ईरादा पक्का हो तो कोई भी काम असंम्भव नहीं (True Motivation Story)

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Irada Pakka Ho To Koi Bhi Kaam Sambhav Hai

आदमी अगर पक्का इरादा कर ले, तो कोई भी काम असंभव नहीं है और लगातार प्रयास से वो एक दिन जीत  अवश्य प्राप्त करता हैं, कहा भी गया है की यदि जीत आसान हो तो उसका आनंद ही कुछ नही .Motivational Stories

और मैं आज आपको ऐसे आदमी की कहानी के बारें में बताउंगा, जो बिल्कुल सत्य घटना पर आधारित हैं और उनका नाम करोली टेकस है I

करोली टेकस का जन्म 21 जनवरी 1910 को हंगरी में हुआ था और पहले ऐसे शूटर थे जिन्होंने लगातार ओलंपिक्स में दो गोल्ड मैडल जीतें थे, वो भी बहुत कठिन परिस्थिती में, वो कठिन स्तिथि क्या थी, इसके लिए आप पूरी कहानी अवश्य पढ़े I

समय के साथ साथ करोली टेकस भी अन्य बच्चों के साथ बड़ा होता गया और बड़ा होने के बाद टेकस ने हंगरी आर्मी ज्वाइन कर ली, क्योंकि उस समय आर्मी में भर्ती का चलन था I टेकस को पिस्तौल चलाने का शौक बचपन से ही था और जब उसे आर्मी की ट्रेनिंग में पिस्तौल मिली तो उसके ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था, उसे ऐसा लगा मानो उसे उसकी सबसे प्यारी चीज़ मिल गई हो, हर समय वो उस पिस्तौल के साथ रहता था और उसे, वो इस तरह संभाल के रखता था कि जैसे पिस्तौल ना हो, उसके दिल का टुकड़ा हो, उसके दोस्त भी उसकी मज़ाक उड़ाते थे और कहतें थे “पिस्तौल को ऐसे रखता हे जैसे उसकी प्रेमिका हो” पर उसे किसी बात की कोई परवाह न थी I

शूटिंग पिस्तौल के साथ प्रैक्टिस व नेशनल में गोल्ड जीतना

मैदान में जब, सब प्रैक्टिस करके वापस अपने कैंप में आतें थें, तो वो घंटों तक प्रैक्टिस करते रहता था, सब उसको पागल कहते थें I एक बार वो मैदान में शूटिंग की प्रैक्टिस की तैयार के लिया गया, तो मैदान में बहुत तेज आंधी आई, लेकिन वो घंटो तक आंधी के जाने का इंतज़ार करता रहा और प्रैक्टिस करके ही वापस अपने कैंप में आया I

 एक दिन भी ऐसा न होता होगा, जब वो प्रैक्टिस ना करता होगा, अपने इसी प्रैक्टिस के दम पर लगातार टेकस ने नेशनल में गोल्ड मैडल कई बार जीतें, अब उसका लक्ष्य था ओलिंपिक में गोल्ड जितने का . Motivational Stories

ओलिंपिक गोल्ड जितने की तेय्यारी

वो नेशनल तक ही नहीं रुका, उसका सपना था नेशनल में गोल्ड नहीं बल्कि सीधे ओलिंपिक में गोल्ड जितने का, इसके लिए वो फिर से लगातार अपनी शूटिंग प्रैक्टिस में लग गया और जैसे जैसे 1936 में समर ओलिंपिक पास आने लगा तो उसका विश्वाश बड़ता गया कि “अब मैं अपनी मंजिल की और हूँ” की तभी अचानक आर्मी हेड क्वार्टर से उसके लिए सन्देश आया कि “तुम ओलिंपिक में भाग नहीं लें सकतें हो” वो थोड़ी देर ऐसे ही खड़ा रहा और फिर बोला “क्यों” जवाब मिला कि “तुम्हारी रैंक सर्जेंट की है, जो कमीशन ऑफिसर  की रैंक से निचे है, और ओलिंपिक में जाने के लिए कम से कम कमीशन ऑफिसर की रैंक होना ज़रूरी है” सुनने के बाद वो फिर से अपनी प्रैक्टिस में लग गया I  

