Vikram Betaal Story Part 3rd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 3rd

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Vikram Betaal Story Part 3rd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 3rd
Vikram Betaal Story Part 3rd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 3rd

Vikram Betaal Story Part 3rd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 3rd

अब मैं  आपको  विक्रम  बेताल की तीसरी कथा के बारें में बताता हूँबेताल के विक्रम के चुंगल से छुटने के बाद विक्रम एक बार  फिर से बेताल को पकड़ने के लिए उसके पीछे  भागा और  उसे पकड़कर कंधे पर  लेकर  चलने  लगा  तो  बेताल को फिर  से  एक शरारत सूझी और  वों विक्रम को बोलने पर विवश करने लगा, लेकिन विक्रम ने एक शब्द भी  ना  बोला क्योंकि  यदि विक्रम  बोलता  तो  बेताल उसके चुंगल से छुटकर भाग जाता। Vikram Betaal Story Part 3rd विक्रम बेताल कहानी पार्ट 3rd 

बेताल “अहू तू नहीं मानेगा, तू मुझे उस दुष्ट योगी के पास ले जाकर ही मानेगा। तू धुन का पक्का, जो मन में विचार आयेगा, उसे पक्का कर के ही रहेगा। मगर भूलना नहीं एक शब्द भी बोला तो मैं उड़ कर भाग जाउंगा और अपनी जगह पर चला जाऊँगा।

रास्ता ठीक कट जाये, उसके लिए मैं तुझे एक नई कहानी सुनाता हूँ।

बेताल द्वारा कहानी सुनाना

तू राजा है ना, मैं एक राजा और उसके सेनापति की कहानी सुनाता हूँ, जो खूब पसंद आएगी।

टनकपुर का नाम सुना है। अरे बड़ा ही सुंदर नगर है।वहां का राजा यशोधन जो कल तक युवराज था, पिता के अचानक देहांत होने पर उसे पद संभालना पड़ा और सिंहांसन पर बैठना पड़ा।

इतिहास में ऐसे अनेक राजा हुए, जिन्हें कम आयु में ही सत्ता संभालनी पड़ी। राज सत्ता समाज में सेवा करने का माध्यम है, पर कई बार उसका गलत उपयोग सत्ताधारी को मध् में अँधा भी बना देता है। सोभाग्य से राजा यशोधन से सब प्रसन्न थे और राज्य में सब सुखी थें।

अरे भाई सफलता से राज्य चलाने के लिए चाहिए अच्छे कर्म  कर्मठ, ईमानदार सेवक से भी कभी-कभी भूल हो जाती हैआखिर मनुष्य है राजा यशोधन के दरबार में भी आखिर ऐसा ही हुआ।


राजा अपने दरबार में नृत्य में मग्न थें

RAJA VIRKRAM DARBAAR
RAJA VIRKRAM DARBAAR

दरबार में दो युवक बात करते हुए, पहला “मेरा काम हो जाएगा ना” ।

दुसरा “वो सब महाराजा की मर्जी पर है” ।

नृत्य देखने के बाद महाराजा ने कहा “बहुत सुंदर नृत्य करती हो आप। दोनों हमारे राज्य की कलाकार है या बाहर से पधारी हैं।”

दुसरा युवक “महाराज यदि आज्ञा हो तो मैं उत्तर दूं”।

महाराज “कहो” ।

“महाराज अपने राज्य के बड़े व्यापारी कौशल सेन, इन दोनों को लेकर आयें हैं और कौशल सेन जी दोनों नर्तकी को आपको भेंट करना चाहतें हैं, वो आपकी दासी बनकर रहेगी और जब आपका दिल चाहेगा, तब नृत्य कर के आपका दिल बहलाएगी।“

महाराज “इतनी बड़ी कलाकार हैं और मेरी दासी बनकर रहेगी, यह बात सोचने और कहने का साहस कैसे किया तुमने। कौशल सेन चाहते हैं कि हम इनका कर किसी तरह क्षमा कर दें या पूरा ना लें। इसलिए इन दोनों  कलाकारों को हमें भेंट करने आयें हों।

क्यों व्यापारी महोदय? तुम धनवान लोगों के मन में भी कैसी-कैसी कल्पनाए आती हैं? धन कमाने की लिए तुम तो भ्रष्ट हो ही गये हों और चाहते हों कि तुम्हारा राजा भी भ्रष्ट हो जाये। इन दोनों नर्तकी को दासी बनाने की लिए कितने रकम दी तुमने?

