KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

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KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी
KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

प्रिय पाठकों, मैं आज निडर, निर्भिक देश के लिए कुछ करने का जज्बा रखने वालें महान से महान क्रांतिकारियों के विषय में कुछ जानकारियाँ शेयर करने का प्रयास कर रहा हूँ। इसके लिए मैं अपने आपकों बहुत धन्य मानता हूँ और आप से भी आशा करता हूँ कि आप इस लेख, लेख नहीं आजादी के मतवालों के अपने भारत देश के लिए किये गये अतुल्य योगदान को पढ़े और आगे भी शेयर करें। KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी        


अंग्रेज़ों के विरुद्ध अनगिनत बार हमारे क्रांतिकारियों ने कार्य किया और उसमें से एक षड्यंत्र प्रमुख था जिसे काकोरी काण्ड या काकोरी षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है। 

काकोरी काण्ड में दस क्रांतिकारी शामिल थें, जिनमें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री रोशन सिंह, श्री राजेंद्र लाहिड़ी और श्री अश्फाकउल्ला खान को फाँसी दी गई और शचिंद्रनाथ बक्शी, मुकुन्दीलाल, केशव, मन्मनाथ गुप्त को काले पानी की सजा दी गई। विडंबना देखिये इनमें से बनवारी लाल अंगेजों का मुखबिर हो  गया। चंद्रशेखर आजाद जी जैसे कि नाम से ही पता चलता है वो अंग्रेजों दवारा इस काण्ड में पकड़ें नहीं गये और अपना कार्य उत्तर भारत में करते रहें। 

चंद्रशेखर आजाद जी के बारें में जानने के लिए लिंक पर क्लीक करें          

दल का निर्माण और उद्देश्य

पुरे उत्तर भारत में क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ों के अत्याचार से मुक्ति के लियें दल का निर्माण किया और इस दल को आगे बड़ाने के लिए धन की आवश्यक्ता थी ताकि दल को धन की कमी ना हो और वों अंग्रेज़ों के विरुद्ध अपने देश की आजादी के लिए कार्य करते रहें और तो और उन्होंने कई दिन व रातें भूखें रहकर व चने खाकर और पानी पीकर इस उम्मीद में बिता दी कि एक ना एक दिन आजादी का सवेरा अवश्य उदय होगा।

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी


काकोरी षड्यंत्र में भाग लेने पर क्रांतिकारियों ने ख़ुशी-ख़ुशी फाँसी को गले लगा लिया   

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी के बारें में

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल

अंग्रेज साम्राज्य को दहलाने वालें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी का जन्म शाहजहांपुर के खिरनी बाग़ में हुआ था। उनके पूर्वज ग्वालियर से शाहजहांपुर आयें थें, इन्होने बचपन से ही आर्यसमाजी शिक्षा पाई थी लेकिन वो कट्टर नहीं थें। पंडित जी की माता जी ने हमेशा बिस्मिल जी का साथ दिया। बिस्मिल जी की माता जी ने ही तो उन्हें ऐसा गड़ा था कि वो देश की लिए कुर्बान हो गये। माता जी के द्वारा दिये गये 125 रुपयें से हो उन्होंने एक रिवाल्वर ख़रीदा था, जिससे वो अभ्यास करते थें।

जेल में रहकर उन्होंने अपनी माता जी के लिए लिखा

“यदि मुझे ऐसी माता न मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्य की भाति संसार- चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षा आदि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी माता जी ने मेरी सहायता की”।

“जन्मदात्री जननी ! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण परिशोध (पूरा) करने के प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला”। इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करू तो तुम से उऋण यानि कर्जमुक्त नहीं हो सकता”। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में सलग्न हो सका”। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे प्रोत्साहन ने ही सहायता दी”। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई तो बड़े स्नेह से हर बात को समझा दिया।

मुझे विश्वास है कि तुम यह समझकर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता – ‘भारत माता’ की सेवा में अपने जीवन को बलिदेवी पर भेंट कर गया”।

जन्मदात्री ! वर दो कि अंतिम समय में भी मेरा ह्रदय किसी तरह विचलित न हो और तुम्हारे चरण-कमलों को प्रणाम कर, मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूँ।

ऐसी वन्दनीय जननी की तो पूजा होनी चाहिए थी, किन्तु आजादी के बाद वे उपेक्षा के गर्त में पड़ी रही। यह सुनकर ह्रदय में आग की ज्वाला निकलती है और रोना आता है। 

आगे…….

