LAL BAHADUR SHASTRI JI भारत के सच्चे सपूत, लाल बहादुर शास्त्री जी

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LAL BAHADUR SHASTRI JI लाल बहादुर शास्त्री जी
LAL BAHADUR SHASTRI JI लाल बहादुर शास्त्री जी

LAL BAHADUR SHASTRI JI भारत के सच्चे सपूत, लाल बहादुर शास्त्री जी

प्रिय पाठको, आज मैं आपको एक ऐसे व्यक्तित्व का परिचय कराउंगा जिन्होंने हमारे भारत की रक्षा के लिए कभी-भी अपने सिदांतों से समझौता नहीं किया और अपना पूर्ण जीवन बिना स्वार्थ के, पूरी ईमानदारी से देश की सेवा में अर्पण कर दिया। LAL BAHADUR SHASTRI JI भारत के सच्चे सपूत, लाल बहादुर शास्त्री जी

वो महान व्यक्ति थे, हमारे देश के दुसरे प्रधानमंत्री, स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी, जिनका जन्म 2 अक्टूबर, 1904 में मुग़ल सराय, उत्तरप्रदेश में हुआ था। इनके पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव था जो बाद में उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में क्लर्क हो गये थें। शास्त्री जी का बचपन बहुत कष्टों और संघर्ष में बीता। 

मात्र डेढ़ वर्ष की आयु में पिताजी का देहांत होना

लाल बहादुर जब केवल डेढ़ वर्ष के थें तो अचानक इनके पिता का देहांत हो गया और इनकी माता श्रीमती रामदुलारी अपने पिता के यहाँ रहने लगी। छटी कक्षा तक की पढ़ाई लाल बहादुर जी की ननिहाल में ही हुई।

इसी संयुक्त परिवार में रहकर शास्त्री जी ने प्रेम, दया, सरलता, स्नेह, ईमानदारी और कठोरता को साकार रूप में देखा और पहचाना भी। उन्होंने स्वयं भी कहा था कि “यदि पिताजी जीवित भी होते तो मुझे इतना प्यार नहीं मिल पाता जैसा मुझे ननिहाल (नानी के यहाँ) में मिला हैं।“       

मौसा जी के जीवन का शास्त्री जी के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ना  

छटी कक्षा के बाद पढ़ाई का गाँव में प्रबंध ना होने पर, उन्हें उनके मौसा जी के पास बनारस भेज दिया गया और वहां उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई की। उनके मौसा, श्री रघुनाथ प्रसाद नगर-निगम में हेड क्लर्क थें।

मौसा जी का वेतन भी कम था, लेकिन उनके मौसा कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार व्यक्ति थें। वें ‘उप्पर की आमदनी के खिलाफ थें’ और उनके तप, त्याग, ईमानदारी और परिश्रम का प्रभाव बालक, लाल बहादुर जी पर पड़ा।

लाल बहादुर जी एक मेधावी छात्र थें और इतिहास और अंग्रेजी में हमेशा आगे रहते थें, उन दिनों बनारस भारतीय संस्कृति और शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था और राजनेतिक क्षेत्र में भी उथल-पुथल मची हुई थी,  उससे लाल बहादुर भी दूर न रह सकें।

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बाल गंगाधर तिलक जी का बनारस में भाषण सुनना

बाल गंगाधर तिलक बनारस आये हुए थें और उनकी दूरी लाल बहादुर जी के विद्यालय से कम से कम 50 मील दूर थी, लेकिन इसके बावजूद लाल बहादुर जी ने पैसे उधार लिए और तिलक जी का भाषण सुनने  बनारस पहुचें।

भाषण सुनने के बाद उनके कान में हमेशा तिलक जी के शब्द गूंजते रहते “स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।”          