व्यापारी “एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्रा। मुझे क्षमा कीजिये महाराज।“

महाराज “कौशल सेन से जो राशि ली जानी हैं, उसमें से एक सहस्त्र मुद्राये कम करके, इन दोनों नर्तकी को बाट दो और इन्हें स्वतन्त्र कर दो।“

महाराज “हमारा आदेश है की कौशल सेन से पूरी रकम वसूल की जाये और आइन्दा यह ध्यान रहे कि राज्य के कर्मचारी और राज के सेवक राजा का हित और राजा का सुख सोचने से पहले राज्य का हित और राज्य का सुख पहले सोचे। आप सब वहीँ काम करेंगें, जिसमें राज्य का हित हो, राजा का नहीं।“

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बेताल “बात कहने को तो कह गये यशोधन, जो कुछ कहा उचित ही कहा, क्योंकि राज्य के हित में ही राजा का हित है, प्रजा का हित है।”

इसके बाद यशोधन के जीवन में भी एक अनोखी घटना घटी। इस नगर के एक बहुत बड़े सेठ की एक कन्या बहुत सुंदर और बहुत कोमल थी।

RAAJKUMARI
RAAJKUMARI

सेठ की एक मात्र कन्या जो राजकुमारी की तरह पली और बड़ी उसके पिता समझ नहीं पायें कि इतनी सुंदर कन्या का विवाह किससे करें? फूल-सी इस राजकुमारी का वर कौन हो सकता है?

तभी उनके मन में विचार आया कि क्यों ना हम अपने युवा राजा यशोधन से निवेदन करें कि जो राजकुमारी की तरह पली-बड़ी है क्यों ना राजा की रानी बने और एक दिने सेठ सचमुच राजा यशोधन के पास जा पंहुचा और अपना प्रस्ताव महाराजा के पास रखा।

महाराज सेठ जी से “बड़ी कठिनाई है किसी के घर जाना, उसकी सुपुत्री को देखना और फिर कहना पसंद नहीं है, अच्छी बात नहीं है। सुचित्र सेन और विचित्र सेन जी।

सेठ जी जी महाराज”

महाराज “आप लोग बुजुर्ग हैं और मेरे पिता के समय से इस राज्य की सेवा में हैं। आप लोग इनके घर जाईयें और यदि इनकी कन्या हमारी रानी बनने योग्य है तो हमें यह रिश्ता स्वीकार्य है।“

सुचित्र सेन और विचित्र सेन “जी महाराज”

सुचित्र सेन और विचित्र सेन दोनों सेठ जी के घर गये

सुचित्र सेन और विचित्र सेन “कन्या को देखकर, यह कन्या है 

बहुत ही सुंदर है, संस्कार शील है, यह तो महारानी बनने योग्य है, प्रणाम महारानी जी प्रणाम, अब हमें आज्ञा दीजिये।“  

अति सुंदर अति सुंदर, कहते हुए जब सुचित्र सेन और विचित्र सेन जा रहे थें तो उन्हें रास्तें में व्यापारी, कौशल सेन मिला।   

कौशल सेन “कहाँ से चले आ रहें हैं, बड़े प्रसन्न हैं।   

सुचित्र सेन और विचित्र सेन
सुचित्र सेन और विचित्र सेन

सुचित्र सेन “कौशल सेन जी, नमस्कार, हम बहुत बड़ा कार्य समाप्त करके आ रहें हैं, हमने अपने राजा के लिए रानी खोज ली।“

“कौन हैं वो ? हम भी तो सुने।“

“अपने सेठ जी जी लड़की।

व्यापारी “वो, वो सचमुच बड़ी सुंदर है, ढूढने से भी नहीं मिलेगी, मगर राधे-गोविन्द,  महाराज ने उन्हें देखा है”

सुचित्र सेन “नहीं, महाराज ने नहीं देखा है, हमने देखा है, महाराज का पूर्ण विश्वास है हमपर।“

व्यापारी “विश्वास तो है, लेकिन आप वहीँ भूल कर रहें हैं, जो आपने मेरे मामले में की थी।“

विचित्र सेन “नहीं की।“

व्यापारी “कर रहे हैं, बड़ी गंभीर भूल कर रहें हैं, महाराज, यशोधन ने क्या कहा था? हमेशा ऐसा काम करें, ऐसा ही सोचें जिसमें राज्य का हित हो, राधें-गोविन्द कहा था ना।

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व्यापारी अरे इतनी सुंदर, इंतनी मनमोहक अप्सरा जैसी कन्या राजा को मिल गई तो जानते हो क्या होगा? सर्वनाश हो जाएगा, समाप्त हो जाएगा यह राज्य।“

