Vikram Betaal Story Part 1st विक्रम बेताल कहानी पार्ट 1

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विक्रम बेताल पार्ट 1
विक्रम बेताल पार्ट 1

Vikram Betaal Story Part 1st विक्रम बेताल कहानी पार्ट 1

प्रत्येक दिन राजा विक्रमादित्य यानि विक्रम सिंह अपनी प्रजा से मिलतें और उनके दुःख-दर्द और कष्टों को दूर करतें और उन्हें धन आदि दान करतें। यह दिन चर्या रोज की थी। Vikram Betaal Story Part 1st विक्रम बेताल कहानी पार्ट 1

एक बार जब राजा विक्रम सिंह अपनी प्रजा के पास उनसे मिलने जा रहें थें तो उन प्रजा के बीच में एक योगिराज जोर से राजा विक्रम सिंह की जय हो का घोष करने लगा, ऐसा प्रत्येक दिन होता और जब राजा उस योगिराज से मिलतें तो वह उनको एक फल भी देता, परन्तु उसके बदले कुछ भी मांग नहीं करता।

प्रत्येक दिने राजा को फल देना और कुछ भी राजा से इसके बदलें ना मांगना, राजा, विक्रम सिंह भी अचरज में पड़ गये और अपने मंत्री को बोले “मत्री जी”


“जी महाराज”

“यह योगिराज कौन है? जो रोज सुबह हमें एक फल देकर चलें जातें हैं, हम कितने दिनों से उन्हें देख रहें हैं, पता नहीं क्या स्वार्थ हैं उनका, कहतें कुछ नहीं और फल देकर चलें जातें हैं”। 

इसी बीच राजा, विक्रम सिंह कुछ सोचने लगे फिर अचानक फल को बीच में से काटा और जब कटें हुएं फल को देखा तो उसके अन्दर एक अनमोल हीरा था,

फल से हीरा निकलना
फल से हीरा निकलना

यह देखकर राजा, विक्रम सिंह मंत्री से बोलें “मंत्री जी हम योगिराज द्वारा भेट किये हुवे सारे फल काटना चाहतें हैं”।

और इस प्रकार एक-एक कर सारे फल काटें तो सबके अन्दर अनमोल हीरा मिला।

अगले दिन योगिराज से मिलना

अगले दिन जब रोज की तरह राजा विक्रम सिंह प्रजा के पास पहुचें तो योगिराज से भी मिलने के लिए गये और उनसे बोलें मैं जान सकता हूँ, योगिराज आप हर दिन इस तरह बहुमूल्य भेंट क्यों दें रहें हैं? आप मुझें चमत्कार दिखाना चाहतें हैं या इसमें आपका कोई स्वार्थ हैं”।

योगिराज “मैं कोई चमत्कार दिखाने नहीं आया विक्रम, मेरा स्वार्थ हैं, बहुत बड़ा स्वार्थ हैं”।

राजा विक्रम सिंह “यह रहे आपके बहुमूल्य रत्न, विक्रम अपनी प्रजा से बहुमूल्य भेंट नहीं लेता हैं”।

योगिराज “एक व्यस्त चक्रवती सम्राट का ध्यान आकर्षित करने के लये इसके सिवाय कोई दुसरा मार्ग मेरे पास नहीं था”।

राजा विक्रम सिंह “आप योगी हैं, सच्चे योगी में तो ना कोई भय होता हैं ना कोई लोभ हो सकता हैं आप आज्ञा कर सकतें हैं, क्या चाहतें हैं आप?

योगिराज “मैं सम्राट, विक्रमादित्य से कुछ नहीं चाहता, मैं व्यक्ति, विक्रम सिंह से मांगने आया हूँ, वीर विक्रम से, मिलेगा?”

