Hindi Me Kahani Hans Aur Kauwa

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Hindi Me Kahani Hans Aur Kauwa

Hindi Me Kahani Hans Aur Kauwa गंगा नदी के किनारें पर एक बरगद का पेड़ था। पूर्व दिशा से सुबह की शुरुआत सूर्य की रोशनी के साथ हुई। गंगा नदी का पानी कलकल करता हुआ बह रहा था और तभी तीन हंस उस बरगद के पेड़ के नीचें आयें। सफ़ेद रंग के मानसरोवर के राजहंस ! दूध से भी अधिक सफ़ेद पंख और मोतियों का चारा चुगती सुन्दर लाल चोंच ! पचास कोस की उड़ान भरने के बाद उनकें चेहरें और पंख में थोड़ी थकान लग रही थी। hindi kahani hansh aur kauwa

तीनों हंस बरगद के पेड़ पर बैठ गये। बरगद पर एक कौवा भी रहता था।काली-काली उसकी आँखें और उससे भी ज्यादा काली उसकी चोंच 

Hindi Me Kahani Hans Aur Kauwa हंसों को देखकर, कौआ कावं-कावं करता हुआ कूदने लगता, एक पल अपनी गर्दन घुमाता, अपनी चोंच को ऊपर-नीचें, दायें-बाएं घुमाता और एक आँख की पुतली घुमाता, कभी एक डाल से दुसरे डाल में कूदता और अपनी चोंच को साफ़ करता ।

सभी हंस आराम से बैठककर थकान दूर कर रहें थें तभी उनकी और गुस्से से देखर कव्वा बोला “यहाँ कौन बैठा है” और एक पाँव उठाकर उसने हंसों पर बीट कर दी, उन हंसों में से एक युवा हंस ने पंख फड़फड़ाये। कव्वें की बीट उसपर पड़ी तो उसने उप्पर देखा।

हंस के देखने पर कव्वा बोला “आप कौन है? कहाँ से आयें है ? क्या यह पेड़ आपके बाप का है” ।

हंसों ने जब उसकी बात का कई उत्तर नहीं दिया तो कव्वा नीचें की डाली में बैठकर, ताव में आकर बोला “कुछ बोलते क्यों नहीं, तुम्हारें मुहँ में जबान नहीं है क्या”।         

उनके जवाब ना देने पर कव्वा डाली के नीचें उनके बिल्कुल पास आ गया और जोर-जोर से कावं-कावं करने लगा ।        

अंत में उसकी आवाज से तंग आकर एक युवा हंस ने उत्तर दिया और बोला “हम राजहंस है, और थकान महसूस कर रहे हैं, थोड़ी देर के बाद आराम करके चलें जायेंगें”।  

“उड़ना भी जानते हो कि बस ऐसे ही पंख लिए बैठें हो”। कौआ अपनी मस्ती में, हंस के चारों ओर उड़ने लगा।

युवा हंस एक नजर से कौए को देखते ही रहा। पर कौए से रहा नहीं गया।   

“ऐसे क्या देख रहे हो, उड़ना जानतें हो तो आ जाओ। मैं कई तरह की उड़ान जानता हूँ। देखों यह पहली, यह दूसरी, यह तीसरी।

इस तरह कौए ने कई उड़ानों का प्रदशन किया – एक आँख बंद करके एक उड़ान, दूसरी आँख बंद करके दूसरी, चोंच उप्पर करके तीसरी, चोंच नीची करके चोथी और वो भी बरगद के पेड़ के आस –पास। फिर निचे हंसों के पास धम –धम करता हुआ आया और बोला “कुछ जानतें भी हो या ऐसे ही बैठे हो”।    

इतना प्रदर्शन करने के बावजूद भी हंस कहाँ कुछ कहने वालें थें, वो तो शांत बैठें थे उनके शांत बैठने पर कौवे का साहस और बड़ गया और वो हंसों की ओर देखते हुए बोला “है किसी में मेरे साथ उड़ने की शक्ति। देखने में तो बड़ें सुन्दर लगते हो! शर्म आनी चाहिए तुम्हें, तुम बैठकर अराम कर रहे हों”।             

युवा हंस ये सब सुनकर गुस्से में लाल हो गया और बोला “पिताजी मुझे जाने दो, मैं अभी इसे मजा चखाता हूँ”।  

“बेटा लगता है कि इस कौए के पूर्वजों ने कभी हंस नहीं देखें होंगें, तभी तो ये ऐसी बात कर रहा है। हम कैलाश मानसरोवर के राजहंस माने जातें हैं। क्या कभी कौए और राजहंस के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है”? हम यदि उसके साथ स्पर्धा पर उतरेंगें तो उसे झूठी प्रतिष्ठा मिल जायेगी करने दो उसे बक –बक। हम यहाँ से चलें जायेंगें”।