सन 1919 में लाल बहादुर जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में गाँधी जी के दर्शन किये जिसमें गाँधी जी सभी राजाओं के कह रहे थें “राजाओं और नवाबों अपने सभी रत्न और अलंकरण बेच दो ताकि देश के गरीब लोगों की सेवा हो सकें।“ यह सुनकर लाल बहादुर जी को अपने जीवन में आगे कुछ करने का लक्ष्य दिखाई देने लगा।

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भारत की आजादी के लिए सेवा करने का निश्चय करना

ऐसे समय में लाल बहादुर जी के सामने दो रास्ते थें। एक ओर घर की आर्थिक दशा की स्थिति कि वह मन लगाकर पढ़े और सरकारी नौकरी पाकर अपने परिवार का पालन-पोषन करें और दुसरी ओर था गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माँ की आजादी।

उन्होंने सोचा कि नौकरी करके जब परिवार की सेवा ही करनी है तो क्यों ना भारत के चालीस करोड़ परिवार की सेवा क्यों ना की जाये।

लाल बहादुर जी ने कुछ समय तक सोचने के बाद, अंत में निर्णय लिया कि अब तो उन्हें अपने देश की सेवा करनी है, चाहे कितनी भी कठिनाईयाँ क्यों ना आयें और नागपुर में ‘सविनय अवज्ञा’ का प्रस्ताव पास हो गया और शास्त्री जी उसमें जा मिलें।

उनके अध्यापक ने भी उन्हें समझाया कि तुम होनहार छात्र हो, तुम हाई स्कूल में प्रथम आ सकतें हो और तुम्हें छात्रवृत्ति भी मिल जायेगी। आगे पढ़ना और खूब नाम कमाना,

परन्तु उन्होंने सोच-विचार के साफ़ कह दिया कि “मैं अपने देश के अलावा किसी से भी प्यार नहीं करता। मैं जहाँ पहुँच गया हूँ, वहां से पीछे हटना मुश्किल है”     


शास्त्री जी अपना काम स्वयं करते थें

शास्त्री जी अपना काम स्वयम करते थें और कभी-कभी तो अपना जूता भी खुद ठीक कर लेते थें। अपने कपड़े खुद सिलते और धोते भी थें।              

शास्त्री जी ने ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में भाग लिया और एक बार पकड़े भी गये लेकिन दुबले-पतले होने के कारण उन्हें छोड़ किया गया।

ऐसे समय में सुप्रसिद्ध दार्शनिक डॉक्टर भगवान दास का मार्गदर्शन मिला, उन्होंने कहा कि “तुम काशी विधापीठ में रहो और अपना अध्यापन भी आगे जारी रखना। बाद में राजनीति में आना।“

शास्त्री जी की उपाधि मिलना 

काशी विधापीठ देश भक्तों का गढ़ था और डॉक्टर भगवान दास उसके प्रिंसिपल थें। काशी विधापीठ में रहकर शास्त्री जी की तमाम ईच्छाये पूरी हो गई, वहां उन्होंने टालस्टाय, कार्ल-मार्क्स, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, और लेनिन आदि के साहित्य का अध्ययन किया।

काशी विधापीठ में शास्त्री जी के जीवन के चार साल महत्वपूर्ण थें और यहीं पर उन्होंने ‘दर्शन’ विषय में ‘शास्त्री’ की परिक्षा पास की।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लाला लाजपत राय के ‘लोक सेवा मंडल’ में काम करना शुरू कर दिया। उन्हें मुज्जफरपुर में अछूतों के उद्धार का कार्य दिया और लाला लाजपत राय ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें मंडल की आजीवन सदस्यता दे दी।

साइमन कमीशन के विरोध में जूलूस निकाला गया और इस जूलूस में दुर्भाग्यवस लाला लाजपत राय जी घायल हो गये और कुछ समय पश्चात उनकी मृत्यु हो गई। उनके बाद पुरुषोत्तम दास टंडन को अध्यक्ष बनाया गया और शास्त्री जी अपने कार्य में जी जान से लगे रहे।     

