EKLAVYA KI GURU DAKSHINA

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EKLAVYA

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हिरन्यधनु जो भीलों का एक राजा था, वो बड़ा प्रतापी और वीर था। बड़े-बड़े राजा भी उसका लोहा मानतें थें। हिरन्यधनु का एक पुत्र एकलव्य था जो पिता के समान ही बहुत साहसी और वीर था वो जो भी काम हाथ में लेता था, उसे पूरा अवश्य करता था। EKLAVYA KI GURU DAKSHINA 

गुरु द्रौणाचार्य से धनुष विधा की शिक्षा प्राप्त करने का निर्णय

एक बार एकलव्य जंगल में अकेला ही घूम रहा था तो उसने अचानाक एक राजकुमार को तीर से (आखेट) शिकार करते हुए देखा तो उसे काफी देर तक देखता ही रहा और उसने मन ही मन सोचा कि “यदि मुझे भी इस प्रकार तीर चलाना और अपने शिकार पर सटीक निशाना लगाना आ जाये तो कितना अच्छा होगा, कोई भी मेरी बराबरी नहीं कर सकेगा”।

उसने शीघ्र ही राजकुमार से प्रश्न किया कि “कुमार आपने यह धनुष विधा किससे प्राप्त की? और आपके गुरु कौन हैं”?”

राजकुमार का ध्यान अचानक भंग हुआ तो उसने क्रोध में उत्तर देते हुए कहा “गुरु द्रौणाचार्य” और शान से अकड़ता हुआ वहां से चला गया। एकलव्य को उसका व्यवहार देखकर अच्छा नहीं लगा, लेकिन उसपर इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, उसका ध्यान तो केवल यह था की किसी प्रकार भी गुरु द्रौणाचार्य से धनुष विधा की शिक्षा प्राप्त करू और ऐसा धनुधर्र बनु जिसकी कोई बराबरी ना कर सकें।

EKLAVYA KI GURU DAKSHINA 

घर पहुँचकर पिताजी को अपना निर्णय बताना

घर की ओर जाते हुए, उसके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था कि “मुझे गुरु द्रौणाचार्य से धनुष विधा सीखनी है” । जब एकलव्य घर पंहुचा तो उसने पिताजी से गुरु द्रौणाचार्य के बारें में पुछा कि “पिताजी गुरु द्रौणाचार्य कौन हैं और कहाँ रहते है? मैं उनसे धनुविर्धा की शिक्षा प्राप्त करना चाहता हूँ” ।

पुत्र. द्रौणाचार्य जैसे धनुर्धारी इस संसार में कोई और नहीं है, वें धृतरास्ट्र के राजकुमारों को धनुष विधा सिखातें हैं और राजधानी, हस्तिनापुर में रहतें हैं ।

पिताजी की बात सुनकर एकलव्य के मन में धनुष विधा सिखने की जिज्ञासा और बड़ने लगी और उसने पिताजी से कहा “मैं भी गुरु द्रौणाचार्य से धनुष विधा सिखुंगा”।

पिताजी ने सुना तो वो अचंभित हो गये और कुछ सोचने के बाद बोले “यह संभव नहीं है, वो तुम्हे कभी भी अपना शिष्य नहीं बनायेंगें, पुत्र”।

एकलव्य ने आश्चर्य से पूछा “क्यों नहीं बनायेंगें पिताजी”?

