Vikram Betaal Story Part 2 विक्रम बेताल कहानी पार्ट 2 पढ़े

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vikram betaal
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Vikram Betaal Story Part 2 विक्रम बेताल कहानी पार्ट 2 पढ़े

अब मैं  आपको  विक्रम  बेताल की अगली कथा के बारें में बताता हूँ। बेताल के विक्रम के चुंगल से छूटने के बाद विक्रम एक बार  फिर से बेताल को पकड़ने के लिए उसके पीछे  भागा और  उसे पकड़कर कंधे पर  लेकर  चलने  लगा  तो  बेताल को फिर  से  एक शरारत सूझी और  वों विक्रम को बोलने पर विवश करने लगा लेकिन विक्रम ने एक शब्द भी  ना  बोला क्योंकि  यदि विक्रम  बोलता  तो  बेताल उसके चुंगल से छुटकर भाग जाता। Vikram Betaal Story Part 2nd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 2nd पढ़े


अब मैं  आपको  विक्रम  बेताल की अगली कथा के बारें में बताता हूँ  

बेताल के विक्रम के चुंगल से छूटने के बाद विक्रम एक बार  फिर से बेताल को पकड़ने के लिए उसके पीछे  भागा और  उसे पकड़कर कंधे पर  लेकर  चलने  लगा  तो  बेताल को फिर  से  एक शरारत सूझी और  वों विक्रम को बोलने पर विवश करने लगा लेकिन विक्रम ने एक शब्द भी  ना  बोला क्योंकि  यदि विक्रम  बोलता  तो  बेताल उसके चुंगल से छुटकर भाग जाता।

बेताल “इतने चुप चुप  क्यों  हो,  कुछ  तुम  बोलो, कुछ मैं बोलू  और  इसी  तरह पूरा रास्ता कट जाएँ। तुम  भी ज्ञानी, मैं  भी  ज्ञानी, तू  नहीं बोलेगा  ना, कहानी  भी  सुनाऊ तो भी  हूँ  हाँ  भी  नहीं  करेगा। आज  मैं  तुझे  एक  ओर कथा  सुनाता  हूँ, सुन।

नगरों में  नगर वर्धमान क्या  नाम?……. नहीं बोलता कोई बात नहीं चल आगे सुन, वहां  का राजा उसका नाम रूपसिंह, यदि किसी  दुखी व्यक्ति  की  सहायता  न करें  तो  उसे दिन को  चैन  और रात  को  आराम  नहीं  पड़ता,  हमेशा  अपनी  प्रजा  के हित  के बारे  मे  ही  सोचता  रहता ताकि  उसके राज्य  में कोई दुखी  ना  रहे

ऐसे  राजा  की  धार्मिक  नगरी के  पास एक वीर  रहता  था, शरीर  से  भी  बड़ा बलशाली और  वीर था, हमेशा दिन रात कसरत करता रहता था, नगर  में  उससे  बड़ा बलशाली वीर कोई और ना था।

वीर
वीर

एक बार  उसकी  पत्नी  ने उससे कहा  “एक बात पूंछूं आपसे” । 

वीर “हाँ  पूंछों” ।

पत्नी “हमारे बड़े बुजुर्गों ने जो पूंजी  कमाई  थी उसमे से ज्यादा से ज्यादा पूंजी,  तुमने अपनी कसरत में खर्च कर  दी और  आपने  कभी  सोचा  की  आगे  हमारे  बच्चों  का  क्या  होगा”?

वीर “अरे  मैंने  यह शरीर  ऐसे  ही  नहीं  बनाया  हैं,

पत्नी “किसी  काम  के  लिए बनाया  हैं”।

वीर “हमारे महाराज रूपसिंह कितने प्रतापी है।

वीर की पत्नी “हाँ  है”।

वीर “और  प्रजा  के हित  के  लिए  हमेशा कार्य करतें हैं”।

वीर की पत्नी “हाँ”

वीर “मैं उनका अंगरक्षक बनुगां”।

वीर की पत्नी “लेकिन  कब  बनोगे  उनके अंगरक्षक, जाने से बनोगे या घर पर  बैठने  से बनोगे”। 

वीर “ये तुमने सही  कहा, लो अब मैं  कल  ही  जाता  हूँ, महाराज के पास”।

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अगले  दिन वीर  महाराज  से  मिलने  उनके  महल  गया  और  अंदर  जाने  लगा  तो दरबारी ने उसे  रोका  और  कहा

“किससे मिलना  है” ?

