Ganga Putra Devvrat Ki Bhism Pratigya

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BHISM PRATIGYA

GANGA PUTRA DEVVRAT KI BHISM PRATIGYA

Ganga Putra Devvrat Ki Bhism Pratigya गंगा पुत्र देवव्रत का नाम भीष्म कैसे पड़ा? इसके बारे में मैं आपको महाभारत की एक घटना से अवगत करा रहा हूँ, जिसे आप अवश्य पढ़े। गंगा पुत्र, देवव्रत जिनका नाम बाद में भीष्म पड़ा, उनके पिताश्री, शांतनु जब शिकार करके काफी देर तक वन से वापस नहीं आये तो उनके पुत्र देवद्रत काफी चिंतित हुए और काफी देर के पश्चात उनके पिताश्री, शांतनु आये तो भीष्म जी ने उनसे पुछा “आप कहाँ रह गए थें, पिता महाराज, हम लोग बहुत चिंतित हो गए थें”? 

शांतनु “मार्ग नहीं मिल रहा था, पुत्र” कह कर अपने शयन कक्ष में चले गये”।   

यह सब देखकर देवव्रत विचार करने लगे की उनके पिता महाराज इतने चिंतित क्यों हैं।

नित्य शिकार पर जातें और रात में जब वापस आतें तो फिर से चिंतित रहतें और किसी से ना बोलतें, यहाँ तक अपने पुत्र से भी ना बोलते।

शांतनु और उनके पुत्र, देवव्रत के बीच वार्तालाप

एक दिन जब उनके पिता महाराज अपने शयन कक्ष में थें तो देवव्रत उनके कक्ष में गए और बोले “मैं हजारों बाणों का घाव सहन कर सकता हूँ पिता महाराज, परन्तु आपके मौन का घाव मुझसे सहा नहीं जाता, मुझे तो बताइये क्या बात है”।

शांतनु: “क्या बताऊ पुत्र”?

देवव्रत: “वही बात जिसने आपको मौन की मूर्ति बना दिया है, पिता महाराज”।

शांतनु: “कोई बात है ही नहीं पुत्र तो क्या बताऊ”?

देवव्रत: “यदि राज्य की कोई चिंता हो तो युवराज होने के नातें मुझे इस बात का ज्ञान तो होना ही चाहियें”।

शांतनु: “अवश्य, परन्तु राजा भी अपनी सारी चिंताएं किसी को नहीं बता सकता है”।

देवव्रत” “क्या पिता भी अपनी सारी चिंताएं अपने पुत्र को नहीं बता सकता है”?

शांतनु: “हाँ, पिता भी अपनी सारी चिंताएं पुत्र को नहीं बता सकता है”।

देवव्रत “परन्तु पिता महाराज”

शांतनु: “जाओं पुत्र, विश्राम करों”।

देवव्रत: “जो आज्ञा महाराज”।

देवव्रत पिता द्वारा आज्ञा मिलने के बाद उनके शयन कक्ष से बाहर आ गए, परन्तु बार-बार उनके मन में एक ही प्रश्न था कि अपने पिता की चिंता को कैसे दूर किया जाए।

GANGA PUTRA DEVVRAT KI BHISM PRATIGYA


सारथी और देवव्रत के बीच वार्तालाप

एक बार जब शांतनु वापस शिकार करके आये तो सारथी को अपने शयन कक्ष में बुलाया और कहा कि “मैं अपने पिता महाराज के लिए बहुत चिंतिंत हूँ सारथी, आप मेरे पिता के मित्र भी है और सारथी भी। ये प्रतिदिन आप पिता महाराज को कहाँ लें जातें हैं?