“पुत्र तुम क्षत्रिय नहीं हों, वह केवल क्षत्रिय कुमारों और राजकुमारों को ही धनुविर्धा की शिक्षा देतें हैं। मैं तुम्हारे लिए यही पर धनुविर्धा की शिक्षा का प्रबंध कर दुँगा”।

एकलव्य ने तेजी से कहा “नहीं पिताजी, मैं धनुविर्धा की शिक्षा लुंगा तो आचार्य द्रौण से ही। केवल आप इसकी अनुमति दें।

हिरन्यधनु अपने बेटे की धुन को जानतें थें कि वो जिस काम को करने का निश्चय लेता है उसे पूरा करके ही रहता है और एकलव्य के इस गुण से वों प्रसन्न भी थें। उन्होंने उसे रोका नहीं और राजधानी, हस्तिनापुर जाने की अनुमति दी।

धनुविर्धा की शिक्षा के लिए राजधानी, हस्तिनापुर जाना  

अगले दिन एकलव्य राजधानी की और चल पड़ा। उसके मन में अपने लक्ष्य को साकार करने के लिए अपूर्व उत्साह था और इसी उत्साह के साथ उसने जंगलों से होते हुए लम्बा रास्ता तय किया और राजधानी पंहुचा।

राजधानी पहुंचकर आचार्य द्रौण का पता पूछते-पूछते एकलव्य उनकी कुटिया तक जा पंहुचा। उसकें मन में आचार्य द्रौण के प्रति काफी सम्मान व आदर था क्योंकि वों उनको ही अपना गुरु मान चुका था। जब वो उनकी कुटिया के पास पंहुचा तो उस समय आचार्य द्रौण सभी राजकुमारों को धनुविर्धा के सिदांत का ज्ञान दे रहें थें।

एकलव्य को कुटिया के द्वार पर खड़े देखकर सब चोंक गयें। सब राजकुमार उसकी वेशभूषा देखकर पहचान गये थें कि यह भील है। सभी राजकुमारों को क्रोध भी आ रहा था कि यह कुटिया के द्वार तक कैसे पहुँच गया, इसे प्रहरी ने रोका क्यों नहीं।

आचार्य द्रौण द्वारा एकलव्य को धनुर्विधा की अनुमति ना देना    

आचार्य द्रौण भांप गए थें कि एकलव्य का इस तरह आना सभी राजकुमारों को बुरा लगा है, उन्होंने मीठे स्वर में एकलव्य से पुछा “कौन हो तुम? कहाँ से आयें हो और क्या चाहते हो? एकलव्य इतने प्रश्न पूछने के बावजूद ज़रा भी विचलित नहीं हुआ, आहिस्ता से आचार्य द्रौण के पास जाकर, उनके चरण स्पर्श करते हुए उसने कहा “आचार्य, मैं भीलराज, हिरन्यधनु का पुत्र एकलव्य हूँ और आपसे धनुविर्धा की शिक्षा प्राप्त करने आया हूँ, आप मुझे अपना शिष्य बना लिजियें”।

इसी बीच एकलव्य अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि सभी राजकुमार उसपर हँसने लगें उनकी हंसी देखकर एकलव्य को क्रोध तो आया, लेकिन वो चुपचाप रहा और बड़ी आशा के साथ आचार्य द्रौण की ओर देखने लगा। वें भी बड़ी गंभीरतापूर्वक उसी की ओर देख रहें थें। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा “भीलकुमार मैं तुम्हें अपना शिष्य नहीं बना सकता हूँ, मैं केवल क्षत्रियकुमारों को ही धनुविर्धा सिखाता हूँ, जाओ अपने घर लोट जाओ”।

एकलव्य को यह आशा नहीं थी कि आचार्य द्रौण इस प्रकार उत्तर देंगें, लेकिन उसे पूरा विश्वास था की वो उन्हें मना लेगा। उसने बड़े ही विनम्र स्वर में कहा, “आचार्य मैं प्रण कर चुका हूँ कि धनुविर्धा सिंखुगा तो आपसे ही और जब तक मेरा प्रण पूरा नहीं होता, मैं वापस नहीं जाऊंगा। आप से मेरा निवेदन है , आप मुझे अपना शिष्य बना लें”। आचार्य द्रौण भी विवश थें, वो उसकी प्रार्थना को स्वीकार ना कर सकें।