वीर “महाराज से मिलना  है”।

दरबारी अंदर  गया, उस  समय  महाराज प्रजा के दुःख सुन  रहे  थें।

महाराज  दरबारी को देखते  हुए “क्या  बात  हैं”?

दरबारी “महाराज  दरबार में एक वीर  आया  है,  जो  आपसे  मिलना  चाहता  है”।

महाराज “प्यासा  है  तो  उसे पानी दो,  भूखा  है  तो  भोजन दो, उसे  रुकने  को  कहो  हम  अभी  आते  है”।

वीर  ने पानी पिया और कुछ देर  बाद  महाराज उससे  मिलने स्वयं  पहुचे।

महाराजा रूपसिंह और वीर
महाराजा रूपसिंह और वीर

वीर “प्रणाम महाराज”

महाराज “क्या नाम है तुम्हारा”?

वीर “मेरा नाम वीर है”

महाराज “क्या चाहते हो”?

वीर “मैं आपका अंगरक्षक बनना चाहता हूँ महाराज”।

महाराज “क्या  वेतन लोगे”।

वीर “प्रतिदिन नो तोला  सोना”।

महाराज “नो  तोला  सोना प्रतिदिन”।

मंत्री “महाराज यह  पागल  है,  हमारा  समय  नष्ट कर  रहा  है”।

महाराज “नहीं  मंत्री जी, यदि यह वीर इतना वेतन मांग  रहा  है  तो,  इसके पीछे  भी  कोई  बड़ा  योग्य कारण  होगा”।

महाराज वीर से “क्या तुम सिद्ध  कर  सकते  हो  कि तुम  नो  तोला  सोना  पाने  के  अधिकारी  हो”।

वीर “जी महाराज, आप  पृथ्वी  के  पालक  हैँ, आपका  जीवन  बहुत  मूल्यवान है, जब  आप  चैन  की  नींद  सोयेंगे  तो  मैं अंगरक्षक आपकी  रक्षा  करूँगा, आपकी  प्राणों की  रक्षा  के लिए  इससे  कम वेतन लेना, आपके  मूल्यवान जीवन का अनादर करना होगा, महाराज।

वीर फिर  भी  जब  आप  चाहे,  मैं  परीक्षा  देने  के  लिए  तैयार  हूँ।

महाराज “ठीक  है,  हमें  अपनी  वीरता  का  कोई  चमत्कार  दिखाओ”।

वीर “जी  महाराज”।

बेताल “तभी  वीर  ने  अपने  भाले से सटीक  निशाना  लगाया  और भाले  को भी अपनी  तलवार  से बीच  में  से  अलग कर दिया ओर  तो  ओर एक  साथ  कई  योद्धाओं को एक साथ हरा दिया।

वीर  ने ऐसे- ऐसे करतब दिखाए जिसे  देखकर  महाराज  भी आश्चर्यचकित रह गये और खुश  होकर  वीर  को  अपने अंगरक्षक के  रूप  में  रख लिया। रोज  वीर  को  नो  तोला  सोना  सेवा के  रूप  में  मिलने  लगा, जिसे  लेकर वीर  घर  पंहुचा और  अपनी  पत्नी  को  नो तोला सोना दिया।

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पत्नी “इतना सोना”

वीर “हाँ”,

पत्नी “यह  तो  बहुत  ज्यादा  हैँ” ।

वीर “हाँ  महाराज  की  सेवा  के  बदले  मिले  हैँ और  रोज  मिलेंगे।

पत्नी “इतने  धन का हम क्या  करेंगे?