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लाल बहादुर शास्त्री जी का विवाह  

उसी समय शास्त्री जी का विवाह ललिता देवी के साथ हुआ। ललिता जी पहले ही जान चुकी थी कि उनके पति का जीवन देश की सेवा के लिए हुआ है और इसमें उन्होंने अपने पति का पूरा साथ दिया और बिल्कुल भी उनपर अपना एकाधिकार नहीं किया।

लाल बहादुर शास्त्री जी 1930 से लेकर 1936 तक जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव थें। कमेटी में कई बड़े सदस्य भी थें जैसे जवाहर लाल नेहरु और पुरुषोतम दस टंडन, कभी-कभी जवाहर लाल नेहरु और पुरुषोतम दस टंडन दोनों के बीच किसी विषय को लेकर मतभेद होंते थें तो शास्त्री जी मतभेद को दूर करने के लिए दोनों के बीच सेतु का काम करते थें। मोतीलाल नेहरु जी भी उन्हें बहुत पसंद करते थें।

सन 1930 से लेकर 1945 की अवधि के बीच उन्होंने 9 साल जेल में काटें। जेल में मिलने वाली अन्य सुविधाएं वो केदियों के बीच बांट देते थें। उन्होंने जेल में रहकर कई महान दार्शनिकों की किताबें पढ़ी।

शास्त्री जी
शास्त्री जी

शास्त्री जी के सिद्धांत के प्रति पक्के होने की एक घटना 

शास्त्री जी अपने सिद्धांत के पक्के थें और गलत बात पर किसी के आगे नहीं झुकते थें। एक बार वो नैनी  जेल में थें और उन्हें सुचना मिली कि उनकी बेटी बीमार है। जेल अधिकारियों ने पेरोल में रिहा करने के लिए एक शर्त रखी कि वह लिखकर दें कि वह जेल से छुटने के बाद किसी आन्दोलन में हिस्सा नहीं लेंगें, लेकिन शास्त्री जी ने यह शर्त स्वीकार नहीं की।

बेटी की तबियत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही थी, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांत से जरा भी समझौता नहीं किया और अपने सिद्धांत पर एक बेटी तो क्या सबकुछ न्योछावर करने के लिए तैयार थें। चट्टान की तरह उनके ईरादें मजबूत थें।

अंत में अधिकारियों को अपने फेसले के आगे झुकना पड़ा और उन्हें बिना शर्त के रिहा किया गया, लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी और शास्त्री जी के घर पहुंचने से पहले उनकी बेटी चल बसी।

शास्त्री जी तुरंत जेल वापस आ गये और कहा कि “जिस कार्य की लिए आया था, जब वही समाप्त हो गया तो मैं जेल से बाहर रहकर अपना कर्त्तव्य क्यों भंग होने दूं?” शास्त्री की की बेटी अपने अंत समय में अपने पिता का मुख नहीं देख पाई और शास्त्री जी ने यह कड़वा घूँट अपने गले से उतार लिया।  है कोई, आज के युग में जो उनका ज़रा भी मुकाबला कर सकें, असंभव।  

जेल जीवन में शास्त्री जी ने बहुत से दुःख सहे। एक बार वह जेल में थें और उनका पुत्र बीमार था। जेल अधिकारी जानते थें कि वह किसी भी शर्त के आगे नहीं झुकेंगें।

उन्होंने उन्हें पेरोल पर रिहा कर दिया, पेरोल की अवधि धीरे-धीरे समाप्त होने लगी, लेकिन उनका बेटा अभी भी बीमारी से ग्रस्त था, बेटे का बुखार 106 डिग्री तक जा पहुंचा और सांस रुक रुककर आ रही थी। शास्त्री जी जेल वापस जाने के लिए तैयार थें।

