panchatantra story adharmi ka phaislaa पंचतंत्र की कहानी अधर्मी का फैसला

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panchatantra story adharmi ka phaislaa    

panchatantra story adharmi ka phaislaa पंचतंत्र की कहानी अधर्मी का फैसला   

panchatantra story adharmi ka phaislaa पंचतंत्र की कहानी अधर्मी का फैसला एक दुष्ट बिल्लें, गौरैया, खरगोश और कौए पर आधारित है और जिसके रचियता पंडित विष्णु शर्मा जी थें, जिन्होंने संस्कृत भाषा में पंचतंत्र लिखी और इसका प्रयोग हमारे देश की अपेक्षा बाहर देशों के राजाओं ने अपने राजनीति जीवन को आगे बड़ाने के लिए किया। यह आज से लगभग 2300 वर्ष यानि तीन सौ ईसा वर्ष पूर्व लिखी गई थी। पंचतंत्र के रचनाकार के बारे में पढ़ने के लिए click करें पंडित विष्णु शर्मा जी

 “भाइयों! यह संसार बड़ा ही अदभुत है और हमारा जीवन इंद्रजाल के समान एक परिवार-सा लगता है, यदि आप सब लोग सुख और शान्ति चाहते हो तो धर्म का पालन करों, यह शरीर सदा नहीं रहता, मृत्यु सदा रहती है। इसिलिए धर्म का कार्य करों। वृक्षों से प्रिय तो उनके फल और फूल होते हैं। घी दूध से भी अच्छा होता है और दूसरों को दुःख देना पाप है।“

अधर्मी और दुष्ट बिल्ले की ऐसी बातें सुनकर खरगोश व गोरैया उसका मुहँ देखने लगे।


आगे कहानी विस्तार से अधर्मी का फैसला

कौए और गौरैया की दोस्ती  

कौआ जिस वृक्ष पर रहता था, उसी वृक्ष के तने पर खोह बनाकर एक गौरैया भी रहता था। इन दोनों में अच्छी दोस्ती थी। दोनों मिलकर देवी-देवताओं की पूजा-पाठ करते और ब्राह्मणों का आदर करते, खाली समय में निति-ज्ञान की बात करते हुए समय का सदुपयोग करते और इसी प्रकार से उनका जीवन व्यतीत हो रहा था।

गौरैया का अपने घर से दूर जाना

एक दिन गौरैया के अन्य दोस्त आ गये और वह कौए को छोड़कर उनके साथ घुमने चला गया। धीरे-धीरे रात होने लगी और गौरैया नहीं आया तो कौए को चिंता होने लगी। वह बार-बार सोच रहा था कि कहीं ऐसा ना हो कि उस बेचारे को किसी शिकारी ने मार डाला हो या वो किसी मुसिबत में फंस गई हो।

वह बेचारा चिंता में डूबा रहा और उसके मित्र का कही भी अता-पता नहीं था। इस प्रकार कई दिन बीत गये, रोज कौआ बेचारा वृक्ष पर बैठकर अपने दोस्त की राह देखता कि वह वापस ज़रूर आयेगा, लेकिन उसे निराशा ही हाथ लगती।

कौए का नया मित्र खरगोश बनना 

एक दिन जब कौआ अपने दोस्त की प्रतीक्षा में बैठा था तो उसकी खोह में से एक खरगोश निकल रहा था। उसे देखकर कौए ने सोचा कि उसका मित्र, गौरैया ना जाने कहाँ चला गया है और अब तो वह जीवित भी ना होगा। बिना मित्र के जीवन भी सूना-सूना हो गया है। क्यों ना? इस खरगोश को मित्र बना लिया जाये, कम से कम इस एकांत का दुःख तो मिट जाएगा।

और इस प्रकार कौए ने खरगोश से मित्रता कर ली। अब तो कौए का समय पहले से भी अच्छा काटने लगा। सत्य बात यह थी कि वह खरगोश की मित्रता पाकर गौरैया को पूरी तरह भूल चुका था


गौरैया का वापस आना और खरगोश द्वारा उसके घर में रहना   

एक दिन गौरैया भी वापस आ गया, कौए ने देखा कि वह तो पहले से तगड़ा होकर आया है। जैसे ही वह अपने खोह के अन्दर जाने लगा तो वहां बैठे खरगोश को देखकर उससे पूछा – “भाई तुम मेरे घर में कैसे घुसकर बैठें हो?”