वीर “आधा गरीब  जनता  को  बाँट  दो, और जो  बचे  उसमें  से  आधा साधु, ब्राह्मण और  अतिथि  के  लिए  बाकि तुम्हारे  और  तुम्हारे  बच्चे  के  लिए।

आगे बेताल द्वारा 

बेताल “खाते-पीते, उठते-बैठते, चलते-फिरतें आठों पहर और चोबिसों घंटे वीर  महाराज  की  सेवा  में  लगा  रहता। इसलिए ज्ञानी लोग कहतें हैं कि सेवा-धर्म योग धर्म से भी कठिन है और एक रात वीर ऐसे राजा की सेवा में था कि उसने दूर से किसी औरत के रोने की आवाज़ सुनी जिसे सुनकर महाराज जाग गएँ और वीर से बोले किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दे रही है वीर।

वीर “जी महाराज”।

महाराज “ना जाने उसपर कैसी विपदा आन पड़ी है” ।

वीर “मनुष्य के जीवन में, किसी ना किसी समय विपदा आती रहती है महाराज   

महाराज “जाओं और जाकर उसके रोने का कारण पता लगाओं” ।

वीर ”जी महाराज” ।


वीर उस रोती हुई स्त्री के पास पहुँचा।

बेताल “चाकर को आजमाना हो तो उसे असमय में काम दो, जो हुकुम बजा लायें तो नौकर काम का और जो तकरार करें और काम को टालें, वह नौकर बेकार, अरे सच्चा वही जो आड़े वक्त काम आ जाएँ, है ना …..यह सब सोचकर, राजा वीर के पीछे-पीछे चल पड़ा।  

वीर उस स्त्री के पास पहुचां और राजा भी पीछे वृक्ष की ओठ में सब देख रहा था।

वीर “तुम कौन हो देवी और इस तरह अकेले क्यों रो रही हो” ।

स्त्री “कौन वीर, तू चला जा यहाँ से, मुझे और दुखी मत कर, तू चला जा यहाँ से” ।

वीर “तू मुझे जानती है” ।

स्त्री “मैं इस राज्य में सबकों जानती हूँ, लेकिन अब इस राज्य में कोई भी नहीं रहेगा, सब कुछ नाश हो जाएगा, ना राजा रहेगा और ना ही प्रजा सबकुछ ख़त्म हो जाएगा ख़त्म” ।

वीर “राजा और प्रजा के नाश की कल्पना करने वाली तू कौन है” बता तू कौन है” ।

स्त्री “ मैं राज लक्ष्मी, राजा रूप सेन के राज्य की लक्ष्मी, लेकिन मैं अब यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह सकती, क्योंकि काल राजा रूप सेन को ख़त्म का देगा, समाप्त कर देगा, ये राज्य समाप्त हो जाएगा।

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वीर “इतना प्रतापी, राजा रूपसेन मर जाएगा, राजा रूपसेन का राज्य समाप्त हो जाएगा, नहीं ऐसा नहीं हो सकता”।

स्त्री “हाँ, वीर इसलिए तो ही रो रही हूँ, काल के सामने किसी का वश नहीं चलता, मैं क्या करूँ, मैं कुछ नहीं कर सकती हूँ, मैं कुछ नहीं कर सकती ।

वीर “माँ लक्ष्मी इस विपदा का कोई तो उपाय होगा।

स्त्री “हाँ है”

वीर “क्या है, बताइयें”?

स्त्री “यहाँ से एक योजन दूर, दक्षिण में एक गुफा है, उस गुफा में यहाँ का काल देवता रहता है, वो भूखा है, वो बाहर आएगा तो राजा रूपसेन के प्राण ले लेगा।

वीर “मैं रूपसेन के अंग और प्राणों का रक्षक हूँ, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा, मुझे बताओं काल देवता को प्रसन्न करने के लिए क्या किया जाये?