सुचित्र सेन “विचित्र सेन जी कौशल सेन जी ठीक कह रहें हैं।“

विचित्र सेन “हाँ, बिल्कुल ठीक कहतें हैं।“ 

व्यापारी “आप तो मुझसे ज्यादा समझदार हैं, अगर इस कन्या से विवाह हुआ और राज्य को नुकसान पहुंचा तो इसके अपराधी आप होंगें, आप।“

सुचित्र सेन और विचित्र सेन “नहीं –नहीं।“

कौशल सेन “राधें-गोविन्द, राधें-गोविन्द, मैं चलता हूँ।“

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सुचित्र सेन और विचित्र सेन महाराज के पास पहुचें “महाराज की जय हो।“

महाराज “क्या बात है?”

सुचित्र सेन “महाराज, सेठ की कन्या आप के योग्य नहीं है।“

महाराज “क्यों? क्या दोष है, उसमें।“

विचित्र सेन “सुंदर नहीं है, लक्षण भी नही है, वो आपकी रानी बनने लायक तो बिल्कुल भी नहीं है, हाँ बिल्कुल भी नहीं है।“

महाराज “ठीक है, ठीक है, सेठ जी से कहलवा दो कि वों हमें क्षमा करें, यह सम्बन्ध नहीं हो सकता।“

सचित्र सेन और विचित्र सेन “जो आज्ञा महाराज।“

आगे बेताल द्वारा  

बेताल “राजा हो या रंक, सेठ को तो अपनी कन्या का ब्याह तो करना ही था, उसने एक वर तो ढूढ़ ही लिया और वह वर था, राजा का ही सेनापति। शगाई हो गई, विवाह में देरी थी।


सेठ जी की कन्या और सेनापति बहार आपस में मिल रहे थें, तभी महाराज भी उनके आस-पास अपनी सेना के साथ थें और राज्य की रणनीति पर विचार कर रहे थें।

महाराज “यदि शत्रु इस क्षेत्र से हम पर आक्रमण करें तो हमारे पास बचाव का कोई साधन नहीं होगा। हम चाहते हैं कि यहाँ से नदी तक एक मजबूत दीवार बना दी जाये।“     

सुचित्र सेन और विचित्र सेन “हाँ यह बहुत जरूरी है महाराज।“

महाराज “चलो वहां तक चलते हैं।“

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तभी एक ओर राजा का सेनापति और सेठ जी की सुंदर कन्या आपस में बात कर रहें थें।

कन्या “आपका यह घोड़ा बहुत सुंदर है।“

सेनापती “सुंदर तो है।“

कन्या “मैं बैठूंगी आपके घोड़ें पर।“

सेनापति “आपकों घोड़ें पर चड़ना आता है।“

कन्या “आप क्या समझते हैं, मैं घोड़ें पर चड़ना नहीं जानती।“

सेनापति “मेरा मतलब यह नहीं, आइयें आइये।“

तभी रानी घोड़ें पर अकेली बैठी और सवारी करने लगी, तभी घोड़ा तेजी से दोड़ने लगा और रोकने पर भी नहीं रुका और महाराज की और जाने लगा, तो महाराज ने घोड़ें को रोक लिया।

महाराज उस कन्या को देखते ही रहे और फिर बोले “क्या बात है।“

कन्या “देखिये ना कितना मुर्ख घोड़ा है, मैं घुमाना चाहती हूँ तो घूमता ही नहीं।“

महाराज “हम तुम्हारे घोड़े को मोड़ देतें हैं।“ मोड़ने के बाद

महाराज “लाओं अब हमारा इनाम।“  

कन्या “लेकिन मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।“

महाराज “मुस्कराहट तो है, एक बार मुस्करा दो।“

कन्या मुस्कराई और महाराज उसकी मुस्कराहट-रूपी चेहरें को देखतें ही रहें और उसकी मुस्कराहट के कायल हो गये और बोले “अति सुंदर, इतनी सुंदर लड़की है ये। सुचित्र सेन और विचित्र सेन आप लोग जाइये इसके पीछे और आकर बताइये किसकी कन्या है ये? हम यह कल्पना भी नहीं कर सकतें कि टनकपुर में इतनी सुंदर कन्या भी है, हम इसे अपनी रानी बनायेंगें।“

रात और दिन महाराज को बस उस सुंदर कन्या का मुस्कराता हुआ चेहरा नजर आता, ना रात को नींद और ना ही दिन में चेन।

महाराज और सेनापति की बीच हुई बातचित  

सेनापति ने भी महाराज की ऐसी दशा देखकर महाराज से पूछा “महाराज मैं जान सकता हूँ, वो सोभाग्यशाली कौन है?