“यह घर अब तुम्हारा नहीं है मित्र, इस घर का स्वामी मैं हूँ।“ खरगोश ने गौरैया से कहा।

आगे खरगोश द्वारा “तुम यहाँ क्या करने आये हो?  क्या तुमने विद्वानो से नहीं सुना कि कुआं, तालाब, वृक्षों और देवालयों को एक बार छोड़ कर जाने के बाद उसपर अपना अधिकार फिर नहीं जमा सकते हैं।

दस वर्ष तक जिसने उसका भोग किया हो तो, उसका यह भोग प्रमाण है कि वह जगह उसी की है, जो वहां रहता है, गवाह या लेख नहीं। यह नियम प्राणियों के लिए मुनियों ने बनाया है, परन्तु पशु-पक्षियों के विषय में यह कहा है कि उनका अधिकार तब तक रहता है जब तक वे वहां पर रहते हैं।“

खरगोश की बातें सुकर गौरैया बोला “अरे भाई! तुम यदि इन धार्मिक बातों पर विश्वास करते हो तो चलो किसी ज्ञानी से अपना निर्णय करवा लें।“

न्याय के लिए किसी विद्वान की खोज के लिए जाना       

खरगोश “ठीक है चलो।“ इतना कहकर दोनों चल पड़े ताकि इस समस्या का कोई समाधान निकल सके।

दोनों को अपने ओर आते देखकर मोटा-सा बिल्ला, जो नदी के किनारे बैठा था, एकदम से तीन टांगों पर खड़ा होकर वैरागियों सा नाटक करने लगा –“भाइयों! यह संसार बेकार है,, जीवन व्यर्थ है, इंद्रजाल के समान यह परिवार है, इसलिए धर्म को छोड़कर और कोई मार्ग नहीं अपनाना चाहिए।

ज्ञानियों ने कहा है कि “यह शरीर सदा नहीं रहता और मृत्यु सदा रहती है, इसिलिए धर्म का कार्य करों। वृक्षों से प्रिय तो उनके फल और फूल होते हैं। घी दूध से भी अच्छा होता है और दूसरों को दुःख देना पाप है।“

कौए व गौरैया का न्याय के लिए बिल्ले के पास जाना 

बिल्ले को इस प्रकार उपदेश देते देख खरगोश ने गौरैया से कहा “भाई यह तो कोई बड़ा विद्वान लगता है, चलो इसी के पास जाकर अपना न्याय करवा लेते हैं।“

गौरैया “ठीक है बधुं, चलो।“

दोनों उस बिल्ले के पास जाकर बैठ गये और उसके सामने खड़े हो हाथ जोड़कर बोले “हे पवित्र आत्मा ! हम आपसे न्याय करवाने आये हैं, आप धर्म को सामने रखकर न्याय करना, हम में से को भी झुठा हो उसे अपना आहार बना लेना।“ 

बिल्ला “देखो भाई ! मेरे सामने यह पाप की बातें मत करो, नरक में गिरने वाले रास्ते से, मैं हट गया हूँ, सत्य और अहिंसा को ही मैंने अपना धर्म मान लिया है। आप भी यह बात जान लो कि सज्जनों ने ही अहिंसा को धर्म माना है,

उन्होंने तो यह भी कहा है कि जूं और खटमल की भी रक्षा करें, भैया जीव ह्त्या सबसे बड़ा पाप है, इसलिए मैंने किसी भी जीव को खाना छोड़ दिया है। 


दोनों का पापी बिल्ले की बातों में आना

“अब तुम मुझसे डरों मत, इससे पहले तुम मुझसे कुछ कहो, एक बात ध्यान रखना मैं बूढा हूँ। मैं दूर से आपकी आवाज नहीं सुन सकता। आपको जो कुछ भी कहना है, मेरे पास आकर कहो, कहा भी गया है कि लोग मन से, लोभ से, क्रोध से झूट बोलते हैं, इसलिए बिना किसी देरी के मेरे पास आ जाओं और अपने बात कहो, ताकि मैं न्याय कर सकूं।“

उस पापी बिल्लें ने अपनी बातों से उन पर ऐसा जादू किया कि वें दोनों निडर होकर उसके पास आ गये।

फिर क्या था।

बिल्ले की चाल सफल रही, उन दोनों को अपने निकट पाकर वह एक साथ उनपर टूट पड़ा और देखते ही देखते दोनों को चट कर गया।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आपस के झगड़े में किसी तीसरे को डालोगे तो वह पहले अपना उल्लू सीधा करेगा। किसी की मीठी बातों में आकर बिना सोचे-समझे उसपर विश्वास ना करें।

यह कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें हंस और कौए की कहानी

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