अनुमति ना मिलने पर भी अपने संकल्प पर अटल रहना

बड़ी हताशा और भारी मन से एकलव्य कुटिया से बाहर निकल आया। वो समझ ही नहीं पा रहा था कि अब क्या निर्णय लें, लेकिन हार भी नहीं मानना चाहता था। एक ओर पिताजी की बताई गई बातें याद आती और एक ओर राजकुमारों द्वारा उसपर किया गया व्यंग, उसके चारों ओर घूम रहा था। उनके व्यंग से भरी हंसी के चेहरे एकलव्य के सामने रह–रह कर आने लगते और वों क्रोध में लाल हो उठता। अंत में उसने धनुविर्धा सिखने का संकल्प लिया।

जंगल में एकलव्य द्वारा अकेले अभ्यास करना

वहां से निकलने के बाद वों वापस घर नहीं पहुंचा और अकेले ही जंगल में रहने लगा। जंगल में रहतें हुए एकलव्य ने आचार्य द्रौण की मिट्टी की एक प्रतिमा और पास ही अपनी कुटिया भी बनाई। वही रहते हुए अकेले ही धनुविर्धा का अभ्यास करने लगा, सवेरे सूरज निकलने से पहले और आधी रात तक तीर चलाने का अभ्यास करने लगता और यह अभ्यास सवेरे गुरु द्रौणाचार्य की मूर्ति के चरण स्पर्ष से शुरू होतें हुए कई दिनों, महीनों तक चलता रहता।

ग्रीष्म ऋतु उसे अपने कोप से जला नहीं पाई, भयंकर वर्षा ऋतु भी उसको हिला नहीं पाई, सर्द ऋतु भी उसके लक्ष्य को रोक नहीं पाया और वों निरंतर कठिन अभ्यास करता रहा और अंत में उसे उसकी मेहनत का फल मिला और वो एक कुशल धनुर्धर हो गया। 

शब्दभेदी बाण चलाकर कुत्ते का मुहँ सिलना बिना किसी हानि के

EKLAVYA KA SHABDHBEDI VAAN
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एक दिन जब एकलव्य अपने गुरु द्रौणाचार्य की मूर्ति के सामने अपने लक्ष्य को साध रहा था, उसके एक हाथ में धनुष था और दूसरा कान तक प्रत्यंचा ताने था कि अचानक एक कुत्ता उसके पास आकर भों-भों करने लगा, जिससे एकलव्य का ध्यान हटने लगा। पहले एकलव्य ने उसे भगाने की कोशिश की, परन्तु जब वों ना भागा तो उसने शब्दभेदी बाण चलाकर उसका मुहँ अन्दर से पूरा सी दिया लेकिन कुत्तें को इस दौरान कोई चोट ना आई।

बाणों से बंधा कुत्ता वहां से भाग खड़ा हुआ। यह कुत्ता कौरव-पांडव राजकुमारों का था जो वन में शिकार के लिए आयें थें, कुत्ता सीधे उनके के पास पंहुचा। जब उन्होंने कुत्तें को देखा कि उसका मुह सिला हुआ है और उसकों कोई क्षति नहीं पहुची है तो यह दशा देखकर सब के सब चकरा गये, उन्हें अपनी आँखों में विश्वास ही नहीं हुआ, काफी देर तक वों कुत्ते को देखते रहें। वह तो अबतक अर्जुन को ही सबसे बड़ा धनुर्धर मानतें थें, लेकिन यह तो उनसे भी बड़ा धनुर्धर निकला। वो कुत्तें को लेकर सीधे गुरु द्रौणाचार्य के पास पहुचें।

कुत्तें की दशा के बारें में गुरु द्रौणाचार्य को पता चलना  

कुत्तें की यह दशा देखकर द्रौणाचार्य भी अचंभित हो गये और मन ही मन उस अज्ञात धनुर्धर की प्रसंशा किये बिना भी ना रह सकें। एकलव्य ने कितनी ही सफाई से कुत्ते का मुंह सी दिया था। वें राजकुमारों के साथ उस धनुर्धर को खोजने निकल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद एकलव्य दिखाई दिया तो आचार्य द्रौण, उसे पहचान गये, उन्होंने उसके पास जाकर बड़े स्नेह से कहा “पुत्र तुम बहुत बड़े धनुर्धर हो गए हो, कहाँ से सीखी है यह विधा और तुम्हारे गुरु कौन हैं”?