काबिलियत के बावजूद ओलिंपिक में भाग ना ले पाना 

1936 के बर्लिन ओलिंपिक में काबिलियत होने के बावजूद करोली टेकस को ना भेजने पर, टेकस ने हार नहीं मानी और 1940 के ओलिंपिक की तेय्यारी में जुट गया, बिना यह सोचे कि मेरी रैंक भी बड़ेगी या नहीं और उसके बाद उसकी लगन, अनुशाशन, मेहनत और पक्के इरादें देखकर रैंक भी बड़ गई, रैंक नहीं टेकस को तो ओलिंपिक में गोल्ड लाना था, उसके लिए वो दिन रात शूटिंग की प्रैक्टिस करता रहता था I

कठिनाई के बावजूद अपने लक्ष्य को पाने के लिए हिम्मत ना हारना  

आर्मी में इसके अलावा टेकस गोला बारूद विस्फोट करने की ट्रेनिंग में भी शामिल होता था I एक दिन जब टेकस गोला बारूद विस्फोट की ट्रेनिंग कर रहा था, तो एक ख़राब बारूद विस्फोट हुआ और इस विस्फोट में उसका दायाँ हाथ पूरी तरह ख़राब हो गया I

अगर किसी शूटर का दायाँ हाथ, पूरी तरह जख्मी हो जाये तो क्या होगा? उसका पूरा जीवन चोपट हो जायेगा लेकिन करोली टेकस तो अलग ही मिट्टी का बना हुआ था और आसानी से हार मानने वाला नहीं था, अपने लक्ष्य को लेकर बहुत जिद्दी था I लोगों के द्वारा ये कहने सुनने के बावजूद की अब तो तुम कुछ नहीं कर सकते हो और तुम्हारा केरियर पूरी तरह चोपट हो गया है, टेकस ने दोबारा बिना किसी को बताएं, चुपचाप प्रैक्टिस शुरू कर दी, वो भी अपने कमजोर लेफ्ट हैण्ड से I

1938 में दुर्घटना होने के बाद 1939 में हंगरी में नेशनल शूटिंग प्रतियोगिता हो रही थी, तो अचानक ग्राउंड जो पूरा दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था और काफी नामी शूटर शूटिंग प्रतियोगिता में भाग लेने के लियें आयें थें कि अचानक करोली टेकस उनके बीच पहुचें, करोली टेकस को देखकर साथी खिलाड़ी ने ताली बजाकर टेकस का स्वागत किया और बोले “थैंक्स करोली मैदान में आने का और हमारा हौसला बड़ाने काकरोली टेकस ने रिप्लाई किया की “हेलो दोस्तों में तुम्हारा हौसला बड़ाने नहीं बल्कि शूटिंग प्रतियोगिता में भाग लेने आया हूँ, वो भी अपने लेफ्ट हैण्ड से सबने उसका मज़ाक समझा, पर जिसके इरादें पक्कें हो, तो उसकी मंजिल को पाने के लिए उसे कौन रोक सकता है और करोली ने फिर से नेशनल प्रतियोगिता में गोल्ड जीता I

लक्ष्य प्राप्ति पर विलम्ब होने पर भी धैर्य बनायें रखना और अपना प्रयास करते रहना

इसके बाद करोली ने 1940 के जापान के टोक्यो शहर में होने वाले ओलिंपिक की तेय्यारी में जी जान से प्रैक्टिस शुरू कर दी और रोज़ की प्रैक्टिस की दिनचर्या होने लगी की तभी 2nd वर्ल्ड वार के कारण टोक्यो का ओलिंपिक रद्द हो गया, ऐसा लगा जैसे उप्पर वाला उसकी कठिन नहीं, सबसे कठिन परिक्षा ले रहा हो, लेकिन जिसके इरादें फौलाद से भी ज्यादा अटूट हो, उसे कौन रोक सकता है I करोली फिर से अगले ओलिंपिक की तेय्यारी में लग गया, जो 1944 में, लन्दन में होना था, उसी जज्बे से जो उसके पास पहले से मौजूद था और फिर से प्रैक्टिस का वही टाइम टेबल फॉलो करने लगा I इस तरह समर ओलिंपिक का समय नजदीक आने लगा, तो उसपर एक ओर मुसीबत का पहाड़ फिर से टूट पड़ा और 1944 का ओलिंपिक भी 2nd वर्ल्ड वार के कारण फिर से रद्द हो गया I