बेटा कह रहा था “बाबूजी मत जाइये।“ यदि शास्त्री जी लिखकर दे देतें कि अब वह किसी आन्दोलन में भाग नहीं लेंगें तो उनके पेरोल की अवधि बड़ जाती या उन्हें रिहा कर दिया जाता। लेकिन शास्त्री जी अपने ईरादे के पक्के, अडिग व अटल थें, अपना पक्का मन करके, बेटे के सिर पर हाथ रखते हुए जेल वापस लोट गये।

शायद यही कारण देखकर नेहरु जी ने कहा था कि “उच्चतम व्यक्तित्व वाले, निरंतर सजग और कठोर परिश्रमी व्यक्ति का नाम है – लाल बहादुर शास्त्री।

स्वतंत्रता संग्राम में शास्त्री जी का भूमिगत होना

दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैंड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये।

9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की ज्वाला को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया।

प्रत्येक व्यक्ति ने इस आन्दोलन में भाग लिया और कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया, लेकिन शास्त्री जी गिरप्तार नहीं किये जा सके। वह ट्रेन से इलाहबाद जा रहे थें और उन्हें सुचना मिली कि इलाहबाद स्टेशन पर बंदी बना लिया जायेगा और यह सुनकर वह पुलिस से नजर बचाकर नैनी स्टेशन पर ही उतर गये और भूमिगत हो गये।

उस समय कांग्रेस की यह निति थी कि कानून तोड़ों और गिरफ्तार हो जाओं और अंत में उन्होंने ब्रिटिश सरकार को नोटिस भेजा कि “मैं पांच बजे इलाहबाद के चौक पर घंटाघर के पास कानून तोडूंगा।“

अपने दिये गये समय पर चौक पर पहुंचें और ब्रिटिश सरकार को ललकारा कि “ब्रिटिश सरकार को यहाँ रहने का हक़ नहीं हैं, उन्हें तुरंत लोट जाना चाहिए।“

पुरे भारत में इन्कलाब की क्रांति रंग लाई और भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ और पुरे भारत ने इस दिन आजादी का पहला सूरज देखा और आजाद भारत में आजादी की सांस ली।

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आजादी के बाद शास्त्री जी का योगदान   

उत्तर प्रदेश सरकार में पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त जी को मुख्यमंत्री बनाया गया और पन्त जी ने उन्हें यातायात और पुलिस विभाग का कार्य दिया। पुलिस विभाग में गन्दगी को दूर करने के लिए शास्त्री जी ने प्रांतीय रक्षा दल की स्थापना की जिसने बाद में देश में सांप्रदायिकता को रोकने के लिए कई काम किये।

अपने चातुर्य के बल पर शास्त्री जी ने एक विवाद को नियंत्रित किया

शास्त्री जी बहुत ही सरल स्वभाव के थें और अपने चातुर्य के बल पर सभी का दिल जीत लेते थें। सन 1949 की बात है – भारत की क्रिकेट टीम और राष्ट्र मंडल टीम के बीच मेच हुआ।

मैच के दौरान दर्शकों ने इतना हल्ला मचाया कि मैच बीच में ही बंद करना पड़ा। पुलिस ने बल प्रयोग कर मैदान खाली कराया ताकि मैच शूरू कराया जा सकें।

शास्त्री जी भी वहीँ थें। छात्रों को क्रोध आया और उन्होंने मांग की कि “कल क्रिकेट मैदान में एक भी लाल पगड़ी दिखाई देनी नहीं चाहिए”।

शास्त्री जी ने कहा “जैसे आप चाहते हैं, वैसा ही होगा, आप मैच चालू होने दें।“

दुसरे दिन क्रिकेट मैदान में पहले से अधिक पुलिस थी। छात्र दौड़कर शास्त्री जी के पास गये तो उन्होंने हँसते हुए कहा “मैंने अपना वचन निभाया है। आपने कहा था कि एक भी लाल पगड़ी मैदान में ना दिखें, ज़रा नजर दौड़ाइये।“