राजा विक्रम सिंह “आज्ञा किजीयें”

योगिराज “मुझें तुम्हारा समय चाहियें, सिर्फ एक रात के लिए, वो भी अकेले”

राजा विक्रम “क्या करेंगें मेरे समय का”

तेरी राज नगरी से दूर, भयानक जंगल में. एक खंडर में, मैं एक सिद्धि कर रहा हूँ, कल उस सिद्धि की समापन की आखिरी रात हैं, उस वक्त मुझे ऐसे व्यक्ति की ज़रुरत हैं, जो वीर और पराक्रमी हो, साहसी हो, किसी से ना डरे और वो वीर पुरुष विक्रम तुम हों तुम, इसलिए मैं कई दिनों से तुम्हारें राज दरबार के चक्कर काट रहा हूँ। क्या तुम कल उस भयानक जंगल में, खंडर में अकेले आने के लिए तैयार हो? बोलों विक्रम”।

राजा विक्रम “मैं आऊंगा और अवश्य आऊंगा योगिराज, यदि मेरी सहायता से आप परम सिद्धि प्राप्त कर सकें, तो मुझें प्रसन्ता होगी”।

मंत्री “महाराज मैं बिना अंगरक्षक के आपकों कही नहीं जाने दूंगा”।

राजा विक्रम “मैं वचन दे चूका हूँ, मंत्री जी और विक्रम के जीवन में यह कलंक कभी नहीं लगेगा कि उसने वचन दिया और पूरा नहीं किया”।


Vikram Betaal Story Part 1st विक्रम बेताल कहानी पार्ट 1

राजा विक्रम का रात्री के समय योगिराज के पास पहुचना

अगले दिन रात्रि के समय राजा विक्रम सिंह अकेले अपने घोड़े के साथ भयानक जंगल की और चलने लगें, चारों और घनघोर अंधेरा था और जंगलों में खंडर के पास तरह-तरह की आवाजें आ रही थी।   

जब राजा विक्रम सिंह खंडर के पास पहुचें तो योगिराज मन्त्रों के साथ सिद्धि कर रहे थें।

सिद्धि करना
सिद्धि करना

विक्रम सिंह “प्रणाम योगिराज”

योगिराज “हा हा हा मैं जानता था तुम अवश्य आओगें”।

विक्रम सिंह “आज्ञा कीजिये योगिराज, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ”

योगिराज “मैं तुम्हें एक बड़ा ही विचित्र काम दे रहा हूँ, इस खंडर के दक्षिण मे करीब दो कोस दूर, गहन जंगल पार करने के बाद, एक सुनसान जगह पर एक वृक्ष पर उल्टा लटका हुआ मुर्दा मिलेगा। मेरी साधना की पूर्ति के लिए और उसकी आहुति के लिए मुझे उस मुर्दे की आवश्यक्ता हैं, तुम जाओं और उसे लें आओं”।

विक्रम सिंह “आप उस मुर्दे का क्या करेंगें योगिराज”?

योगिराज “प्रश्न मत पूछों, मैं जो कहूँ वही करों, तुम मुझे वचन दें चुकें हों”।  

विक्रम सिंह “जो आज्ञा”


मुर्दें यानि बेताल की खोज में जंगल में जाना

उसी रात को राजा विक्रम सिंह घनघोर जंगल में दक्षिण की ओर उस मुर्दें की खोज में जा रहे थें और जब उन्होंने घना जंगल पार किया तो सुनसान जगह पर एक वृक्ष दिखाई दिया, जिसके पत्ते झड़ चुकें थें और वृक्ष की उपरी टहनी पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ था,

उल्टा लटका हुआ बेताल
उल्टा लटका हुआ बेताल

जिसके बाल भी निचे की ओर लटकें थें, जब राजा विक्रम सिंह मुर्दें के पास पहुचें तो उन्होंने देखा कि मुर्दा ज़िंदा ही लटका हुआ हैं और उन्हें डरावनी आँखों से घूर-घूर कर देख रहा हैं, यह सब देखने के बाद मुर्दें को ऊतारने के लिए वृक्ष पर चड़े कि तभी मुर्दा नीचें आ गया और कभी उप्पर की और उड़ने लगा, परन्तु विक्रम सिंह ने अंत में उसे पकड़कर ही दम लिया और अपनी पीठ पर मुर्दें को लेकर चलने लगा यह मुर्दा, बेताल था ।     

बेताल “अरे मान गया वीर विक्रमादित्य, वाह मेहनती है, अरे मैं तो बेताल हूँ, तू चाहें तो अपनी शक्ति से इंद्र की भी हरा सकता है। अरें वाह-वाह मान गया वीर है वाकई, अरे मैं तेरी ही प्रतीक्षा कर रहा था। हा मुझे पता था वो धूर्त योगी ज़रूर तुझे मेरे पास भेजेगा।