स्त्री “काल देवता भूखा है और भूखा क्या चाहता है, भूखा केवल तृप्ति चाहता हैं, अपने भूख की तृप्ति लेकिन ऐसा कौन है जो राजा के राज्य परिवार का स्थान ले सकें।

वीर “मैं और मेरा परिवार, हमारे होते हुए काल, राजा और उसके परिवार का कुछ नहीं बिगाड़ सकता” ।

यह कहकर वीर वहां से चला गया और राजा जो वृक्ष के पीछे सब कुछ सुन रहा था वों स्त्री के पास आया और बोला “मैं वीर को नहीं मरने दुंगा, कभी नहीं” ।

स्त्री “मुर्ख हो गये हो राजा, वो नो तोलें सोने का रोज का नौकर अपने प्राण देगा, रूपसेन तू राजा है उसके मरने के बाद तू सो वर्ष तक राज करेगा, मैं राज लक्ष्मी तेरे यहाँ रहूंगी, तेरी पूरी सेवा करुँगी”।

महाराज “नहीं माँ, वीर मेरा सेवक ही नहीं बल्कि मेरी प्रजा भी है और अपने सुख के लिए प्रजा का बलिदान देना राजा का धर्म नहीं है। काल देवता मेरी मृत्यो चाहता है तो मैं मरूँगा, वीर और उसका परिवार नहीं, माँ मेरे रहते हुए कभी नहीं।            

स्त्री “नहीं रूपसेन।

महाराज “कभी नहीं ।

स्त्री “तुम मत जाओं रूपसेन, तुम मत जाओं ।

महाराज “मेरे राजा होते हुए कभी नहीं।

स्त्री “मत जाओं रूपसेन मत जाओं।

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और राजा चला गया।

बेताल “जब किसी राज्य या देश में विपत्ति आती है तो यदि उस देश का पिता अपने बेटें के लिए समर्पण करने के लिए तैयार हो जाएँ और उस देश का हर बेटा अपने प्राण की आहुति देने की लिए मैदान में निकल आयें तो ऐसे देश का दुश्मन तो क्या, काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

राज लक्ष्मी की बात सुनकर वीर अपने घर गया उसने परिवार वालों को समझाया की राजा की रक्षा के लिए अपने प्राणों का समर्पण जरूरी है। वीर की बात सुनकर पूरा परिवार अपने कर्त्तव्य से प्रेरित होकर, उसके साथ पीछे-पीछे चल पड़ा, उसके साथ उसकी पत्नी, पुत्र और पुत्री भी साथ थी और वों सब गुफा के अन्दर गएँ।

काल “कौन है तू? यहाँ क्यों आया?

वीर “मैं हूँ वीर, महाराजा रूपसेन का अंगरक्षक और यह है मेरा परिवार, जबतक हम जीवित हैं, महाराजा के प्राणों की रक्षा करना हमारा धर्म है।

काल “मैं भूखा हूँ, मैं बहुत भूखा हूँ, मेरी भूख कौन मिटायेगा?

वीर “मैं और मेरा परिवार।

काल “आओं मैं बहुत भूखा हूँ, आओं, आओं।

वीर के परिवार द्वारा काल का भोजन बनना
वीर के परिवार द्वारा काल का भोजन बनना

वीर और उसका परिवार काल के भोजन के लिए उसके विशाल मुहं में प्रवेश करने लगे और एक-एक कर सभी ने काल के भोजन के रूप में उसके विशाल मुहं में प्रवेश कर लिया कि तभी पीछे- पीछे राजा ने भी गुफा में प्रवेश किया। अन्दर गुफा में जातें ही जोर-जोर से चिल्लाया वीर-वीर लेकिन वीर तो वहां था ही नहीं।

काल “हा हा हा हा हा हा रूपसेन तूने अपने बदले सेवक के परिवार की बलि दे, मुझे प्रसन्न कर दिया, सुखी रह, दीर्घायु भवः, सो वर्षों तक राज कर।

महाराज “नहीं तू मेरा काल है, मेरी मृत्यो है, उस निर्दोष वीर और उसके परिवार की नहीं” ।