बचपन से ही रामप्रसाद बिस्मिल जी बहुत शरारती थें

बचपन में गाय के थन में मुहं लगाकर दूध पिया करते थें और एक बार जब उन्हें उ लिखना नहीं आया तो पिताजी ने उन्हें बन्दुंक के लोहे की गज से इतना मारा कि लोहे की राड टेड़ी हो गई और तो और बाग़ में अमरुद तोड़ने पर जब उनके पिताजी को शिकायत मिली तो दुबारा इतना मारा कि दो दिन तक उठ न सकें।

मैनपुरी षड्यंत्र में अंग्रेज़ों के खिलाफ इनका बहुत बड़ा हाथ था जिसके डर के कारण लोग इनसे दूर रहते थें।

पंडित जी को पुस्तकें लिखने का भी बहुत शौक था और उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी।

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी द्वारा लिखा गया देश भक्ति गीत जो नोजवानों के तन-मन में सफुर्ती की लहर पैदा कर देता है 

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाजुए-कातिल में है 

रहबरे-राहे-मुहब्बत रह न जाना राह में

लज्जते-सहरा-नवर्दी दूरिये-मंजिल में है 

आज मक्तल में ये कातिल कह रहा है बार-बार

अब भला शौके-शहादत भी किसी के दिल में है 

वक्त आने पे बता देंगें तुझें ऐ आसमाँ !

हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है


श्री राजेंद्र लाहिड़ी जी के बारें में

श्री राजेंद्र लाहिड़ी
श्री राजेंद्र लाहिड़ी

श्री राजेंद्र लाहिड़ी जी का जन्म बंगाल के पठाना जनपद के मोहनपुर ग्राम में हुआ और बाद में आठ या नो वर्ष की आयु में बंगाल से वाराणसी आ गये। राजेंद्र लाहिड़ी जी एम ए के छात्र थें, किन्तु गुप्त रूप से क्रन्तिकरियों के दल में शामिल थें। बड़ी कुशाग्र बूद्धि वालें थें और लेख लिखने का भी काम करते थें। स्वभाव के बहुत सरल थें।

लाहिड़ी जी को दो दिन पहले ही गुप्त रूप से फाँसी पर चड़ा दिया गया, क्योंकि अंग्रेज डरते थें कि कहीं इसका साथी ‘आजाद’ इसे जेल से निकलवा ना लें जाये।

इस गुलामी में तो हमकों न ख़ुशी आई नजर

खुश रहों अहले-वतन हम तो सफ़र करते हैं ।


श्री रोशनसिंह जी के बारें में

ठाकुर रोशनसिंह
ठाकुर रोशनसिंह

ठाकुर रोशनसिंह शाहजहांपुर जिले के नवादा नामक ग्राम के रहने वाले थें। बचपन से ही वों दोड़ने –भागने वालें काम में नंबर एक थें। काकोरी षड्यंत्र में जितने व्यक्ति गिरफ्तार हुए उनमें से ठाकुर रोशन सिंह सबसे बलवान थें। असहयोग आन्दोलन में इन्होने गाँव-गाँव जाकर प्रचार किया और बरेली में गोली चलने पर इन्हें दो वर्ष जेल की सजा हुई।

रोशनसिंह जी फाँसी के फंदें तक पहुचने तक हमेशा निर्भिक रहें, उन्हें लाठी, तलवार व बन्दुक चलाने में महारत हासिल थी। ठाकुर रोशनसिंह अपनी आन-बान और शान के लिए मशहूर थें।  

इन्हें उर्दू और हिंदी का ज्ञान अच्छी तरह था।

जब रोशनसिंह जी जेल में कैद थे और फाँसी की सजा सुनने लखनऊ की अदालत में जा रहे थें तो यें गीत गा रहे थें  

मेरा रंग दें बसंती चोला ।

मेरा रंग दें बसंती चोला ।

इसी रंग में रंग के शिवा ने माँ का बंधन खोला ।

यही रंग हल्दी घाटी में था खुलकर खेला ।

नव बसंत भारत के हित वीरों का यह मेला ।

मेरा रंग दें बसंती चोला ।


श्री अश्फाकउल्ला खान जी के बारें में

श्री अशफाक उल्लाह खान
श्री अशफाक उल्लाह खान

शाहजहांपुर के मोहल्लें कदनशाह में देश के वीर क्रांतिकारी अश्फाकउल्ला खान जी का जन्म हुआ। अश्फाक जी पंडित जी के दल में शामिल हुए थें और कई क्रांतिकारी घटनाओं में शामिल ही नहीं हुए, बल्कि दल के कार्य को भी पूरा किया। उनके दोस्त पंडित जी थें। दोनों में दांत-काटे की रोटी थी। आपस में बड़ी मुहब्बत थी, याराना था और पंडित जी उन्हें दोस्त के साथ-साथ छोटा भाई भी मानते थें और एक बात दोनों शायर भी थें। श्री अश्फाकउल्ला जी द्वारा लिखा गया    