सारथी: “जहाँ ले जाने कि आज्ञा मिलती है युवराज”।

देवव्रत: “और वो कहाँ ले जाने की आज्ञा देतें हैं”।

सारथी: “जहाँ जाने को उनका जी करता है”।

देवव्रत: “आपकी निष्ठा आदरणीय है, परन्तु लगता है आप राजा भक्त है, राज्य भक्त या देशभक्त नहीं। इस समय पिता महाराज का मन भटका हुआ है और मेरा जानना अत्यंत आवश्यक है कि वो प्रतिदिन सूर्योदय के पश्चात कहाँ जातें हैं? यह प्रश्न आपसे मैं नहीं कर रहा हूँ, यह प्रश्न आपसे हस्तिनापुर कर रहा है और इस प्रश्न का उत्तर देना हस्तिनापुर के प्रति आपकी निष्ठा का कर्तव्य है”।

सारथी: “मैं क्षमा चाहता हूँ महाराज, परन्तु मैं महाराज से विश्वासघात नहीं कर सकता हूँ”।

देवव्रत: “परन्तु आप हस्तिनापुर से विश्वासघात कर सकते हैं। आप भारत वंश के साथ विश्वासघात कर सकते हैं। निष्ठा की जो परिभाषा आपने सोच रखी है, वो वास्तव में निष्ठा नहीं, अनिष्ठा है”।

कुछ देर सोचने के बाद सारथी ने कहा: “वो प्रतिदिन यमुना तट पर जातें हैं, युवराज”।

देवव्रत: “यमुना तट और वहां जाकर वो करते क्या हैं”।

सारथी: “किसी पेड़ की औट से दासराज की पुत्री, सत्यवती को देखते रहतें हैं”।

देवव्रत: “पेड़ की ओट से”

सारथी: “जी युवराज”।

देवव्रत:  “दिनभर”?

सारथी: “जी युवराज”।

देवव्रत: “क्या पिता महाराज कभी सत्यवती से मिलें” ?

सारथी: “जी युवराज”

देवव्रत: “दासराज से”

सारथी: “उनसे भी मिलें”।


दासराज और देवव्रत के बीच वार्तालाप

यह सब सुनने के बाद गंगा पुत्र, देवव्रत तुरंत दासराज से मिलने के लिए निकलें और दासराज के पास पहुचें।

दासराज: “गंगा पुत्र इतनी रात गए”?

देवव्रत: “दासराज को कुरु पुत्र, देवव्रत का प्रणाम”।

दासराज: “युवराज ने सूर्योदय की प्रतीक्षा क्यों नहीं कि आने के लिए”?

देवव्रत: “मैं हस्तिनापुर राज्य के सूर्य की ओर से चिंतित होकर आपकी सेवा में आया हूँ, दासराज आप मुझे यह बताएंगें कि आप और हमारे पड़ाव के बीच पिता महाराज कहाँ खो गए”?

दासराज: “आप विराजिए तो”,

देवव्रत: “ये बैठने का समय नहीं है महाराज, कृपया आप मुझे पिता महाराज के बारें में कुछ बताएं”।

दासराज: “वे मेरी पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहतें हैं”।

देवव्रत: “तो फिर रुकावट क्या हैं? क्या आपको हस्तिनापुर और पिता महाराज का हृदय, देवी सत्यवती के लिए छोटा दिखाई दे रहा हैं”?

दासराज: “ये आपने क्या कह दिया गंगा पुत्र”?

देवव्रत: “तो फिर”

दासराज: “बस एक रुकावट है गंगा पुत्र”।

देवव्रत: “और वो रुकावट है क्या”?

दासराज: “सत्यवती के भाग्य रेखा कहती है कि उसका पुत्र राज करेगा और यही एक वचन महाराज ने नहीं दिया”।

देवव्रत: “वें यह वचन दे ही नहीं सकतें दासराज”।

दासराज: “मैं समझा नहीं कुमार”।

देवव्रत: “उन्हें तो यह वचन देने का अधिकार ही नहीं था दासराज”।

दासराज: “राजा को वचन देने का अधिकार नहीं कि उसके बाद कौन राज करेगा”?