“मेरे गुरु आचार्य द्रौण हैं और मैंने यह विधा उनसे ही सीखी है”।

सभी राजकुमार और आचार्य द्रौण अचंभित होकर बोल उठें “आचार्य द्रौण”! 

“हाँ, आचार्य द्रौण” कहकर एकलव्य ने उनकी प्रतिमा की ओर ईशारा करतें हुए सारी घटना कह सुनाई। एकलव्य द्वारा उन्हें अपना गुरु मानते हुए जो सम्मान उसने अपने गुरु द्रौण को दिया यह सुनकर वो मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें पछतावा भी हुआ कि मैंने क्यों ऐसे होनहार, प्रतिभाशाली शिष्य को शिक्षा देने से मना कर दिया, लेकिन तभी उन्हें अपने शिष्य अर्जुन को दिया गया वचन याद आया जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि “अर्जुन से बड़ा धनुधर्र इस पुरे संसार में कोई ना होगा” ।

आचार्य द्वारा एकलव्य से गुरु दक्षिणा मांगना

लेकिन उन्हें पूरा भय था कि एकलव्य तो अर्जुन से भी कई गुना ज्यादा प्रतिभाशाली है और इतनी अल्प आयु में शब्दभेदी बाण चलाना भी जानता है, अब अर्जुन को दिए गए वचन का क्या होगा? तभी उनके मन में एक उपाय आया और वों एकलव्य से बोले “पुत्र जब तुमने मुझे अपना गुरु मान लिया है तो मैं भी तुम्हें अपना शिष्य स्वीकार करता हूँ, लेकिन इसके बदले तुम मुझे गुरु-दाक्षिणा में क्या दोगें?

एकलव्य ने बड़े आदर से आचार्य द्रौण को नमन करते हुए कहा “जो भी आज्ञा दें, गुरुदेव”

अतिशिघ्र ही आचार्य द्रौण ने कहा “मुझे तुम अपने दायें हाथ का एक अगूंठा दे दो”

एक क्षण भी बिना विलम्ब किये और बिना झिझके एकलव्य ने कटार निकाली और अपने दायें हाथ का अगूंठा काट डाला और आचार्य द्रौण के चरणों में अर्पित कर दिया।आचार्य द्रौण उसकी गुरु के प्रति अपार निष्ठा और समर्पण से गदगद हो उठें और उनके नेत्रों से आँसू टपकने लगें ।  

भीलकुमार के चेहरे में अभी भी वीरों की भाति तेज था। कौरव और पांडव राजकुमारों ने जब यह सब देखा तो उन सबकी आँखें फटी की फटी रह गई और वों एकलव्य को सबसे महान मान बैठें, यहाँ तक आचार्य द्रौण से भी ज्यादा ।

अभिमन्यू का चक्रव्यूह तोड़ना

प्रिय पाठकों,

आज के दौर में गुरु के प्रति शिष्य की निष्ठा बिल्कुल समाप्त हो चुकी है। शिष्य की निष्ठा गुरु के प्रति यह नहीं की वों अपने प्राण न्योछावर कर दें, बल्कि यह है कि उन्हें सम्मान दें और उनकी आज्ञा की अवहेलना ना करें, और उनके द्वारा बताएं गए पथ पर चलें ।

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आपका शुभचिंतक

प्रकाश चाँद जोशी

Hamaarijeet.com 

        

 

 

  

 

 

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