काल “जो होना था सो हो गया राजन, जा लोट जा और सुख से राज कर।

महाराज “धिक्कार है राजा के ऐसे जीवन पर, जहाँ उसके सुख के लिए निर्दोष मारे जाते हो, मैं आ रहा हूँ काल देवता, मुझे ग्रहण कर, मैं आ रहा हूँ।

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बेताल “सुन ली पूरी कथा, अब मेरे एक प्रश्न का एक उत्तर दे, माना यह धन्य है वो सेवक जिसने अपने स्वामी के प्राणों की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों का मोह नहीं किया और धन्य है वो राजा जिसने अपने प्राणों का लालच नहीं किया।

अब तू यह बता कि इन दोनों में पुण्य किसका ज्यादा? बलिदान किसका बड़ा? महान कौन? सेवक या राजा, पुण्य किसका ज्यादा? बलिदान किसका बड़ा? महान कौन? सेवक या राजा बोल, अरे बोल, अगर जानते हुए भी नहीं बोलेगा तो याद रख तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दुंगा।

बोल, राजा बोल, विक्रम बोल, राजा विक्रमादित्य बोल, सम्राट विक्रम बोल जवाब दें। देख उप्पर देख देवी-देवता, गन्धर्व, ऋषि-मुनि सब इंतज़ार कर रहे हैं तेरी न्याय को सुनने के लिए। तू बहुत बड़ा न्यायी है ना, अगर असली न्यायी है तो अपना न्याय बता, बता कौन बड़ा? कौन महान? बोल जवाब दे।

विक्रम “सुन बेताल, दोनों में अधिक महान है राजा। सेवक का तो कर्त्तव्य है, धर्म है कि जब विपत्ति आयें तो अपने प्राण देकर अपने स्वामी की रक्षा करें, पर जब राजा अपने सेवक के लिए, अपनी प्रजा के लिए, अपने पद का अपने राज-पाट का सारा लालच और सारा मोह छोड़, प्राण देने को तैयार हो जाता है तो उसका त्याग बहुत बड़ा होता है। उसका पुण्य अधिक। वो राजनेता बहुत महान है जो अपनी प्रजा के लिए सबकुछ यहाँ तक अपने प्राण देने के लिए तैयार है, बेताल वो सचमुच बहुत महान है।

बेताल “बिल्कुल सही कहा, अब मैं जाता हूँ।

विक्रम “नहीं बेताल, अपनी कहानी पूरी कर, कहानी पूरी कर।

बेताल “अरे कौन-सी कहानी? और कौन सा कालदेव, यह तो राजलक्ष्मी ने एक माया रची थी, इस परिक्षा के लिए कि जो नो तोला सोना रोज लेता है, उसमें सेवा भावना आखिर है कितनी, ये जानने के लिए एक माया थी।

परिक्षा लेने के बाद राजलक्ष्मी माँ के रूप में प्रकट हुई और वीर और उसके परिवार और राजा, रूपसेन को कहा “धन्य हो रूपसेन, राजा हो तो ऐसा जो अपनी प्रजा को कष्ट में ना देख सकें, धन्य हो वीर ऐसी सेवा अगर इस राज्य में हो तो वो राज्य कभी नष्ट नहीं हो सकता।


बेताल “इसके बाद महाराज ने वीर को अपना सेनापति चुना। हा हा हा अब मैं जाता हूँ, हा हा हा।

विक्रम बेताल के पीछे-पीछे “बेताल मैं तुझे नहीं छोडूंगा।

बेताल का उड़ना
बेताल का उड़ना

बेताल “हा हा हा हा हा हा विक्रम भाग जा, मेरा पीछा करना छोड़ दें, मैं तेरे बस में आने वाला नहीं हूँ, जिसने तुझे मेरे पीछे लगाया है वो महाधूर्त है हा हा हा हा हा हा

और इस प्रकार बेताल उसी वृक्ष पर जाकर उल्टा लटक गया। Vikram Betaal Story Part 2nd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 2nd पढ़े

प्रिय पाठकों, राजा विक्रम के बारें में जानने के लिए जरूर पड़े चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य

और पार्ट 1 भी जरूर पड़ें विक्रम बेताल पार्ट 1

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