इतना कुछ उसकी लाइफ में होने के बाद, उसके दोस्त भी कहने लगें “करोली छोड़ दे शूटिंग, तेरे से नहीं हो पायेगा और तेरी उम्र भी धीरे धीरे बड़ रही है” पर जिसके इरादें अटल हो, जिसमे कुछ नहीं बल्कि बहुत कुछ करने का जज्बा हो उसे भला कौन रोक सकता है I

1948 में लन्दन समर ओलिंपिक की तेय्यारी

करोली फिर से 1948 समर ओलिंपिक की तेय्यारी में लग गया, जो लन्दन में होना था, जैसे जैसे ओलिंपिक नजदीक आने लगा तो लोगो को भी लगने लगा की करोली कुछ करेगा और अब ये जीत करोली की नहीं थी बल्कि उन लोगो की थी जो कभी हार नहीं मानते, चाहे कुछ भी हो जाये, सबकी उम्मीद उसकी और बड़ने लगी I 1948 के ओलिंपिक के समय करोली की उम्र 38 वर्ष थी और उसके एक विरोधी खिलाड़ी वलिएंते जो एक वर्ल्ड चैंपियन था, ने ये जानने के बावजूद की करोली का एक्सीडेंट हुआ था, ने करोली से कहा “तुम यहाँ क्या कर रहे हो” करोली ने रिप्लाई किया “मैं यहाँ सिखने और वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने आया हूँ” और इसके बाद 25 मीटर रैपिड शूटिंग प्रतियोगिता शुरू हुई I

करोली का गोल्ड मैडल जितने का पुरे स्टेडियम के दर्शक बेसर्बी से इंतज़ार कर रहे थे, धीरे धीरे करोली के शूटिंग पॉइंट्स बड़ने लगे और उन्होंने गोल्डन निशाना मारा और गोल्ड जीतते ही स्टेडियम पूरी तरह तालियों से गूंजने लगा, दर्शकों, की आँखों में खुसी के आंसू आने लगे और वलेंते ने भी उन्हें बधाई दी और कहा “तुमने काफी कुछ सिखा है”

ओलिंपिक में गोल्ड जितने के बाद का अगला लक्ष्य

ओलिंपिक में गोल्ड जितने के बाद आगे कुछ और करने को रहता नहीं है, वो भी जब उम्र 38 प्लस हो, लेकिन करोली ने हेल्सिनिकी ओलम्पिक 1952 में वही शूटिंग इवेंट में भाग लिया I अब करोली को सभी दर्शक जानतें थें और सबको पूरा यकीं था की करोली ही जीतेगा और करोली ने दोबारा फिर गोल्ड के लिए अपना अचूक निशाना लगाया तो पुरे स्टेडियम में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी I शूटिंग के बाद उसके विरोधी, वलिएंते ने करोली को शुभकामनायें दी और कहा “अब तुम बहुत ज्यादा सीख गए हो और अब तुम्हारे पास, मुझे सिखाने का टाइम है”I

करोली की, यह सच्ची स्टोरी कभी भी हमें अपने लक्ष्य से भटकने नहीं देगी, चाहे लक्ष्य कितना भी बड़ा क्यों ना हो और यह सत्य है कि यदि व्यक्ति अपने मन में यह ठान लें कि हाँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ (yes I can do everything) तो उसके लगातार प्रयासों से लक्ष्य भी बोना नज़र आने लगता है I जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लियें, कई तरह की परेशानी आयेगी लेकिन हम सबको इन परेशानियों से घबराना नहीं है इनसे डटकर मुकाबला करना है, एक बार गिरेंगे, दो बार गिरेंगे, तिन बार गिरेंगे, बार-बार गिरेंगे, पर जब गिरकर खड़े होंगें तो ऐसा लगेगा जैसे हमने पुरें जहाँ को जीत लिया और जीत तुम्हारी नहीं, हमारी जीत होगी I

दोस्तों ये लेख केसा लगा रिप्लाई अवस्य करना, यह मेरा दूसरा ब्लॉग है और मैं आशा करता हूँ की आप लोगों को पसंद आया होगा और आपको अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रेरित करता रहेगा I

धन्यवाद

आपका शुभचिंतक

प्रकाश चन्द जोशी

Hamaarijeet.com

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