वह रंग अब कहां है नसरिनों नसतरन में

उजड़ा पड़ा हुआ है क्या ख़ाक है वतन में,

कुछ आरजू नहीं है, आरजू तो यह है,

रख दें कोई जरा सी खाकें-वतन कफ़न में,

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी


क्रांतिकारी दल के नियम

इनके दल के नियम भी बहुत सख्त थें, यदि कोई सदस्य किसी प्रकार से दल को धोखा दें तो उसकों दल से  निकाल देने या उसे गोली से मार देने का भी हक़ था। बनारस केंद्र का संगठन सबसे मजबूत था, किन्तु मजे की बात यह है कि शाहजहांपुर का केंद्र संगठन की दृष्टी से कमजोर होने के बावजूद वहां तीन व्यक्तियों को फाँसी हुई।   

काकोरी षड़यंत्र यानि काकोरी ट्रेन में अंग्रेज़ों का धन लूटना  

जहाज में गुप्त रूप से कुछ अस्त्र-शस्त्र आये हुए थें और उनकों खरीदने के लिए कई हजारों रूपये की जरूरत थी, लोगों ने जहाँ तक बन सका चंदा इकट्ठा किया, लेकिन इसके बावजूद काफी धन की अभी भी आवश्यकता थी और सभी दल के सदस्यों ने मिलकर निर्णय लिया कि ट्रेन में डकैती डालकर अंग्रेजों के खजाने को लुटा जायें।

क्रांतिकारी METTING
क्रांतिकारी METTING

पहले यह निर्णय लिया गया कि जब गाड़ी किसी स्टेशन में रुके तो ट्रेन में से पैसे वालें थैलें लूट लिए जाये लेकिन बाद में दुबारा विचार करने के बाद निर्णय लिया गया कि चलती हुई ट्रेन में गाड़ी को जंजीर खिंच कर रोक लिया जाये।                    

इस काम के लिए दस व्यक्ति शामिल हुए जिनमें श्री राजेंद्र लाहिड़ी, श्री रामप्रसाद बिस्मिल, श्री रोशनसिंह व श्री अश्फाकउल्ला, शचिंद्रनाथ बक्शी, मुकुन्दीलाल, केशव, मन्मनाथ गुप्त, बनवारी लाल और आजाद विचारों वालें चंद्रशेखर आजाद शामिल थें ।

सभी क्रांतिकारी शाहजहांपुर से हथियार, छेनी, घन आदि लेकर ट्रेन में चड़े। इस गाड़ी में खजाने के साथ अंग्रेज सिपाहियों का पहरा भी था और अंग्रेज मेजर भी इसमें सफ़र कर रहा था।

तीन व्यक्ति सेकंड क्लास के डब्बे में शामिल हुए इसमें श्री अश्फाकउल्ला, राजेंद्र लाहिड़ी और शचिंद्रनाथ बक्शी थें और इसका नेतृत्व अशफाक कर रहें थें और बाकि चार तीसरे दर्जे के डिब्बें में सवार थें और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल इसका नेतृत्व कर रहें थें और इनके पास चार नए माऊजर पिस्तौल थी। इसके अलावा छोटे-मोटे हथियार भी थें।

ट्रेन जब काकोरी के पास पहुचीं तो जंजीर खीच ली गई और जंजीर खीचने के बाद ट्रेन बीच में ही रुक गई। सभी मुसाफिर बाहर की ओर झाकने लगें।

जो गार्ड पेटी की रक्षा कर रहा था उसपर बन्दुक तान कर निचे  लिटा दिया और उस पेटी को खोलने की कोशिश की जिसमें थैली थी। लेकिन वो पेटी टूटने का नाम ही नहीं ले रही थी। बार-बार कोशिश करने के बाद जब संदूक यानि पेटी नहीं टूटी, तो अशफाक से यह देखा नहीं गया और उन्होंने अपनी पिस्तौल किसी और को देकर, अपने मजबूत शरीर से घन की सहायता से उसके तोड़ा।

