PANCHTANTRA KI KAHANI बुद्धि सबसे अचूक अश्त्र है

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PANCHTANTRA KI KAHANI बुद्धि सबसे अचूक अश्त्र है

“महाराज इस तालाब में हमारा देवता चांद आता है।“ तालाब में चांद आयेगा? हाथी ने आश्चर्य से उस खरगोश की ओर देखकर पूछा।““हां महाराज, यदि आपको विश्वास नहीं होता, तो आज रात अपनी आँखों से देख लेना।“ PANCHTANTRA KI KAHANI बुद्धि सबसे अचूक अश्त्र है     

आगे कहानी विस्तार से

वर्षा के ना होने से पुरे देश में अकाल जैसी स्थिति पैदा हो गई थी, कूएं और तालाब सूखने लगे थे, रामपुर के जंगलों की हालात तो इतनी खराब हो गई थी कि पशु-पक्षी प्यास के मारे तड़प-तड़प के मरने लगे थे।

इसी जंगल में हाथियों का एक परिवार बड़े से तालाब के पास रहता था। सुखा पड़ने के कारण वह तालाब भी सूखने लगा था।

हाथियों को नहाने और पिने के लिए भी तो खुला पानी चाहिए था, उस सूखते तालाब में अब इतना पानी नहीं रह गया था।

तालाब को सूखते देखकर हाथियों को बहुत चिंता होने लगी। उनके सरदार ने अपने साथियों को कहा

“भैया! मैं चाहता हूँ कि अब इस जंगल को छोड़कर शामपुर के जंगल वाले तालाब के किनार चले जाएं, क्योंकि अब इस तालाब में तो पानी रहा नहीं,यदि हम दो-चार दिन और यहां रहे तो हम प्यासे ही मर जाएंगें।”

उसी शाम को हाथियों का सरदार कुछ अन्य हाथियों को लेकर शामपुर के जंगलों में पानी के तालाब को देखने गया।

वहां पर रहने वाले खरगोशों ने जब परदेसी हाथियों को वहां पर आयें देखा तो उनका माथा ठनका।

वे सोचने लगे कि यदि यह हाथी इस जंगल में आ गये तो कुछ ही दिनों में पानी का यह तालाब भी सुख जाएगा।

एक दिन ऐसा भी आयेगा जब उन्हें पीने को पानी भी नहीं मिलेगा।

प्यासे मरने से तो कहींअच्छा है कि इन हाथियों के इस जंगल में आने से पहले ही हम यह जंगल छोड़कर कहीं ओर चले जाएं।

खरगोशों के सरदार का मत

खरगोशों का सरदार अपने साथियों को बातें सुनकर बोला, “भाइयों,हम उन हाथियों से डरकर अपने बाप दादा के बनाए घरों को छोड़कर क्यों चले जाएं, इससे तो कहीं अच्छा है कि हम अपनी बुद्धी से काम लेकर इन हाथियों को ही यहां आने से रोक दें।

विद्वानों ने कहा भी है कि – “युद्ध में कभी चतुराई भी काम दे जाती है।“

“मगर हम उन हाथियों का मुकाबला कैसे कर सकते हैं?”

सरदार “समय की राजनीति बड़े से बड़े शत्रु को मात दे सकती है, अब हमें यह देखना है कि उस शत्रु से कैसे बचा जाए?”

“आप ही बताए महाराज, क्योंकि आप तो हमारे मुखिया हैं। हम तो मात्र प्रजा ही है।“

सरदार “तुम ठीक कहते हो, मुखिया होने के नाते मैं ही तुम्हारी रक्षा की बात सोचूंगा, इसके लिए केवल दो ही सदस्य मेरे साथ चलेंगें।

युद्ध में पलड़ा उसी का भारी रहता है, जिसमें बात करने और राजनीती की शक्ति हो।“

मुखिया का अपने साथी के साथ हाथी के पास जाना

यह बात कहकर खरगोशों के मुखिया ने अपने दो साथियों को साथ लेकर हाथी राजा के पास जाने का निर्णय कर लिया।

खरगोश के मुखिया ने गजराज को प्रणाम किया तो हाथी ने उससे पूछा, कहो दोस्त कैसे आना हुआ?

“हे जंगल के राजा, हम इस जंगल की खरगोश बिरादरी की ओर से आपकी सेवा में इसलिए हाजिर हुए हैं कि आप लोग जिस तालाब पर आना चाहते हैं, उस तालाब में हमारा देवता चांद रहता है।

वैसे तो चांद हम सबका देवता है, यदि आप उस तालाब में जाकर पानी को गन्दा करेंगें तो हमारा देवता नाराज होकर हम सबका सर्वनाश कर देगा।“

“क्या तुम सत्य कह रहे हो खरगोश?”

“महाराज, आपके सामने झूठ बोलकर मुझे मरना है, परन्तु फिर भी यदि आपको विश्वास नहीं, तो आज रात को स्वयं चलकर चांद देवता के दर्शन कर लेना इससेआपको पुण्य भी मिलेगा।“


PANCHTANTRA KI KAHANI बुद्धि सबसे अचूक अश्त्र है

“यदि ऐसी बात है तो आज रात को हम भगवान् चांद के दर्शन अवश्य करेंगें और यदि तुम्हारी बात झूठी निकली तो तुम्हें इसका दंड दिया जाएगा।“

“ठीक है आज रात आप तालाब पर पधारे, आपको चांद देवता के दर्शन जरूर होंगें।“

यह कहकर खरगोश अपने साथियों के साथ वहां से वापस आ गया।

पूर्णिमा की रात थी। आकाश में चांद पुरे रूप के साथ चमक रहा था, हाथियों का सरदार अपने साथियों के साथ चांद देवता के दर्शन करने के लिए आया हुआ था।

रात के समय चांद का पूर्ण प्रतिबिम्ब तालाब के पानी में नजर आ रहा था।

खरगोश ने हाथियों के सरदार से कहा, “देखो महाराज! इस पानी के तालाब के अन्दर हमारे चांद देवता कैसे विश्राम कर रहे हैं।“  

हाथियों का सरदार “हां…….हां….. सचमुच हमारे चंद्र देव जलशैया पर लेटे हैं, धन्य है प्रभु…..धन्य है आप….हम इस तालाब को कदापि अपवित्र नहीं करेंगें।“

हाथी ने सूंड उठाकर चांद को प्रणाम किया और अपने साथियों को साथ लेकर वहां से वापस चला गया।

इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि शत्रु भले ही कितना बड़ा और कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि आप के पास बुद्धि है और आप चतुर निति से काम लेते हैं, तो विजय आप की ही होगी l

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आप सबका शुभचिंतक

P C JOSHI

hammarijeet.com

 

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