मुझे उठाकर चलते हुए तू थकेगा तो नहीं, मगर ऊब जाएगा, बात तो तू मुझसे कर नहीं सकता, जैसे ही तूने बात की मैं उड़ कर अपनी जगह पहुँच जाऊँगा, तू एक शब्द भी नहीं बोलेगा याद रखना यह मेरी शर्त हैं, तू एक शब्द बोला और मैं छू मंतर हो जाऊँगा हा हा हा।

Vikram Betaal Story Part 1st विक्रम बेताल कहानी पार्ट 1


बेताल द्वारा विक्रम को एक कहानी सुनाना

बेताल द्वारा विक्रम को कहानी सुनना बेताल द्वारा विक्रम को कहानी सुनना
बेताल द्वारा विक्रम को कहानी सुनना

बेताल “तो सुन मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ बड़ी मजेदार, रास्ता भी कट जाएगा और तेरा मनोरंजन भी हो जाएगा, सुन पाटलिपुत्र में एक बहुत ही शानदार मंदिर हैं, बहुत बड़ा मंदिर देवी का, दूर-दूर से लोग उस देवी के दर्शन करने के लिए आतें थें।

एक दिन सूर्यमल और उसका मित्र चन्द्रसिंह पाटलिपुत्र की यात्रा के लिए आयें और उस देवी के दर्शन करने के लिए उस मंदिर में पहुचें।  

सूर्यमल ने देवी से क्या प्राथना की यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन जब सूर्यमल ने मुड़कर देखा तो उसने एक सुंदर कन्या देखी, उसे ऐसा लगा कि देवी ने उसे वरदान दे दिया और मन ही मन विचार किया कि यदि इस कन्या से विवाह नहीं हुआ तो जीवन बेकार हैं, उसने अपने मन की बात अपने मित्र से कही तो मित्र ने कहा ब्याह करना हैं तो संकोच कैसा? चलते हैं और कन्या के पिता से बात कर लेतें है।

अरे कन्या के ब्याह की चिंता किस पिता को नहीं होती है और जब वर स्वयं निवेदन लेकर आया तो इसे देवी का वरदान मानकर पिता ने स्वीकार कर लिया और सूर्यमल को अपनी पुत्री के लिए पसंद कर लिया।  

कन्या के पिता “ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त हैं”

सूर्यमल “मुझे आपकी हर शर्त मंजूर हैं

मेरी बेटी बचपन से देवी की परम भक्त है, सुबह शाम देवी के दर्शन के बिना वो भोजन भी नहीं करती, मैं चाहता हूँ कि विवाह के बाद भी उसका नियम बना रहे।

सूर्यमल “आप निश्चिंत रहिये, शादी के बाद वों देवी पूजन के वर्त का पालन हमेशा करेगी और इस प्रकार दोनों का विवाह हो गया और विवाह के बाद दूल्हा अपनी दुल्हन के साथ घर की ओर चलने लगा।

उसका दोस्त जो उसके साथ रास्ते में थे बोला “वाह भाई वाह मजा आ गया, सूर्यमल व्यापार में भी बहुत कमाया और घर में हमारी भाभी भी आ गई, अब आगे क्या इरादा है ?

सूर्यमल “भाई चन्द्रसिंह, अब तो सबसे पहले घर चलकर देवी का मंदिर बनाना पड़ेगा” ।  

चन्द्रसिंह “क्यों?”