महाराज और सेनापति
महाराज और सेनापति

महाराज “कौन है? हम खुद भी नहीं जानते सेनापति, लेकिन इतना कह सकते है कि उससे सुंदर कन्या हमने जीवन भर नहीं देखी, उसे देखते ही हम उसे चाहने लगें हैं, उसने हमें पागल कर दिया है, जब से उसको देखा है, हम और कुछ सोच ही नहीं पा रहे हैं।“

इसी बीच सुचित्र सेन और विचित्र सेन महल से बाहर कही दूर जाकर आपस में बात कर रहें थें

सुचित्र सेन “सोचों अब क्या करें?”

विचित्र सेन “तुम सोचों क्या करें?”

सुचित्र सेन “सब सच राजा को बता दें।“  

विचित्र सेन “हाँ यही ठीक है।“

सुचित्र सेन “यदि राजा ने सच बोलने के अपराध में मृत्युदंड दे दिया तो।“

विचित्र सेन “जो नसीब में लिखा होगा वो तो होगा ही।“  

सुचित्र सेन और विचित्र सेन महाराज के पास पहुचें और सारी घटना को महाराजा को बता दिया कि “हमने राज के हित के लिए यह कदम उठाया था ताकि आपका विवाह सेठ जी की पुत्री से ना हों।“

उस समय सेनापति भी वहीं मोजूद थें। 

महाराज “मुर्ख हो तुम दोनों, परम मुर्ख, यह अर्थ कैसे लगा लिया, तुमने मेरी बातों का।”

महाराज सेनापति से “क्या सोचते हो सेनापति कि हमारी पसंद की एक कन्या इस देश की रानी बनी तो हम अपना कर्तव्य नहीं निभा पायेंगें, अगर रानी सुंदर हुई तो हम एक राजा नहीं रहेंगें। क्या यह राज्य मिट जाएगा?”

सेनापति “नहीं महाराज, मैं इससे उलट सोचता हूँ, मन-चाहि कन्या से विवाह करने से जीवन और सार्थक हो जाता है। अगर हमारे राजा ने मन चाहि कन्या से विवाह नहीं किया, तो इस दुःख और चिंता से इस राज में एक नया संकट उत्पन्न हो सकता है, जो राज के लिए ठीक नहीं है।“

महाराज “समझाओं इन मूर्खों को।“

सुचित्र सेन और विचित्र सेन “क्षमा करो महाराज।”

महाराज “सेनापति, तुम जाओं इन दोनों के साथ और हमारी ओर से उस कन्या के पिता से क्षमा मांगों और उनसे कहो कि हमसे  बहुत बड़ी भूल हुई है जो हमने उनके प्रस्ताव को नहीं माना और हम उनकी कन्या को अपने ह्रदय की और अपने राज्य की रानी बनाना चाहते हैं।“

सेनापति “जो आज्ञा महाराज।“


सेठ जी का घर दिखाने की लिए सुचित्र सेन और विचित्र सेन सेनापति के साथ थें

घर के समीप पहुचने पर सेनापति “सुचित्र सेन और विचित्र सेन जी यह आप मुझे कहा ले कर आयें हैं।“

सुचित्र सेन “सेठ जी के घर कन्या देखने।“

विचित्र सेन “जिस कन्या से महाराज यशोधन का विवाह होने वाला है, वो यही घर है।“

सेनापति आश्चर्य में “पर, पर यह तो मेरा ससुराल है, सेठ जी की तो एक ही कन्या है, सुंदर, इकलोती, ये कैसे हो सकता है, मेरी, मेरी तो दस दिन पहले ही शगाई हुई है।“ 

सुचित्र सेन “विचित्र सेन जी राजा जी से जाकर हमें चर्चा करनी होगी।”

विचित्र सेन “अवश्य करनी होगी और यह शगाई हमें नहीं रोकनी होगी।“

सेनापति “नहीं विचित्र सेन जी ऐसा नहीं होगा, हम अन्दर चलकर कन्या के पिता से बात करेंगें।“

सेनापति ने कन्या के पिता के पास जाकर सारी घटना के बारें में बताया और अपनी शगाई की अन्घुटी  निकाल कर मेज पर रख दी।

कन्या “इनसे पुछियें पिताजी, वचन देकर उनकों ना निभाना, वीरों का यही लक्षण है, क्या?”   