छात्रों ने जब मैदान की ओर नजर दौड़ाई तो सभी पुलिस वाले लाल पगड़ी की जगह खाकी टोपी में थें। देखते ही देखते मैदान में हंसी के फव्वारे छूट पड़े और सभी शास्त्री जी की बुद्धि और चातुर्य का लोहा मान गये।

उनके सादगी के सभी कायल थें एक उदाहरण के साथ

एक बार वह आगरा गये तो पुलिस अधिकारी उनके स्वागत के लिए स्टेशन पर मोजूद था। जिस डब्बे में शास्त्री जी आये हुए थें, वह डिब्बा प्लेटफार्म से आगे जाकर रुका और शास्त्री जी चुपचाप उतरकर तीसरे दर्जे के डब्बे के पास से गुजरने लगे कि तभी एक सिपाही ने बड़े रोब से उन्हें एक ओर धकेलते हुए कहा “हटो एक तरफ, मालूम नहीं, हमारे पुलिसे मंत्री आयें हैं।“ लेकिन उन्होंने ज़रा भी क्रोध नहीं किया, बाद में जब सिपाही को पता चला तो बहुत पछताया।  

रेल दुर्घटना होने पर अपने रेल मंत्री पद से त्याग पत्र देना

शास्त्री जी के रेल मंत्री रहते हुए आन्ध्र प्रदेश के महबूब नगर में भयानक रेल दुर्घटना हुई। उन्होंने उसका दायित्व स्वयं अपने उप्पर ले लिया और नैतिकता के आधार पर मंत्री पड़ से त्याग पत्र दे दिया 

आज के दौर में यदि कितनी भी बड़ी से बड़ी दुर्घटना क्यों ना हो जाएँ, पद के लालच में मंत्री कुर्सी के ऐसे चिपके रहतें हैं कि जैसे कुर्सी पर उनका एकाधिकार हो, नैतिकता तो दूर, सीधें तौर पर जिम्मेदारी होने पर भी पद से चिपके रहते हैं।

शास्त्री जी ने गृहमंत्री रहते हुए भी बहुत से काम किये। असम राज्य में असमी और बंगाली भाषाओं का विवाद था और उसको लेकर दंगें हो गये थें और इस जटिल समस्या का समाधान शास्त्री जी ने निकाला। पंजाब में भी अकालियों से बात की और उसका समाधान निकाला।


शास्त्री की के पास अपने पुत्र की सिफारिश लेकर जाने पर शास्त्री जी का जवाब

एक बार एक व्यक्ति शास्त्री जी के पास आया और बोला “शास्त्री जी मेरे पुत्र की लम्बाई ज़रा कम है इसलिए उसे दरोगा पद का उम्मीदवार नहीं माना जा रहा।“

शास्त्री जी ने उत्तर दिया “माफ़ कीजिएगा, यदि आपके पुत्र की लम्बाई कम है तो वह दरोगा नहीं बन सकता।“

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया कि “यदि आप इतने दुबले, नाटे कद के होने के बावजूद गृहमंत्री बन सकते हैं, तो मेरा बेटा दरोगा क्यों नहीं बन सकता।”

शास्त्री जी ने कहा “दरोगा तो मैं भी इस अयोग्यता के कारण नहीं बन सकता। हाँ ईश्वर से अवश्य प्रार्थना करूंगा कि आपका पुत्र कड़ी मेहनत व लगन के बल पर गृहमंत्री के पद पर अवश्य पहुंचें।“

पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त जी का सन 1961 में निधन हो गया, तब शास्त्री जी को गृहमंत्री बनाया गया। उन दिनों नेपाल भारत के प्रति दुर्भावना व्यक्त करने लगा, हालांकि वह पहले से ही भारत के साथ मैत्रीपूर्ण था। नेपाल को चीन व पाकिस्तान की तरफ से खींचकर भारत की ओर करने में शास्त्री जी का विशेष हाथ रहा था।