युवा हंस को समझाने के बावजूद, उसपर इन बातों का प्रभाव नहीं पड़ा, वो तो किसी भी तरह उस अहंकारी कौए को सबक सिखाना चाहता था उसने पिताजी को बोला “एक बार मुझें इस अहंकारी कौए को सबक सिखाने का मौका दीजिये”।

“नहीं-नहीं”।

युवा हंस नहीं माना और उसने कौए से कहा “भाई! मैं इतनी सारी उड़ाने तो नहीं जानता, लेकिन एक उड़ान जानता हूँ”

बस एक ही, हा-हा-हा, बस एक ही जानतें हों।

हंस ने कहा “एक उड़ान पर प्रतिस्प्रधा करना चाहते हो तो आ जाओं”

कौआ पूरी तरह घमंड में आ गया और बोला “अभी तुमने मेरी इक्यावन उड़ानों को देखा होगा। कभी एक और इक्यावन में अंतर जानतें हों क्या? चलों एक ही सही”।

Hindi Kahani Hans Kauwa

दोनों की उड़ानों की शुरुआत हुई। कौआ आगे-पीछे, उप्पर-नीचें उड़ता हुआ, आगे-आगे और युवा हंस धीरे-धीरे उड़ता हुआ पीछे उड़ रहा था। कौआ रोज बरगद के आस-पास ही उड़ता था, लेकिन आज वों हंस के साथ गंगा नदी को पार करते हुए आगे निकला, कौआ बहुत खुश था।

कौआ उड़ता हुआ हंस से आगे रहने के लिए जोर लगाकर उड़ रहा था, जबकि हंस शांत होकर उड़ रहा था। कुछ दूर उड़ने के बाद कौआ लोटकर आया और बोला “तुम क्यों इतना पीछे रह जातें हो? थक गए हो क्या? बता देना शर्माना नहीं। पानी के उप्पर उड़ने की क्या बात, हम तो बहुत ऊची–उची उड़ान भरने के आदि है। तुम हमारा क्या मुकाबला करोगे ?

हंस ने कहा “कोई बात नहीं उड़ते रहिये”।

आगे कौआ और पीछे हंस।

थोड़ी देर बाद कौए ने कहा “चलो अब तुम थक गए होंगें, वापस चलते हैं”।

हंस ने शांति भाव से कहा “नहीं नहीं, मैं बिल्कुल नहीं थका, उड़ते रहो। मेरे बारें में मत सोचों”।

दोनों उड़ते रहे, आगे-आगे कौआ और पीछे-पीछे हंस, कौआ थक गया और कोई ना कोई बहाना बनाने लगा, लेकिन युवा हंस एक ही बात कहने लगा “उड़ते रहो”।

अब उड़ते हुए कौआ थक चुका था और उसके पंख भी निचे नदी के पानी को छू रहे थें।

हंस पीछे से आया और कौए को बोला “कौए जी यह किस तरह की उड़ान हैं, यह तो तूमने मुझे दिखाई ही नहीं” यह लगता है अलग तरह की उड़ान है” ।   

थोड़ी देर के बाद उड़तें हुए, कौए का सिर कभी पानी के अन्दर कभी बाहर होने लगा।

हंस ने कहा “यह कौन-सी प्रकार की उड़ान है, मुझे भी तो पता चलें” ।  

कौए ने कहा “भाई यह मेरी किसी भी तरह की उड़ान नहीं, बल्कि यह मेरे जीवन की अंतिम उड़ान है”।

राजहंस को दया आ गई और उसने तुरंत कौए को अपनी पीठ में बिठा लिया।

हंस ने कहा “भैय्या! अब देखना मेरी उड़ान, ठीक से बैठना”।

HINDI STORY Hans Aur Kauwa
RAJHANSH BY HAMAARI JEET

हंस उड़ा, ऐसा उड़ा की पूछों ही मत। हिमालय की चोटी के उप्पर से मानसरोवर तक का रास्ता पार करने वाला राजहंस गंगा के तट को छोड़कर सामने किनारे गया। दूर-दूर तक चक्कर काटता हुआ और कौए को विशाल आकाश का दर्शन कराता हुआ, बरगद के पेड़ के नीचें आया और कौए को अपनी पीठ से नीचें उतारा।

यह कहावत है कि धूर्त धूर्त ही रहता है और कौआ भी उनमे से एक ठहरा!

हंस ने जैसे ही उसे निचे उतारा, कौआ उप्पर डाली में बैठा और उसने एक बार फिर से हंसों पर बीट कर दी ।

राजहंस उड़कर चले गये।

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इस कहानी ने हमें कुछ बातों को लेकर सचेत किया है कि यदि हम किसी धूर्त इंसान की कितनी ही मदद क्यों ना कर लें, वो फिर भी तुम्हें निचा दिखाने से बाज नहीं आएगा और कभी ना कभी तुम्हारे द्वारा की गई सहायता पर पानी फेर ही देगा।  

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