सेनापति “आप समझती क्यों नहीं? इस राज्य की सेवा करना ही मेरा सबसे बड़ा कर्तव्य और सबसे बड़ा धर्म है। हमने पिछली चार पीड़ियों से इस राज्य का नमक खाया है और मेरे पूर्वज ने भी इस राज्य की सेवा की है और इसलिए मैं, मैं अपनी अपनी शगाई तोड़ता हूँ और एक सेनापति के नाते अपने राजा का विवाह का प्रस्ताव आपके सामने लाया हूँ।“  

कन्या के पिता कुछ देर सोचने के बाद “ठीक है हमें यह प्रस्ताव मंजूर हैं।“

विवाह के लिए प्रस्ताव स्वीकार्य करने पर दिये गये योगदान पर सबसे उप्पर सूचि में, सुचित्र सेन और विचित्र सेन ने सेनापति का नाम दिया, जिसे पढ़कर महाराज ने कहा “सबसे उप्पर सेनापति का नाम !”

सुचित्र सेन “जी महाराज, हमारे विचार से सेनापति को बड़ा पुरस्कार भी मिलना चाहिये।“

विचित्र सेन “यदि वो इतना बड़ा त्याग नहीं करते तो आपके विवाह का इतना बड़ा शुभ कार्य भी नहीं होता।“

महाराज “मैं आपका मतलब नहीं समझा।“

सुचित्र सेन “महाराज सेनापति की शगाई, उस कन्या से पहले ही हो चुकी थी और आपकी ईच्छा को जानकर कि आपकों दुःख ना पहुचें इसलिए सेनापति ने इतना बड़ा त्याग किया महाराज ।“


महाराज यह बात सोच कर अचरज में पड़ गये और शादी की तैयार होने लगी

विवाह की तैयारी होने लगी और जब वर और वधु की वरमाला का समय आया और कन्या ने जैसे ही महाराज के गलें में हार डालने की तैयारी की तो तभी महाराज ने कन्या को रोका और सेनापति की ओर देखकर बोलें “ये लो वरमाला और अपनी होने वाली वधु के गले में वरमाला डालों यह हमारी आज्ञा है और राज आज्ञा, सिर्फ एकबार कही जाती है दोहराई नहीं जाती है।“     

बेताल “और इस प्रकार राजा यशोधन की आज्ञा से सेनापति का विवाह सेठ की सुंदर कन्या से हो गया। तू मनुष्य के गुण दोषों का बड़ा पारखी है, बड़ी समझ है तुझे, मेरे प्रसन्न का जवाब दें, त्याग किसका बड़ा, राजा का या सेनापति का।“

विक्रम “सेनापति का त्याग ज्यादा बड़ा होगा।“

बेताल “राजा का त्याग बड़ा होगा, जिसने राजा होतें हुए भी उस कन्या का विवाह सेनापति से किया जिसकों राजा चाहता था।“   

विक्रम “उस सुंदरी को पहली बार मिलने पर राजा इतना मन्त्रमुग्ध और पागल हो गया जबकि सेनापति उस सुंदरी से कई बार मिल चुका था, मन ही मन उसे अपनी जीवन संगिनी मान बैठा था। इसके बाद  सेनापति उसे कितना अधिक चाहने लगा होगा, लेकिन राजा कि ख़ुशी के लिए उसने विवाह की कल्पना ही छोड़ दी और एक क्षण में निर्णय ले अपने प्रेम का त्याग दिया। इसप्रकार सेनापति का त्याग बहुत बड़ा है।”

बेताल “सच कहा विक्रम, त्याग सेनापति का महान है और निर्णय देने में तू भी बहुत महान हो और मैंने तुझे कहा था ना तू बोला और मैं चला जाउंगा। तू बोला और अब मैं जा रहा हूँ।“ 

विक्रम बेताल के पीछे-पीछे “बेताल मैं तुझे नहीं छोडूंगा।“

उल्टा लटका हुआ बेताल

बेताल “हा हा हा हा हा हा विक्रम भाग जा, मेरा पीछा करना छोड़ दें, मैं तेरे बस में आने वाला नहीं हूँ, जिसने तुझे मेरे पीछे लगाया है वो महाधूर्त है हा हा हा हा हा हा

और इस प्रकार बेताल उसी वृक्ष पर जाकर उल्टा लटक गया।

उल्टा लटका हुआ बेताल

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चक्रवती सम्राट विक्रमादित्य

विक्रम बेताल पार्ट 1

विक्रम बेताल पार्ट 2

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