27 मई 1964 को जब नेहरु जी का निधन हो गया तो उसके बाद देश की जनता ने पाँच फीट के कद वाले, मामूली दिखने वाले लाल बहादुर शास्त्री को भारत जैसे महान देश का प्रधान मंत्री चुना।   

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भारत देश का प्रधानमत्री रहते हुए कार्य करना

प्रधानमत्री के तौर पर शास्त्री जी युगोस्लाविया गये और वहां के रास्ट्रपति से मुलाक़ात की। उसके बाद वह काहिरा गये। कहा जाता है कि वहां पर सारा भोज मांसाहारी था और शास्त्री जी जन्म से ही शाकाहारी थें, इसलिए उन्होंने स्वयं अपना भोजन बनाया।

काहिरा में शास्त्री जी ने विश्व शांति के किये पाँच सूत्रीय कार्यक्रम दिया।

कराची में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान से मिलें।

भारत और नेपाल की मित्रता बढ़ाने के लिए नेपाल की सदभावना यात्रा की और दोस्ती बढ़ाने के लिए इसके बाद रूस की भी यात्रा की। कनाडा और लन्दन की यात्रा के बाद दोबारा काहिरा गये।

नेपाल की यात्रा में पाकिस्तान का भारत पर हमला करना

जब शास्त्री जी नेपाल की यात्रा पर थें तो पाकिस्तान सेना ने कच्छ पर हमला कर दिया। शास्त्री जी की सूझ-बुझ से यह हमला रुक गया और दोनों देशों के बीच समझौता हो गया।

दोनों देश इस बात पर राजी हो गये कि एक-दुसरे पर हमला नहीं करेंगें और भारत का जो क्षेत्र पाकिस्तान के अधिकार में आ गया, उसे वापस करना पड़ा।

शास्त्री जी के आह्वान पर सोमवार को एक समय का व्रत रखना

शास्त्री जी ने आह्वान किया कि सोमवार के दिन व्रत रखकर अन्न बचाएं और स्वयं भी व्रत रखा। सबने इसपर अमल किया और होटलों ने भी सोमवार को खाना पकाना बंद कर दिया। अन्न के भण्डार के लिए शास्त्री जी ने बीज और खाद मुहय्या करवाएं और इस प्रकार भारत का अन्न भण्डार भरने लगा।

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समझौते के बावजूद दोबारा पाकिस्तान का भारत पर हमला करना

इसके बावजूद पाकिस्तान बाज नहीं आया और युद्ध स्थाई तौर पर नहीं टल सका। इस बार कश्मीर की वादियों में से पाकिस्तान ने घुसपैठिये उतार दिये और वहां पर हमला कर दिया। सितम्बर में छम्ब क्षेत्र में भी आक्रमण कर दिया।

इस हमले में अमेरिका द्वारा दिये गये पैटन टेंकों के पकिस्तान ने प्रयोग किया। 5 सितम्बर को अमृतसर में आक्रमण किया। अब भारत के सामने केवल एक ही रास्ता था कि पकिस्तान के विरुद्ध नए सैनिक मोर्चें खोलकर उसकी सैनिक शक्ति बाट दी जाये।

भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान की सेना को पकिस्तान की सीमा तक खदेड़ना

SHASTRI JI WITH ARMAY
SHASTRI JI WITH ARMAY

शास्त्री जी ने तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्षों को बुलाकर कहा “सैनिक दृष्टी से जो भी उचित जान पड़े, कीजिये।“

इस आदेश के बाद जो हमारी सेना अभी तक चुपचाप बैठी थी, आदेश पाकर उनका जोश बड़ गया। अब तक उनकों अपनी ओर से हाथ दिखाने का मौक़ा नहीं मिला था और अब तो पूरा आकाश खुला था।

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जय जवान, जय किसान का नारा देना 