देवव्रत: “अधिकार हैं पर पिता महाराज उस अधिकार का प्रयोग कर चुकें हैं, कोई राजा एक वस्तु या पद को दो व्यक्ति को तो नहीं दे सकता दासराज। आपने  महाराज के धर्म संकट को समझने का प्रयास ही नहीं किया”।

दासराज: “तो आप समझा दीजिये”

देवव्रत: “हस्तिनापुर का राज सिहांसन वो मुझे दे चुकें हैं, वो राज सिहांसन उनके बाद मेरा होने वाला हैं  और मेरे रहते ये राज सिहांसन किसी और को दे दें, ये तो असंभव हैं ना दासराज, ये तो घोर अन्याय हो जाएगा और यदि मैं चाहु तो वो राज सिहांसन किसी को दे सकता हूँ। इसलिए मैं आपको वचन देता हूँ कि हस्तिनापुर का राज सिहांसन देवी सत्यवती और पिता महाराज के ज्येष्ठ पुत्र को ही दुँगा”।

दासराज: “आप धन्य हैं गंगा पुत्र और आपके चरणों की धूल पाकर मेरा घर भी धन्य हो गया। धन्य है वो देश जहाँ आप जैसा महापुरुष और आदर्श पुत्र जन्मा। अपनी  प्रसन्ता का दाम अपने भाग्य से चुकाना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं”।

देवव्रत: “नहीं दासराज नहीं, जो हो रहा है वो भाग्य रेखा के अनुसार ही हो रहा हैं, यदि हस्तिनापुर के राज्य की गद्दी मेरे भाग्य में होती तो देवी सत्यवती की भाग्य रेखा उसका विरोध क्यों करती? भाग्य रेखाएं कभी एक दूसरे को नहीं काटती। दासराज इसलिए मैं देवी सत्यवती के भाग्य रेखा को प्रणाम करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें तो मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊ”।

दासराज: “परन्तु गंगा पुत्र”

देवद्रत ने क्रोध में कहाँ:  “ये कौन सा परन्तु है. दासराज जिसने  सर्प के सामान फन काट लिया”।

दासराज: “जिस प्रकार महाराज को आपकी ओर से वचन देने का अधिकार नहीं था उसी प्रकार आपको भी अपने वंशज की ओर से कोई भी वचन देने का अधिकार नहीं हैं यदि आपकी संतान ने हस्तिनापुर पर अपने अधिकार का प्रश्न उठाया तो उसका परिणाम क्या होगा गंगा पुत्र”?

देवव्रत: “आपकी यह आशंका आधारहीन नहीं, इसलिए मैं इस अजगर का मुँह भी चीर देता हूँ” ।

हां मैं अपनी संतान की ओर से वचन देने का अधिकारी नहीं, परन्तु मैं संतानहीन रहने का अधिकारी तो हूँ दासराज। इसलिए मैं गंगा पुत्र, देवव्रत चारों दिशाओं, धरती और आकाश को साक्षी मानकर आज यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि आजीवन ब्रह्मचारी रहुँगा जीवन भर विवाह नहीं करूंगा वंशहीन ही जियूँगा और वंशहीन ही मरूंगा  ये मेरी अखंड प्रतिज्ञा हैं”।

देवव्रत द्वारा प्रतिज्ञा लेने पर बादलों से गर्जना होने लगी और सभी देवता गण प्रकट होकर देवव्रत पर पुष्प  अर्पण करने लगें।


SAMAY CHAKRA
SAMAY CHAKRA

समय चक्र: “मैं ना किसी का मित्र हूँ ना किसी का शत्रु, ना किसी से नाता और ना किसी से रिस्ता। मैं इन बंधनों से मुक्त हूँ इसलिए मैं जो अब कहें वाला हूँ उसे ध्यान से सुनो। ये उस आदर्श मूर्ति देवव्रत की बात हैं जो देखते-देखते एक क्षण में देवव्रत से भीष्म बन गया। मैं उस महापुरुष को प्रणाम करता हूँ । समय होने के नातें मुझे भीष्म द्वारा ली गई सारी  प्रतिज्ञाएं भी याद हैं और बाद की भी और इसलिए केवल मैं ही यह कह  सकता हूँ कि ना इससे पहले कोई ऐसी प्रतिज्ञा हुई और ना इसके बाद जिसने ब्रह्माण्ड को हिला दिया मैं उस महापुरुष को प्रणाम करता हूँ”। GANGA PUTRA DEVVRAT KI BHISM PRATIGYA

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