रुपए लेकर 10 मिनट के अन्दर वो ट्रेन से निकलकर झाड़ियों से होते हुए निकल गये।


काकोरी की गिरफ़्तारी

ब्रिटिश सरकार घबरा गई कि उनके खजाने को लूट लिया गया और तो और अंग्रेज़ों ने क्रांतिकारियों के विरुद्ध समाचार चारों और फैला दिया कि इस डकेती में कई लोग मारे गये, जबकि ऐसा नहीं था केवल एक व्यक्ति ही मारा गया था वो भी अंग्रेज सिपाहियों की गोली द्वारा। 

काकोरी काण्ड में 10 लोग शामिल थें लेकिन गिरफ्तारी 40 लोगों की हुई। कुछ ऐसे क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया जो अभी–अभी किसी ना किसी कारण देश की आजादी के लिए जेल से छुट कर आयें थें। विडंबना देखियें दस क्रान्तिकारियों में से बनारसीलाल अंग्रेज़ों का मुखबिर बन गया और उसने सारे षड़यंत्र के बारे में अंग्रेज़ों को बता दिया। सभी एक-एक कर पकड़े गये सिवाय ‘आजाद’ जी के।              

अभियुक्तों की ओर से पंडित गोविंदबल्लभ पन्त, बहादुर जी, चंद्रभान गुप्त, मोहन लाल सक्सेना कई विख्यात वकील थें। 18 महीने मुकदमा चलने के बाद श्री राजेंद्र लाहिड़ी, श्री रामप्रसाद बिस्मिल, श्री रोशनसिंह व श्री अश्फाकउल्ला को फाँसी दी गई।

सचिंद्रनाथ बक्शी, मुकुन्दीलाल, केशव को 10 वर्ष की सजा हुई जिसे बाद में बड़ा कर काला पानी के सजा में बदल दिया और मन्मनाथ गुप्त को 14 वर्ष की सजा हुई क्योंकि वह दल में सबसे कम उम्र के थें। बनारसीलाल अंग्रेज़ों का मुखबिर के कारण फिर भी उसे 5 वर्ष की सजा दी गई।


फाँसी के तख्तें पर 

जनता की ओर से फाँसी की सजा रोकने के लिए बहुत विशाल आन्दोलन खड़ा किया गया और दो बार फाँसी की सजा रोकी गई, लेकिन इसके बावजूद ब्रिटिश साम्राज्यवाद जो इन लोगों के खून की प्यासी थी, वह भला कैसे अपनी प्यास को बिना बुझायें रह सकती थी और अंत में फांसियां होकर ही रही। 

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राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी

काकोरी के शहीदों में राजेंद्र लाहिड़ी को सबसे पहले फाँसी हुई यानि औरों से दो दिन पहले ही 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में।  

जब लाहिड़ी जी ने फाँसी में जाने से पहले स्नान किया, गीता पढ़ी और व्यायाम किया तो अंग्रेज ने कहा “आपने आगे वाली घटना के लिए अपने आप को तैयार करने के लिए स्नान करके अपने धर्मग्रंध का पाठ किया, वह तो ठीक है किन्तु व्यायाम क्यों किया?

अकड़ के साथ राजेंद्र ने कहा “मैं हिन्दू हूँ। मेरा अटल विश्वास है कि मैं दूसरा जन्म प्राप्त करूँगा। व्यायाम इसलिए किया कि दुसरे जन्म में भी बलिष्ठ बनूँ और देश को स्वतन्त्र कराऊँ”।     

14 दिसंबर को उन्होंने एक पत्र लिखा

था, वह पत्र इस प्रकार था।

“कल मैंने सुना कि प्रिवी कौंसिल ने मेरी अपील अस्वीकार कर दी। आप लोगों ने हम लोगों की प्राण रक्षा के लिए बहुत कुछ किया, किन्तु मालूम होता है कि देश की बलिदेवी को हमारे रक्त की आवश्यक्ता है। मृत्यु क्या है? जीवन की दूसरी दशा के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं। इसलिए मनुष्य मृत्यु को भय क्यों मानें? वह तो नितांत स्वाभाविक अवस्था है, उतनी ही स्वाभाविक जितना प्रातः कालीन सूर्य का उदय होना। यदि यह सच है कि इतिहास पल्टा खाता है तो मैं समझता हूँ कि हमार्री मृत्यु व्यर्थ न जायेगी। सबको मेरा नमस्कार—अंतिम नमस्कार !