शास्त्री जी के काल में जवानों और किसानों दोनों को बराबर का सम्मान दिया गया था। उन्होंने जवानों में जोश भरने के लिए नया नारा दिया “जय जवान, जय किसान”।

भारत पाक युद्ध के दौरान 6 सितम्बर को भारत की 15 वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी।

इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की।

इससे भारतीय सेना लाहोर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

पाक में भारतीय तिरंगा फहराना
पाक में भारतीय तिरंगा फहराना

हमारे जवानों ने जान की पूरी बाजी लगा दी और बहादुर जवानों ने हाजी पीर (पाकिस्तान) में जाकर रास्ट्रीय तिरंगा झंडा फहराकर ही दम लिया और किसानों ने भी अधिक अन्न उगाकर नारे को सार्थक किया।

जब युद्ध में यह लगने लगा कि भारत पाकिस्तान को कब्जे में ले लेगा और पाकिस्तान का नामो निशान मिट जाएगा, तो संधि की कोशिशें की गई।

शास्त्री जी ताशकंद रूस में
शास्त्री जी ताशकंद रूस में

14 सितम्बर को युद्ध बंद कर दिया गया और रूस ने ताशकंद में दोनों देशों के बीच समझोता किया और  लाल बहादुर शास्त्री जी और अयूब खान रूस पहुचें।

इस युद्ध में शास्त्री जी ने सभी पश्चिमी देशों के अहसास करा दिया कि भारत शांति और अहिंसा का पुजारी ही नहीं है, बल्कि समय आने पर अपने दुश्मन को धूल भी चटा सकता है।

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शास्त्री जी का अकस्माक निधन होना

आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकंद न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा।

जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं।

काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

बाद में उनके परिवार के लोगों ने उनकी मौत पर संदेह किया, जो अभी तक संदेह ही बना हुआ है।

शास्त्री जी का निधन
शास्त्री जी का निधन

जिसने सुना, वही स्तब्ध रह गया। ऐसे आकस्मिक निधन की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी ‘विजय घाट’ पर सदा के लिए निद्रा में लीन हो गये। भारत का वह नन्हा सा, पाँच फूट का साधारण-सा दिखने वाला, धोती-कुरता पह्नने वाला प्रधानमंत्री विजय घाट की मिट्टी में समा गया।

उनके निधन पर, सारे राष्ट्र की आँखों में आसूं भरे हुए थें। घर-घर में शौक की लहर थी, कईयों ने तो कई दिनों तक खाना छोड़ दिया था।  

सादगी, त्याग, निस्वार्थता, उदारता, पक्के इरादें, ईमानदारी जैसे गुण शास्त्री जी जैसे नेता में ही देखने को मिलते थें।

नाटे कद के साधारण-से दिखने वाले व्यक्ति थे, लेकिन सभी गुणों से परिपूर्ण थें, मानो जैसे कोई देश का सच्चा सपूत अपने देश की सेवा के लिए आया हो और जिसके एक आह्वान पर देश के बड़े-से-बड़े और छोटे-से-छोटे नवजवान और व्यक्ति मर मिटने के लिए तैयार रहते थें।

उन्होंने सिद्ध कर दिया कि साधारण मनुष्य भी अपनी प्रतिभा और चरित्र की उदारता के बल पर ऊँचाइयों को छू सकता है।

शास्त्री जी को मरणोपरांत सन 1966 में राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन जी द्वारा ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।  

कोई है! आज के युग में ऐसे नेता जिनकी तुलना लाल बहादुर शास्त्री जी से की जाय, असंभव              

मैं जानता हूँ कि यह ब्लॉग आप सबकों अच्छा लगा होगा और आपसे निवेदन है कि आप भी इसे शेयर करें, comment करें और subscribe जरूर करें ताकि आज के नोजवानों को पता चल सकें कि लाल बहादुर शास्त्री जी का भारत देश के प्रति क्या योगदान रहा है

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