सूर्यमल “ताकि तुम्हारी भाभी सुबह शाम देवी के दर्शन कर सकें।  

चन्द्रसिंह “ये बात हुई ना।  

कि तभी झाड़ियों में छुपकर बैठें लुटेरे बाहर निकले और उन्होंने पूरी बरात को लुटना शुरू कर दिया सूर्यमल और चन्द्रसिंह लुटेरों का सामना करने लगें और इसी बीच लुटेरों ने सूर्यमल और चन्द्रसिंह का सिर धड़ से अलग कर दिया।

यह देखकर सूर्यमल की पत्नी विलाप करें लगी और बोली “माँ माँ तूने क्या किया। माँ मेरा सुहाग उजाड़ दिया कहतें हुए निचे पड़ें खंजर को उठाया और जैसे ही अपने आप पर वार करने लगी कि तभी देवी माँ ने साक्षात दर्शन दिये।

देवी “ये क्या कर रही हो बेटी” ।  

सूर्यमल की पत्नी “मत रोक मुझे, क्या मिला मुझे तेरी भक्ति करके, इतने साल, तूने मेरा सबकुछ उजाड़ दिया अब मेरे जीने का क्या फायदा।

देवी “घबरा मत यह अभी जीवित हो जायेंगें।

सूर्यमल की पत्नी “क्या क्या।

देवी “मैं इन्हें जीवित कर दूंगी ।

सूर्यमल की पत्नी “कैसे कैसे।


आगे की कहानी बेताल ने विक्रम को बताई:

अमृत छिड़कर देवी ने दोनों को जीवित कर दिया, मगर विक्रम उससे एक बहुत बड़ी एक भूल हो गई, अरे भूल हुई उस दुल्हन से, देवी ने कहा तू अपने पति का सिर उसके शरीर के साथ और उसके मित्र का सिर उसके शरीर के साथ जोड़ दें और दुल्हन ख़ुशी और घबराहट के अन्दर सब कुछ भूल गई और उसने अपने पति का सिर मित्र के शरीर से और मित्र का सिर अपने पति के शरीर के साथ जोड़ दिया। इसका शरीर उसका सिर उसका शरीर और इसका सिर।

विक्रम मुझे पता हैं कि तू बहुत ही होशियार और समझदार है सुना है जब न्याय करने बैठता है तो दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है, देख सोच और जवाब दें, सुंदरी के सामने दो नवयुवक हैं इन दोनों में से स्त्री का पति कौन सा हैं?

एक वह शरीर जिससे इसने विवाह किया था और अब इसपर पति के मित्र का सिर लगा है।  

दूसरा वों पति के मित्र का शरीर जिसपर पति का सिर लगा हैं।  न्याय कर विक्रम न्याय कर, तू बड़ा न्याय और बुद्धि वाला है, बोल, नहीं तो तेरे सर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।  

राजा विक्रम सिंह “सुन बेताल मनुष्य के शरीर की रचना बहुत ही अदभुत और अनोठी है, सारे अंग अपना-अपना कार्य करते हैं। एक अंग जो अपना काम करता है वो दूसरा अंग नहीं करता, इन सब अंगों का स्वामी इनका मालिक वो है सिर अथार्त मस्तिष्क। उसी की आज्ञा से सब यह अंग चलते हैं, मस्तिष्क प्रमुख हैं शरीर तो मस्तिष्क का सेवक है, इसलिए जिस शरीर पर उस स्त्री के पति का सिर लगा है, वही शरीर और वही  व्यक्ति उस स्त्री का पति हैं।  

बेताल “वाह विक्रम ठीक न्याय किया तुमने, वाकई तू बहुत बड़ा न्यायवादी है, ज्ञानी हैं, समझदार हैं लेकिन एक भूल कर गया। मैंने तुझे कहा था ना कि तू बोल मत और तू बोलेगा तो मैं छू मंतर हो जाऊँगा, तू बोला तो ले मैं जा रहा हूँ हूऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ ।

और इस तरह बेताल उड़ गया।  

बेताल का उड़ना
बेताल का उड़ना

विक्रम “बेताल मैं तुझें नहीं छोडूंगा।  

बेताल “विक्रम भाग जा, मेरा पीछा करना छोड़ दें, मैं तेरे बस में आने वाला नहीं हूँ, जिसने तुझे मेरे पीछे लगाया हैं वो महाधूर्त है हाहाहाहा हाहाहाहा।  

और उसी वृक्ष पर जाकर उल्टा लटक गया और विक्रम उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे भागा।  

प्रिय पाठकों, यह थी एक कहानी जो चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य के न्याय से संबधित थी और यह वही चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य हैं जिनका राज्य अरब और मिस्र तक था और इनकी अधिक जानकारी के लिए अवश्य पड़े चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य 

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