आपका

राजेन्द्र


पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर को फाँसी हुई। फाँसी के पहले वाली शाम को जब उन्हें दूध पिने को दिया गया, तो उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया “अब तो माता का दूध पिऊंगा। प्रातः काल संध्यावंदन आदि पूरी होने के बाद माता को एक पत्र लिखा, जिसमें देशवासियों के नाम सन्देश भेजा और फिर फाँसी की प्रतिक्षा में बैठ गये। जब उन्हें फाँसी के तख्तें पर ले जाने के लिए आयें तो उन्होंने वन्देमातरम और भारत माता की जय कहते हुए, तुरंत उठकर चल दिये और चलते समय उन्होंने यह कहा

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे,

बाकि न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।

जब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे,

तेरा हो जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे ।।

फाँसी के दरवाजे में पहुंचकर उन्होंने कहा “I wish the downfall of British Empire” (मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूँ) इसके बाद तख्ते पर खड़े होकर प्राथना के बाद विश्वानि देव सवितुदुर्रितानी……आदि मन्त्रों का जाप करते हुए गोरखपुर की जेल में वह फंदें में झूल गये।  


अशफाक को फाँसी

अशफाकउल्ला को फैजाबाद जिले में 19 दिसंबर को फाँसी हुई वह बहुत ख़ुशी के साथ कुरान-शरीफ का बस्ता कंधें में टांगें हाजियों की तरह कुरान पढ़ते फाँसी के तख्तें के पास गये और तख्ते को उन्होंने चुम्बन दिया और जनता को कहा “मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं रंगें, मेरे उप्पर जो इल्जाम लगाया जा रहा है, वो गलत है खुदा के यहाँ मेरा इन्साफ होगा” ।

इसके बाद उनके गले में फाँसी का फंदा पड़ा और खुदा का नाम लेते हुए वो इस दुनिया से कूच कर गये। जब फाँसी के बाद उनके शव को 10 घंटें के बाद स्टेशन पर लाया गया तो केवल आँखों के निचे कुछ पीलापन था। बाक़ी चेहरा तो ऐसा सजीव था कि मालूम होता था कि अभी-अभी नींद आई है, यह नींद अनंत थी। उन्होंने मरने से पहले ये शेर बनायें थें ।

तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से।

चल दिये सुए अदम जिन्दाने फ़ैजाबाद से ।।


ठाकुर रोशनसिंह को फाँसी

किसी को उनके फाँसी की उम्मीद नहीं थी और जब उन्हें फाँसी दी गई तो वो बिल्कुल भी नहीं घबराएं और उन्होंने धैर्य, साहस और शौर्य का प्रदर्शन किया, उसे देखकर सभी दंग रह गये। फाँसी के लगभग 6 दिन पहले उन्होंने अपने मित्र को पत्र लिखा जो इस प्रकार है।

“इस सफ्ताह के भीतर ही फाँसी होगी ईश्वर से कामना हैं कि वो आपको मोहब्बत का बदला दें। आप मेरे लिए हरगिज रंज न करें। मेरी मौत खुसी का बाईस होगा। दुनिया में पैदा होकर मरना ज़रूर है। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके, मैं अब आराम को जिंदगी के लिए जा रहा हूँ।  हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है तो उनकी वही गति होती है जो जंगल में रह कर तपस्या करने वालों की। 

जिंदगी जिन्दा दिली को जान ऐ रोशन

वरना कितने मरे और पैदा होते जाते हैं ।

शहीद ठाकुर रोशन सिंह
शहीद ठाकुर रोशन सिंह

आखिरी नमस्ते

आपका रोशन 


तो इस प्रकार हमारे देश के महान क्रांतिकारियों ने अनंत पीड़ा सहकर, हमारे लिए एक आजाद मुक्त भारत की नीव रखी और अफ़सोस यह है कि हमारे में से अधिकांश लोग जानते भी नहीं है की ऐसे क्रांतिकारी ब्रिटिश राज से ही नहीं लड़े बल्कि देश में रहने वाले आंतरिक विभिष्नों से भी लड़े जिनमे कुछ लालची राजनेता, कुछ जयचंद जैसे मुखबिर भी शामिल थें।

आपसे विनर्म निवेदन हैं यदि आप देश के सच्चे सपूत का नाम रोशन करना चाहते हैं तो इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ।

प्रकाश चंद जोशी की ओर से हमारे देश के वीर, साहसी, निडर, निर्भिक क्रांतिकारियों को कोटि-कोटि नमन

KAKORI KE SHAHID KRANTIKAARI काकोरी के शहीद क्रांतिकारी

भारत माता की जय

जय हिन्द

जय भारत

वन्दे मातरम

इन्कलाब जिंदाबाद         

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