डॉक्टर राधाकृष्णन बड़े हाजिर जवाब थें और विश्व में उन्हें हिन्दुत्व के बड़े विद्वान के रूप में पहचाना जाता था। जब भारत आजाद नहीं हुआ था तो वें इंगलेंड गये, सब उनका भाषण सुनने आये हुए थें।

भोजन के दौरान एक अंग्रेज ने उनसे पुछा “क्या हिन्दू नाम का कोई समाज हैं? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरें हुए हो, तुम्हारा रंग एक जैसा नहीं है, कोई गौरा है, कोई काला है, कोई धोती पहनता है, कोई लुंगी, कोई कुरता तो कोई कमीज। देखों हम सब अंग्रेज एक जैसे हैं, सब गौरें और लाल-लाल”। इस बात पर राधाकृष्णन जी ने जल्दी जवाब दिया “घोड़े सब अलग –अलग रूप के होतें हैं, पर गधें सब एक जैसे होते हैं और यही अलग-अलग रंग और विविधता विकास की पहचान हैं”।

मास्को की यात्रा

सन 1949 में डॉक्टर राधाकृष्णन जी को भारत का राजदूत बनाकर मास्को भेजा गया। इससे पहले रूस के विचार भारत के प्रति  और महात्मा गांधी के सम्बन्ध में सही नहीं थें। लेकिन डॉक्टर साहब ने वहां पहुंचकर अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा लिया था।

एक घटना अत्यंत महत्वपूर्ण रही, जब वें रुस के लौह पुरुष जेकोब स्टॅलिन से मुलाकात करने पहुचें, बातचीत के दौरान डॉक्टर साहेब ने कहा, “हमारे देश में एक महान सम्राट हुए है, उसने भीषण युद्ध व विजय के पश्चात अपनी तलवार तौड दी थी और अहिंसा का दामन थाम लिया था।…..आपने शक्ति के लिए हिंसा का तरीका अपनाया है……किसी को क्या मालूम, हमारें उस महान सम्राट की वह घटना आपके यहाँ दोहरा दी जाये……. ।“ स्टालिन ने मुस्कराते हुए कहा “हाँ वास्तव में कभी–कभी ऐसे चमत्कार हो जाते हैं…..मैं भी पाँच वर्षों तक ब्रह्मज्ञान में रह चुका हूँ……. ।

सन 1952 में रुस से वापस आने से पहले वों स्टालिन से मिलने गए, उन दिनों स्टालिन रोग शय्या पर थें, उन्होंने डॉक्टर राधाकृष्णन जी को सच्चा देशभक्त कहकर सम्मानित किया ।

डॉक्टर साहब द्वारा अच्छे व्यवहार के कारण स्टालिन ने डॉक्टर राधाकृष्णन जी से कहा कि “आप पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने मुझे मानव समझकर व्यवहार किया है, दानव समझकर नहीं”। आप हमें छोड़कर जा रहें हैं। इसका मुझे दुःख है । मैं तो अधिक दिनों तक जी नहीं पाउँगा, किन्तु मैं चाहूंगा कि आपकी आयु लम्बी हो”। उन्हें रुस में काफी सम्मान मिला और दोनों देश एक–दुसरे के करीब आयें।

डॉक्टर राधाकृष्णन जी को भारत का उपराष्ट्रपति व राष्ट्रपति के पद के लिए चुना जाना

सन 1952 में डॉक्टर राधाकृष्णन जी को भारत का उपराष्ट्रपति चुना गया और इसके साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति व साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। ये दायित्व भी उन्होंने बड़ी कुशलता से निभाएं। सन 1957 में डॉक्टर राधाकृष्णन जी दोबारा भारत के उपराष्ट्रपति चुने गए।

1962 में वह भारत के राष्ट्रपति चुने गए। उनको मासिक वेतन दस हजार रुपए मिलता था जिसमें से उन्होंने 2500 लेना ही स्वीकार किया। उनके चुनाव पर देश-विदेश में खुशी की लहर थी। भारत के सर्वोच्च पद पर वह व्यक्ति आसीन था जिसने देश में ही नहीं अपितु बाहर देशों में भारत का मान और सम्मान बड़ाया।

डॉक्टर राधाकृष्णन जी की रचना

डॉक्टर राधाकृष्णन जी ने बहुत से विषयों में अपनी लेखनी द्वारा कार्य किया और कई पुस्तकों की रचना की।

डॉक्टर राधाकृष्णन जी की अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ थी और अंग्रेजी भाषा में गीता का अनुवाद उनकी महान कृती मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने Heart of Hindustaan, Hindu view of life, Gautam the Budh, Eastern and Western of thought  आदि महान पुस्तकें हैं जिसने समस्त विश्व में डॉक्टर साहब की बुद्धी का लौहा मनवाया।

महात्मा गांधी के साथ

गीता का अनुवाद उन्होंने महात्मा गांधी को समर्पित किया था। इसके लिए उन्होंने गांधी जी से अनुमति चाही तो गांधी जी ने कहा “मैं जानता हूँ कि आप लिखेंगें वो असाधारण तो होगा ही फिर भी मैं आपसे कुछ पुछना चाहुंगा। मैं आपका अर्जुन हूँ और आप मेरे कृष्ण हैं। मैं अर्जुन की तरह भ्रमित हूँ………..गांधी जी ने ब्रह्मचर्य से सम्बंधित कुछ शंकाए प्रस्तुत की और जब उनका पूरा-पूरा समाधान पा लिया तभी ‘समर्पण’ के लिए हाँ की ।

डॉक्टर साहेब भारतीय संस्कृति की महानता और सुन्दरता की सजीव मूर्ति थें। उनके भाषण में भाषा की सरलता और भावों की गहनता थी । जब वों बोलतें थें तो सब लोग उन्हें बड़े ध्यान से सुनतें थें।

Dr Radhakrishnan second president of india

डॉक्टर साहब पत्रकारों से मिलने में संकोच करतें थें, परन्तु बच्चों से बड़े प्यार से मिलते थें। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने तीन प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया जिनमे नेहरु जी ,शास्त्री जी व इंदिरा जी थें । उन्होंने स्वेच्छा से दो बार राष्ट्रपति पद लेने से मना  कर दिया, उनका कहना था कि एक व्यक्ति को सर्वोच्च पद एक बार ही मिलना चाहिए।

राष्ट्रपति पद के बाद वें एकांतवास करने लगे थें। 1954 में उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। निसंदेह वह भारत के रत्न थें ।

डॉक्टर राधाकृष्णन जी के विचार

वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित भाव से शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने अनेक वर्षोँ तक अध्यापन किया। एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें थे। उनका कहना था कि शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिये जो सबसे अधिक बुद्धिमान हों। शिक्षक को केवल अच्छी तरह अध्यापन करके ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिये अपितु उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर भी अर्जित करना चाहिये। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे प्राप्त करना पड़ता है।

डॉक्टर साहब का विचार था कि धर्म का लक्ष्य अंतिम सत्य का अनुभव हैं। अंतरात्मा का ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता है और प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की प्रतिमा है। दर्शन का अल्पज्ञान मनुष्य को नास्तिकता की ओर ले जाता है, परन्तु दार्शनिकता की गहनता में प्रवेश करने पर मनुष्य का मन धर्म की ओर हो जाता हैं। समय मूल्यवान अवश्य है, लेकिन समय से भी अधिक मूल्यवान सत्य है।

डॉक्टर राधाकृष्णन जी एक वर्ष तक अस्वस्थ रहें। 17 अप्रैल 1975 को 87 वर्ष की आयु में मद्रास के नर्सिंग home में भारतीय दर्शन का यह सूर्य अस्त हो गया।

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